मां के हाथ का स्वाद, बेटी के हाथ में कारोबार! अंबिकापुर के घड़ी चौक पर छा गया रुचिका का देसी आंवला अचार

मां के हाथ का स्वाद, बेटी के हाथ में कारोबार! अंबिकापुर के घड़ी चौक पर छा गया रुचिका का देसी आंवला अचार


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Amla Achar Recipe: अंबिकापुर के घड़ी चौक में बीए की छात्रा रुचिका गुप्ता अपनी मां के बनाए घरेलू अचार का स्टॉल संभालती हैं. तीन साल पुराने इस कारोबार में आम, नींबू, मिर्च और करेला के साथ अब आंवले का अचार भी बन रहा है.

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Amla Achar Recipe: छत्तीसगढ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर के घड़ी चौक में आचार का स्टॉल लगाने वाली कॉलेज की छात्रा रुचिका गुप्ता अपने मां के बिजनेस को आगे बढ़ाने का काम करती हैं. दरअसल, उसकी मां घर में तैयार किए गए शुद्ध मसाले से आचार बनाती है और आंवला भी ताजा रहता है, जिससे स्वाद की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचती है और लोग आंवला का आचार पसंद करते हैं. वैसे कई तरह के आचार का स्टॉल है लेकिन अभी के दिनों में आंवला का आचार जायदा फेमस है और यही देसी स्वाद और होम मेड आचार साल डेढ़ साल तक खराब भी नही होता है. यही खासियत है. देखिए ये रिपोर्ट कैसे बनता है आंवला का आचार…

तीन साल पहले शुरू किया अचार का कारोबार
अंबिकापुर की रहने वाली रुचिका गुप्ता ने लोकल 18 को बताया कि उनके परिवार में पिछले तीन साल से अचार बनाने का काम किया जा रहा है. उनके घर में कई तरह के अचार तैयार किए जाते हैं, जिनमें आम, नींबू, मिर्च, करेला और करील शामिल हैं. अब आंवले के अचार को भी नए उत्पाद के रूप में तैयार किया जा रहा है. परिवार का उद्देश्य घर के पारंपरिक स्वाद को लोगों तक पहुंचाना और अपने हुनर को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाना है.

ऐसे तैयार होता है आंवले का अचार
रुचिका ने बताया कि आंवले का अचार बनाने के लिए सबसे पहले बाजार से आंवला खरीदा जाता है. इसके बाद उसे अच्छी तरह धोकर उबाला जाता है. आंवले को इतना उबाला जाता है कि वह नरम तो हो जाए, लेकिन पूरी तरह टूटे नहीं.इसके बाद उसे धूप में सुखाया जाता है. सूखने के बाद आंवले का आकार कुछ छोटा हो जाता है. फिर उसमें घर पर तैयार किए गए मसाले और सरसों का तेल मिलाकर अचार तैयार किया जाता है. रुचिका के मुताबिक, सरसों के तेल को गर्म करके इस्तेमाल किया जाता है, सीधे ठंडा तेल नहीं डाला जाता है.

मौसी की सलाह से मिला कारोबार शुरू करने का प्रोत्साहन
रुचिका के अनुसार, उनके परिवार को अचार का कारोबार शुरू करने की प्रेरणा उनकी मौसी ममता गुप्ता से मिली. उनकी मौसी बगीचा क्षेत्र में रहती हैं और पेशे से शिक्षिका हैं. उन्होंने रुचिका की मां को सलाह दी कि जब उन्हें इतना अच्छा खाना और अचार बनाना आता है, तो क्यों न अपने इस हुनर को लोगों तक पहुंचाया जाए. इससे दूसरे लोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा और परिवार अपने हुनर के जरिए व्यवसाय को आगे बढ़ा सकेगा. मौसी की इसी सलाह के बाद उनकी मां ने अचार का कारोबार शुरू करने का फैसला लिया.

मां के हाथों के स्वाद पर परिवार को भरोसा
रुचिका बताती हैं कि उनकी मां पहले से ही बहुत अच्छा अचार बनाती थीं. उनके मुताबिक, कई बार अचार कुछ ही समय में खराब हो जाता है या उसमें फफूंद लग जाती है, लेकिन उनकी मां के हाथों से तैयार अचार सही तरीके से रखने पर सालभर से डेढ़ साल तक चल सकता है. यही वजह है कि परिवार अपने पारंपरिक तरीके और स्वाद को इस कारोबार की खासियत मानता है. हालांकि, अचार की वास्तविक शेल्फ लाइफ उसकी तैयारी, नमी, साफ-सफाई, तेल की मात्रा और भंडारण की स्थिति पर निर्भर करती है.

बीए की पढ़ाई के साथ परिवार के काम से जुड़ी हैं रुचिका
रुचिका गुप्ता सरस्वती महाविद्यालय की छात्रा हैं और फिलहाल बीए के फाइनल सेमेस्टर में पढ़ाई कर रही हैं. पढ़ाई के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर भी वह अपने परिवार के अचार व्यवसाय से जुड़ी हुई हैं. उनकी कहानी बताती है कि घर में मौजूद हुनर को सही दिशा और प्रोत्साहन मिले, तो उसे छोटे व्यवसाय के रूप में विकसित करने का रास्ता खुल सकता है. पारंपरिक स्वाद को नए उत्पादों के साथ आगे बढ़ाने की यह कोशिश स्थानीय स्तर पर घरेलू कारोबार की संभावनाओं को भी सामने लाती है.



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