अमेरिका को लगता है कि कभी टैरिफ का डंडा चलाकर, कभी रूस से तेल खरीदने पर धमकी देकर और कभी जाल में फंसाकर भारत को झुकाया जा सकता है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ये कोशिशें कीं और हर बार नाकाम रहे. अब भारतीय आईटी कंपनियों को वीजा जाल में फंसाने की कोशिश, इसी ‘ट्रंप कार्ड’ की अगली किस्त है. यहां भी वे नाकाम रहे. क्योंकि जिन कंपनियों को उन्होंने रोकने की कोशिश की, उनके शेयर ट्रंप के फैसले के बाद बूम कर गए.
ट्रंप ने कैसे-कैसे हथकंडे अपनाए, कोई काम न आया
ट्रंप बार-बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करते रहे. दावा करते रहे कि हम डील के बेहद करीब हैं. अपने खासमखास दूत सर्जियो गोर को भारत भेजा. उन्होंने भी रिश्ते ठीक होने के बहुत दावे किए. लेकिन वही ढाक के तीन पात.
चीन भारत दोस्ती ने और चिढ़ाया
रही सही कसर भारत-चीन-रूस की दोस्ती ने कर दी. पीएम मोदी एससीओ समिट के लिए जब चीन गए, और वहां से जो तस्वीरें आई, वह ट्रंप को इतनी चुभीं कि उन्हें खुद ही कहना पड़ा… हमने भारत को खो दिया. इसके बाद ट्रंप फिर धमकी पर उतर आए. लेकिन अगले ही कुछ दिनों में उन्हें लगा कि गलती हो रही है तो फिर चिकनी चुपड़ी बातें करने लगे. लेकिन भारत नहीं फंसा.
100 फीसदी टैरिफ वाला दांव भी बेकार
निर्मला सीतारमण का बयान क्यों अहम है?
ट्रेड डील पर बात करते हुए सीतारमण ने कहा कि बातचीत उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां आगे और लेन-देन करना मुश्किल होगा. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि व्यापार घाटे को ठीक करने के नाम पर टैरिफ को हथियार क्यों बनाया जाए. सीधे सीधे कहें तो अमेरिका कह रहा कि उसे भारत से ज्यादा फायदा मिलना चाहिए, जबकि भारत का जवाब है कि व्यापार कोई एकतरफा सौदा नहीं होता.
अब आईटी कंपनियों को घेरने की कोशिश
शेयर बाजार ने क्या संकेत दिया?
अमेरिकी फैसले के बाद भारतीय आईटी शेयरों में गिरावट का डर था, लेकिन 9 अक्टूबर को तस्वीर अलग दिखी. निफ्टी आईटी सूचकांक शुरुआती कारोबार में करीब 3 फीसदी चढ़ा और कई बड़ी आईटी कंपनियों के शेयर मजबूत हुए. टीसीएस के शेयर में भी तेजी आई.
वजह, भारत की आईटी कंपनियां सिर्फ भारतीय इंजीनियरों को अमेरिका भेजकर कारोबार नहीं करतीं. वे अमेरिकी कर्मचारियों को भी नियुक्त करती हैं, स्थानीय कंपनियों का अधिग्रहण करती हैं और दुनिया भर से काम संभालती हैं. यही वजह है कि वीजा की हर पाबंदी का असर सीधा और एक जैसा नहीं होता.
साफ है शेयर बाजार से सरकार तक सबका एक ही मैसेज है, ट्रंप कितने भी हथकंडे अपना लें, भारत अपनी शर्तों पर जीना जानता है.अपनी शर्तों पर चलना जानता है. फैसला भी अपनी शर्तों पर ही लेगा…