नई दिल्ली. इंदौर की सड़कों का शोर जब सेंट्रल जिमखाना मैदान के बाहर ही छूट जाता है, तब 80 साल के नरेंद्र मेनन पिच की तरफ बढ़ते हैं. उम्र का यह पड़ाव अक्सर लोगों को आराम की ओर ले जाता है, लेकिन मेनन आज भी उसी जगह खड़े होना चाहते हैं जहां बल्ला, गेंद और स्टंप्स हों. उनका इंटरनेशनल अंपायरिंग का सफर भले ही वर्ष 1998 में थम गया था, लेकिन खेल से उनका रिश्ता कभी खत्म नहीं हुआ. आज उनके बेटे नितिन मेनन भी एक इंटरनेशनल अंपायर हैं, पर नरेंद्र मेनन के लिए आज भी मैदान ही उनका असली घर है.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सेंट्रल जिमखाना मैदान पर बच्चों और कोचों की ओर से जब उनका स्वागत ‘जय हिंद’ और पैर छूकर किया जाता है, तो यह सम्मान उनकी आधी सदी की क्रिकेट सेवा की गवाही देता है. 1960 के दशक से ‘महाराजा यशवंत राव क्रिकेट क्लब’ (MYCC) से जुड़े मेनन अब 12 से 15 साल के बच्चों के मैचों में अंपायरिंग करते हैं. वह सिर्फ फैसले नहीं सुनाते, बल्कि मैदान पर बच्चों को खेल की बारीकियां और नियम सिखाते हैं.
मैदान पर नियमों की सीख और बच्चों का मार्गदर्शन
बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों को सुधारना उनकी दिनचर्या बन चुका है. वह बताते हैं कि जब बच्चे रन आउट की अपील करते हैं, तो अक्सर उनके हाथों में गेंद ही नहीं होती. ऐसे में नरेंद्र मेनन (Narendara Menon) उन्हें रोककर समझाते हैं कि आउट करने के लिए गेंद का हाथ में होना जरूरी है. जब बेल (गिल्लियां) न गिरी हों, तो वह बताते हैं कि पहले बेल्स गिरानी होंगी तभी बल्लेबाज आउट माना जाएगा. यहां तक कि बोल्ड होने पर जब बच्चे ‘हाउजैट’ चिल्लाते हैं, तो वह मुस्कुराते हुए समझाते हैं कि बोल्ड होने पर अपील करने की जरूरत नहीं होती. फ्रंट-फुट और बैक-फुट नो-बॉल की सीख भी वह मैच के बीच में ही बच्चों को देते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि खेल के बीच में सीखी बातें बच्चे कभी नहीं भूलते.
प्रथम श्रेणी क्रिकेटरों का अंपायरिंग में पदार्पण
वर्ष 1990 में जब भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) ने पहली बार 10 पूर्व फर्स्ट क्लास क्रिकेटरों को अंपायरिंग में शामिल करने का फैसला किया, तो मेनन भी उस ऐतिहासिक पहले बैच का हिस्सा बने. इस बैच में उनके साथ एस. वेंकटराघवन और ए.वी. जयप्रकाश जैसे दिग्गजों ने भी परीक्षा पास की थी. इसके बाद वह 2007 से लगभग एक दशक तक अंपायर कोच की भूमिका में भी रहे.
बेटे नितिन मेनन को दिया अंपायरिंग का मूलमंत्र
जब उनके बेटे नितिन मेनन (Nitin Menon) ने महज 22 साल की उम्र में अंपायर बनने की इच्छा जताई, तो नरेंद्र मेनन हैरान रह गए थे. तब उन्होंने बेटे को सफलता का एक ऐसा मंत्र दिया जो आज भी प्रासंगिक है. उन्होंने कहा था, ‘अगर एक अच्छा अंपायर बनना चाहते हो, तो किसी भी बल्लेबाज या गेंदबाज का चेहरा मत देखो. तुम्हारा काम सिर्फ कमर के नीचे देखना है बल्ला, गेंद और स्टंप्स. इसके अलावा कुछ नहीं.’ नितिन आज भी अपने पिता की इसी सीख पर अमल कर रहे हैं.
मॉडर्न तकनीक और अंपायरिंग की चुनौतियां
तकनीक के दौर में अंपायरिंग की चुनौतियों पर मेनन बताते हैं कि जब वह अंतरराष्ट्रीय मैचों में अंपायरिंग करते थे, तब सिर्फ 5 से 6 कैमरे होते थे. आज के समय में 20 से 25 से अधिक कैमरे मैदान में लगे रहते हैं, जिससे अंपायर की किसी भी छोटी भूल का तुरंत पता चल जाता है और गलती छुपाना असंभव हो जाता है.
रणजी ट्रॉफी फाइनल और टाइगर पटौदी की तारीफ
नरेंद्र मेनन की सबसे पसंदीदा यादें मुंबई में खेले गए दो रणजी ट्रॉफी फाइनल मैचों की हैं.वर्ष 2000 में हैदराबाद बनाम मुंबई और वर्ष 2003 में तमिलनाडु बनाम मुंबई. वर्ष 2000 के मैच में मोहम्मद अजहरुद्दीन और वीवीएस लक्ष्मण के बीच 89 रनों की साझेदारी हुई थी. उस मैच में लक्ष्मण का रन आउट होना मेनन के करियर का सबसे यादगार पल बन गया. लक्ष्मण का बल्ला पॉपिंग क्रीज से जरा सा हवा में और पीछे रह गया था. मेनन ने बिना हिचकिचाहट के उन्हें आउट करार दिया. बाद में पूर्व भारतीय कप्तान टाइगर पटौदी ने अपने लेख में मेनन के इस फैसले की तारीफ करते हुए लिखा था कि अगर मैदानी अंपायर इतना सटीक फैसला दे सकते हैं, तो हमें थर्ड अंपायर की जरूरत ही नहीं है.
पोते की शुरुआत और युवा खिलाड़ियों की नई पौध
लगभग चार साल पहले जब मेनन का पोता ऋषभ खेलने आया, तो मेनन दोबारा बच्चों को सिखाने के लिए मैदान पर पूरी तरह सक्रिय हो गए. यहां 25-25 खिलाड़ियों की टीमें बनाकर 50-ओवर के मैच कराए जाते हैं, जो शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक चलते हैं. शुरुआत में देर होने पर माता-पिता शिकायत करते थे, लेकिन जब उन्हें बच्चों में सुधार दिखा, तो वे रात 10 बजे तक भी रुकने को तैयार हो गए.
मेहनत की रंगत और क्लब की सफलता
मेनन की इस मेहनत का असर साफ दिखता है. उनके क्लब एमवाईसीसीस से निकले लगभग 30 खिलाड़ी आज इंदौर डिविजन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जबकि 5 से 6 खिलाड़ियों ने स्टेट टीम पर भी अपनी जगह बनाई है.
80 की उम्र में भी खेल के प्रति अटूट प्यार
80 साल की उम्र में भी मेनन का जज्बा कम नहीं हुआ है. जब भी मैदान पर बच्चे खेलते हैं, वह अपनी उंगली उठाए और नजरें जमाए स्टंप्स के पीछे खड़े मिलते हैं. उनके लिए अंपायरिंग कोई काम नहीं, बल्कि क्रिकेट के प्रति उनका जीवनभर का प्यार है.