गयाजी: स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई करते यह बच्चे कोई अमीर घर के नहीं, बल्कि बेहद गरीब घर से आते हैं. अधिकांश बच्चों के माता-पिता मजदूरी करते हैं या दूसरे के घरों में साफ सफाई का काम करते हैं. यह नजारा गया जिले के टिकारी प्रखंड क्षेत्र के रानीगंज गांव का है. महादलित समाज से आने वाले लगभग 50 बच्चे रोजाना शाम ढलते ही दूधिया रोशनी में एक जगह पर इकट्ठा होकर पढ़ाई करते हैं. आइये जानते हैं इन्हें कौन पढ़ाता है.
महादलित के बच्चों को फ्री में देते हैं शिक्षा
इन बच्चों को पढ़ाने का जिम्मा गांव के ही रहने वाले 2 शिक्षक भाई सिद्धार्थ कुमार और सुशील कुमार ने उठाया है. दिन में स्कूल में पढ़ाने के बाद शाम 7 बजे से रात 9 बजे तक महादलित टोले के गरीब बच्चों को दोनों भाई नि:शुल्क शिक्षा देते हैं. लगभग 39 सालों से सिद्धार्थ इनके भाई सुशील कुमार और टीम के लोग गांव के गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देने का कार्य कर रहे हैं और इनके मार्गदर्शन में एक दर्जन से अधिक छात्र सरकारी नौकरी कर रहे हैं.
39 साल पहले डाॅ भीमराव अंबेडकर संघ बनाकर गरीब बच्चों को पढ़ाने की जो शुरुआत हुई थी. आज वह सिलसिला जारी है. आज रानीगंज मोहल्ले में बदलाव की जो बयार बह रही है, उसकी नींव साल 1987 में पड़ी थी. उस दौरान ये पूरा इलाका नक्सल प्रभाव वाले इलाके में शुमार था, गांव के बच्चे खेल कूद, खेत मिट्टी तक ही सीमित थे. इलाके में गरीबी ऐसी थी कि गांव के कुछ ही बच्चे सरकारी स्कूलों तक पहुंचते थे. मोहल्ले के 2-3 ही व्यक्ति ही सरकारी नौकरी में थे.
कभी नक्सल प्रभावित था पूरा इलाका
नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से शाम होते ही घर के दरवाजे बंद होने लगते थे. ऐसे में शिक्षा की अलख जगा कर गांव की तस्वीर बदलने दो भाई सिद्धार्थ कुमार और सुशील कुमार सामने आए. दोनों भाइयों ने गांव के बच्चों को निशुल्क पढ़ाने का निर्णय लिया. उस समय किसी ने यह सोचा नहीं होगा कि दोनो भाई माहौल बदल देंगे. सिद्धार्थ कुमार और सुशील कुमार के साथ कई लोग जुडते चले गए और अब आसपास के गांव के शिक्षक और बुद्धिजीवी वर्ग भी इन्हें सहयोग करने लगे.
बच्चों के माता-पिता से बातकर पढ़ाई के लिए नाम लिखवाया
विपरीत परिस्थितियों में दोनों भाईयों और उनकी टीम को उतार चढ़ाव का भी सामना करना पड़ा था. साल 2012 से कुछ सालों के लिए यह पाठशाला बंद रही, लेकिन जब सिद्धार्थ कुमार ने देखा कि गांव के बच्चे गलत राह पर चल रहे हैं. छोटे-छोटे बच्चे नशाखोरी की ओर बढ़ने लगे तो इन्होंने फिर से बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू कर दिया. जो बच्चे नशे के आदी हो गए थे, उन बच्चों की हमने काउंसलिंग की, उनके माता पिता को समझाया और फिर उन्हें पढ़ने लिखने की आदत लगाई. फिर उनका नामांकन सरकारी स्कूल में कराया. आज वो बच्चे न सिर्फ पढ़ रहे हैं, बल्कि नशे से भी दूर हो गए हैं.
आपसी सहयोग से बनाया समुदायिक भवन
गांव के लोग सिद्धार्थ कुमार के जनून और जज्बे को देख कर कायल हो गए. इसके बाद इनकी इस मुहिम को और धार देने के लिए इनके घर के पास ही आपसी सहयोग से एक समुदायिक भवन का निर्माण कराया गया, जहां आज भी बरसात और ठंड के मौसम में बच्चे बैठ कर पढ़ते हैं. ठीक शाम के 7 बजे समुदायिक भवन के बाहर का मैदान स्ट्रीट लाइट में पाठशाला में बदल जाता है. यहां रोजाना पहली से 8 वीं तक के 40-50 बच्चे अनुशासित हो कर अपनी अपनी कॉपी किताब खोल लेते हैं.
दोनों भाई हैं अध्यापाक
बता दें कि सिद्धार्थ और सुशील कुमार दोनों भाई हैं और 1999 से सरकारी सेवा में कार्यरत हैं. सिद्धार्थ कुमार मध्य विद्यालय सलेमपुर 2 में प्रधानाध्यापक हैं. जबकि उनके भाई सुशील कुमार मध्य विद्यालय बारा में प्रधानाध्यापक हैं. छात्र जीवन से ही सिद्धार्थ गांव के गरीब बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं. सिद्धार्थ कुमार की इस अनूठी क्लास के सफल संचालन करने में अब संघ के सक्रिय सदस्य जिसमें पप्पू कुमार, दयानंद कुमार, अरविंद कुमार, घनश्याम दास, सुधांशू शेखर जैसे कई लोगों का योगदान है.