Success Story: कूड़े से बना दी 250 करोड़ की कंपनी, 25 शहरों में चल रहा इन दो लड़कों का बिजनेस


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Success Story: जयपुर के अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ ने 2018 में वीवॉइस लैब (WeVOIS Labs) की शुरुआत की थी. आज उनका यह स्टार्टअप 25 से अधिक शहरों में काम कर रहा है. कंपनी हर साल 6 से 7 लाख टन से ज्यादा कचरे को प्रोसेस कर रही है.

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अभिषेक और अभिनव ने साल 2018 में कंपनी शुरू की थी.

नई दिल्‍ली. अक्सर लोग जिस कचरे को देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं. कूड़े का ढेर देखकर मुंह फेरकर निकल जाते हैं. लेकिन, जयपुर के दो लड़कों ने इसी बदबूदार कूड़े को कमाई का जरिया बना डाला है. यह कहानी है वीवॉइस लैब (WeVOIS Labs) के फाउंडर अभिषेक गुप्ता और अभिनव शेखर वशिष्ठ की. कभी एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ उनका स्‍टार्टअप आज देश के 25 शहरों में फैल चुका है और ₹250 करोड़ का क्लीन-टेक साम्राज्य बन चुका है. अभिषेक और अभिनव को फोर्ब्स अंडर-30 (Forbes 30 Under 30) में भी जगह मिल चुकी है. इन दोनों का स्‍टार्टअप गीले कचरे से खाद और टेक्‍सटाइल वेस्‍ट ने नए प्रोडडक्‍ट बनाता है.

कूड़े से कमाई का आइडिया दोनों को 2016 में कालेज कैंपस में हुई एक वेस्ट अवेयरनेस कैंपेन से मिला. इस कैंपेन को अधिकांश छात्र तो सिर्फ एक कॉलेज असाइनमेंट नकर भूल गए, लेकिन अभिषेक और अभिनव के दिमाग में एक स्‍टार्टअप का आइडिया आ गया. उन्होंने गौर किया कि देश में हर साल 62 मिलियन टन कचरा निकलता है. जिसे या तो खुले में फेंक दिया जाता है या आग के हवाले कर दिया जाता है. उन्होंने तय किया कि वे सिर्फ समस्या पर चर्चा नहीं करेंगे, बल्कि इसका एक ठोस, वैज्ञानिक और स्थायी समाधान निकालेंगे. दो साल के कड़े शोध, सर्वे और प्लानिंग के बाद 2018 में दोनों ने वीवॉइस लैब (WeVOIS Labs) की नींव रख दी.

मानसिकता बदलना बड़ी चुनौती

कचरा प्रबंधन जैसे गैर-संगठित और पारंपरिक क्षेत्र में नई तकनीक लागू करना कतई आसान न था. पुराने तौर-तरीकों के आदी नगर निकायों, सफाई कर्मचारियों और आम जनता को एक स्मार्ट डिजिटल फ्रेमवर्क में ढालना सबसे बड़ी चुनौती थी. लोगों का भरोसा जीतना, गाड़ियों के रूट तय करना और समय पर कचरा उठान सुनिश्चित करना एक बड़ा सिरदर्द था. लेकिन अभिषेक और अभिनव ने हार नहीं मानी. उन्होंने सिस्टम को पारदर्शी बनाने के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) का सहारा लिया. घरों, होटलों और अस्पतालों को रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) टैग दिए गए.

कचरा कब उठा, किसने उठाया, वजन कितना था और वर्कर की लोकेशन क्या है जैसी हर गतिविधि की रियल-टाइम ट्रैकिंग शुरू की गई. रूट मैनेजर सॉफ्टवेयर और अलर्ट वाले मोबाइल ऐप ने सफाई व्यवस्था को मिनटों में ट्रैक होने वाला हाई-टेक मॉडल बना दिया. एक बार जब यह सब व्‍यवस्‍था बन गई तो देखते ही देखते वीवॉइस लैब का बिजनेस उठने लगा.

गीले कचरे से खाद, टेक्सटाइल वेस्ट से बनाते हैं नए प्रोडक्‍ट

वीवॉइस लैब ने सिर्फ कचरा उठाने का काम नहीं किया, बल्कि लैंडफिल को हमेशा के लिए खत्म करने का रोडमैप तैयार किया. कंपनी गीले कचरे को खाद बनाती है. सूखे कचरे से प्लास्टिक, कांच, कागज और मैटल्‍स को अलग किया जाता है. कपड़ों के कचरे के लिए कंपनी ने ‘रीसूत्र’ (ReSootr) यूनिट बनाई है, जो अत्याधुनिक तकनीक से कचरे में फैंके गए कपड़े को प्रोसेस कर दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाती है. जयपुर में 300 टन क्षमता वाला टेक्सटाइल वेस्ट रीसाइकलिंग प्लांट शुरू हो चुका है. हाल ही में बिसलेरी के साथ हाथ मिलाकर हर महीने 30 टन प्लास्टिक वेस्ट का उठाव शुरू किया गया है.

25 शहर में फैला काम, हजारों लोगों को दे रहे रोजगार

वीवॉइस लैब आज सालाना 6 से 7 लाख टन से अधिक कचरा प्रोसेस कर रही है. यह स्टार्टअप अब सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने गांवों में रूरल स्मार्ट विलेज सेंटर की शुरुआत की है, जहां ग्रामीणों को स्वच्छता के साथ-साथ रोजगार के साधन भी मुहैया कराए जा रहे हैं. सबसे खास बात यह है कि इस तकनीक ने जमीनी स्तर पर काम करने वाले हजारों सफाई कर्मचारियों को न सिर्फ नियमित रोजगार दिया, बल्कि उनके काम को गरिमा और सम्मान भी दिलाया.



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