722 बार चबाया एक निवाला, फर्स्ट-क्लास पार्सल में भेजा अपना मल, क्‍या है ‘फ्लेचरिज्म’ की सनक?

722 बार चबाया एक निवाला, फर्स्ट-क्लास पार्सल में भेजा अपना मल, क्‍या है ‘फ्लेचरिज्म’ की सनक?


मुझे हमेशा लगता था कि ‘चबाने’ को लेकेर मेरे द‍िमाग में जो सवाल हैं, वो बस एक फ‍ितूर हैं. ’32’ बार चबाने की साइंस क‍िसी से पूछुंगी तो कहीं डांट न लग जाए. लेकिन अमेर‍िका में एक ऐसा ही शख्‍स हुआ ज‍िसने अपने खाने का एक निवाला एक-दो या 32-34 बार नहीं बल्‍कि पूरे 722 बार चबाया. खाने के न‍िवाले को चबाने की सनक स‍िर्फ इसी शख्‍स तक सीम‍ित नहीं रही. बल्‍कि इस इंसान की ‘चबाने’ की ये थ्‍योरी पूरे अमेर‍िका में ‘फ्लेचर‍िज्‍म’ के नाम से खूब प्रच‍िलित हुई. प्रचल‍ित भी इतनी क‍ि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हर्बर्ट हूवर की एक कमेटी में भी इस थ्‍योरी की वकालत की गई. ये है हॉरेस फ्लेचर की कहानी, ज‍िसका हर पहलू मजेदार, मोट‍िवेट‍िंग और द‍िलचस्‍प है.

कौन थे हॉरेस फ्लेचर?
ये 1900 के दशक के शुरुआती समय की बात है. अमेरिकी हॉरेस फ्लेचर एक ब‍िजनेसमैन और आर्ट क्रिटिक थे. नौकरी और काम के बीच फ्लेचर का वजन काफी ज्‍यादा बढ़ता चला गया था और 40 की उम्र में वो 217 पाउंड यानी लगभग 99 क‍िलो के हो गए थे. मोटापे के साथ सेहत भी ब‍िगड़नी शुरू हुई तो च‍िंता में उन्‍होंने लाइफ इंश्योरेंस कराने की सोची. पर फ्लेचर को बड़ा झटका लगा जब कंपनी ने उन्हें मोटा होने की वजह से रिजेक्ट कर दिया. फ्लेचर के ल‍िए ये बहुत ही ज्‍यादा शर्मिंदगी की बात थी. बस यही से उन्‍होंने ठान ल‍िया कि वो अपना वजन कम करेंगे और हेल्‍दी बनेंगे. अक्‍सर वजन कम करने की बात पर लोग तरह-तरह की डाइट के बारे में सोचते हैं, पर फ्लेचर ने इसका समाधान ढूंढा ‘चबाने’ में. फ्लेचर ने अपना खाना बहुत ज्‍यादा चबाना शुरू क‍िया.

क्‍यों चर्चा में आया हॉरेस फ्लेचर का ‘फ्लेचर‍िज्‍म’?
हॉरेस फ्लेचर का तर्क था कि लोग अपना खाना बहुत जल्दी निगल लेते हैं, जिससे पेट खराब होता है, कब्ज होती है और स्वास्थ्य बिगड़ता है. यहीं से उनका ‘फ्लेचरिज्म’ चर्चा में आने लगा. पहले समझते हैं फ्लेचरिज्‍म क्या था?
– खाने के हर निवाले को मुंह में तब तक चबाओ जब तक मुंह का निवाला पूरी तरह लिक्‍व‍िड जैसा न बन जाए.
– इसके बाद मुंह में अगर कुछ बच जाए तो उसे थूक दो.

चबाने के इस साइंस के पीछे फ्लेचर ऐसे पड़े कि एक बार उन्‍होंने हरे प्याज को 722 बार चबाया था. यानी पूरे 12 मिनट तक. वो कहते थे कि इससे शरीर को ज्यादा पोषण मिलता है, कम खाना खाने से भी ऊर्जा मिलती है और वजन घटता है. हॉरेस की बात पर लोगों का गौर इसल‍िए भी गया क्‍योंकि उन्‍होंने खुद इस तरीके से पूरे 42 पाउंड यानी लगभग 20 क‍िलो वजन कम क‍िया था. कमर भी 7 इंच कम कर ली थी. ऐसे में लोगों के पास यकीन करने के अलावा कोई चारा ही नहीं था. हॉरेस को इससे इतनी ज्‍यादा एनर्जी म‍िली कि वो डबल बैकवर्ड समरसल्ट मारते थे और अपने 50वें जन्मदिन पर 200 मील साइकिल चलाई थी.

येल यूनिवर्सिटी में फर्स्ट-क्लास पार्सल में भेजा अपना ‘मल’
हॉरेस फ्लेचर का ये क‍िस्‍सा काफी मशहूर है. येल यूनिवर्सिटी के एक फिजियोलॉजिस्ट रसेल चिटेंडन को एक दिन एक फर्स्ट-क्लास पार्सल मेल आया. फर्स्ट-क्लास पार्सल को देख वो काफी खुश हो गए क्‍योंकि ये उनके ल‍िए सरप्राइज था. मेल पर नाम ल‍िखा था ‘हॉरेस फ्लेचर’ का जो च‍िटेंडन के दोस्‍त और स्‍वास्‍थ्‍य सुधारक थे. च‍िटेंडन ने बड़े एक्‍साइटमेंट के साथ पार्सल के अंदर झांका. अंदर कुछ पत्थर के टुकड़े जैसा लग रहा था, भूरे रंग का… बस थोड़ा नरम. इसमें से बदबू भी आ रही थी. अचानक चिटेंडन को समझ आया कि हॉरेस फ्लेचर ने उन्हें कोई सरप्राइज नहीं बल्‍कि अपना मल भेजा था. हालांकि आप सोच रहे हों कि ये फ्लेचर ने कोई भद्दा मजाक नहीं क‍िया था. बल्‍कि ये सबूत था कि उनका नया डाइट काम कर रहा है. ये थी फ्लेचर की सनक. उनका मानना था कि पाचन पेट में नहीं, ‘मुंह में’ होता है. वो कहते थे कि अच्छी तरह चबाने से शरीर खाने से सारा पोषण निकाल लेता है. उनका मल बहुत सूखा और कठोर होता था, जिसे वो “ऐश” (राख) कहते थे.

वर्ल्‍ड वॉर में भी गूंजा ‘फ्लेचरिज्‍म’ 
अगर आपको अब तक की कहानी पढ़कर ये लग रहा है कि ये सिर्फ फ्लेचर नाम के एक व्‍यक्‍ति की सनक थी या उसकी ही डाइट की कहानी थी तो आपको बता दें कि उनके इस ‘फ्लेचरिज्‍म’ का कनेक्‍शन फर्स्‍ट वर्ल्‍ड वॉर से भी है. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वे हर्बर्ट हूवर की एक कमेटी में शामिल हुए और उन्‍हें इस कमेटी में ऑफिशियल फूड इकोनॉमिस्ट बनाया गया, जिसका काम फ्रांस और ब्रिटेन को खाद्य राहत पहुंचाना था. हर्बर्ट हूवर बाद में अमेर‍िका के राष्‍ट्रपति बने थे. फ्लेचर का कहना था कि लोग ज्यादा चबाएं तो कम खाने से काम चल जाएगा और भुखमरी खत्म हो जाएगी. हालांकि यूरोपीय नेताओं ने इसे पागलपन कहा और ये स्‍कीम लागू ही नहीं हुई. स‍िर्फ यही नहीं, फ्लेचर के इस ‘फ्लेचर‍िज्‍म’ को जॉन रॉकफेलर, शर्लक होम्स के लेखक आर्थर कॉनन डॉयल और उपन्यासकार अप्टन सिंक्लेयर जैसे लोग फॉलो करते थे.

फ्लेचर गए तो ‘फ्लेचरिज्‍म’ भी चला गया
फ्लेचर की इस फैड डाइट का चलन तो खूब चला लेकिन 1919 में उनका न‍िधन हो गया और धीरे-धीरे इस डाइट का भी. इस डाइट में कुछ ऐसी बातें थीं जो वैज्ञानिक रूप से सही नहीं थीं. जैसे पाचन पेट में नहीं मुंह में ही होता है या ज्यादा चबाने से कैलोरी बढ़ती है. पर हां ये सही था कि खाना जल्दी-जल्दी न निगलकर अच्छी तरह चबाना चाहिए जो काफी हद तक सही होता है. इसके अलावा धीरे-धीरे और चबाकर खाने से दिमाग को “पेट भर गया” का सिग्नल मिलने का समय मिलता है, जिससे ओवरईटिंग कम होती है. यानी फ्लेचर का ये ‘फ्लेचरिज्‍म’ भले ही खत्म हो गया हो और लोग 700 बार कोई निवाला न चबाएं लेकिन मेरे दादा जी ’32 बार चबाने’ तक तो पहुंच ही गए. वैसे अक्‍सर मैं भी खाना जल्‍दी में ही खा जाती हूं, चबाना भूल जाती हूं. शायद फ्लेचर की ये मजेदार कहानी आपको जब भी याद आए, आप भी अपना खाना चबाकर खाना शुरू कर दें.



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