चीन आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आधुनिक होती सेनाओं में से एक का मालिक है. उसके पास पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं, अत्याधुनिक मिसाइलें हैं, विशाल नौसेना है, लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता है और अंतरिक्ष से लेकर साइबर युद्ध तक की तैयारियां हैं. बीजिंग की महत्वाकांक्षा साफ है. वह केवल एशिया की नहीं, बल्कि वैश्विक सैन्य शक्ति बनना चाहता है.
लेकिन चीन की सैन्य ताकत का आकलन केवल उसके हथियारों की संख्या से नहीं किया जा सकता. असली सवाल कहीं ज्यादा जटिल है. सवाल यह है कि जिन हथियारों पर चीन अरबों डॉलर खर्च कर रहा है, क्या उन्हें चलाने वाले सैनिक और कमांडर वास्तविक युद्ध की परिस्थितियों में उतने ही सक्षम हैं?
दिलचस्प बात यह है कि इस सवाल को सबसे पहले चीन के आलोचकों ने नहीं, बल्कि चीन की अपनी सेना ने उठाया था, चीनी सैन्य शब्दावली में इसके लिए एक खास शब्द है, “पीस डिजीज” यानी शांति की बीमारी.
यह कोई चिकित्सकीय बीमारी नहीं है. यह उस मानसिकता, प्रशिक्षण संस्कृति और संस्थागत कमजोरी का नाम है जो तब पैदा होती है जब कोई सेना दशकों तक वास्तविक युद्ध से दूर रहती है. आधुनिक हथियारों के बावजूद युद्ध की वास्तविक चुनौतियों का अनुभव न होना, गलतियों को छिपाने वाली प्रशिक्षण संस्कृति और युद्धक्षेत्र जैसी अनिश्चित परिस्थितियों से बचने की प्रवृत्ति, इसी बीमारी के लक्षण माने जाते हैं.
यही वजह है कि आज जब दुनिया चीन की सैन्य शक्ति को लेकर चिंतित है, तब चीन के भीतर कई रणनीतिकार एक अलग चिंता जता रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि पीएलए के पास आधुनिक हथियार तो हैं, लेकिन युद्ध लड़ने का व्यावहारिक अनुभव नहीं?
युद्ध के बिना बड़ी हुई पीढ़ी
पीएलए की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ तकनीक नहीं, अनुभव है. चीन ने आखिरी बार बड़े पैमाने पर युद्ध 1979 में वियतनाम के खिलाफ लड़ा था. उसके बाद सीमा विवाद हुए, तनाव हुए, सैन्य अभ्यास हुए, लेकिन आधुनिक अर्थों में कोई बड़ा युद्ध नहीं हुआ.
इसका मतलब है कि आज की पीएलए में बड़ी संख्या में सैनिक, पायलट, नौसैनिक अधिकारी और वरिष्ठ कमांडर ऐसे हैं जिन्होंने अपने पूरे सैन्य करियर में वास्तविक युद्ध नहीं देखा. उन्होंने युद्ध को किताबों में पढ़ा है, सिमुलेटर में देखा है और अभ्यासों में दोहराया है, लेकिन असली युद्ध की अव्यवस्था, भ्रम, भय और अनिश्चितता का सामना नहीं किया.
युद्ध केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं होता. यह मानव निर्णयों की परीक्षा भी होता है. गोला-बारूद, ईंधन और संचार व्यवस्था से लेकर सैनिकों के मनोबल और कमांडर की मानसिक दृढ़ता तक, सब कुछ एक साथ परखा जाता है. यही वह जगह है जहां पीस डिजीज की चर्चा शुरू होती है.
2015 में अमेरिकी थिंक टैंक RAND की एक चर्चित रिपोर्ट सामने आई थी. रिपोर्ट में पीएलए के अपने अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि सेना के कई हिस्सों में प्रशिक्षण “unrealistic, lax and easy” यानी अवास्तविक, ढीला और जरूरत से ज्यादा आसान था. नानजिंग मिलिट्री रीजन एयर फोर्स के तत्कालीन उप प्रमुख नी वेनशिन ने इसी समस्या के लिए “पीस डिजीज” शब्द का इस्तेमाल किया था.
यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह आरोप बाहर से नहीं लगाया गया था. यह स्वीकारोक्ति सेना के भीतर से आई थी.
चिंता यह थी कि कई युद्धाभ्यास ऐसे होते थे जिनमें परिणाम लगभग पहले से तय रहते थे. कमांडरों और सैनिकों को पता होता था कि आगे क्या होने वाला है. कई अभ्यासों में जोखिम कम रखा जाता था और ऐसी परिस्थितियां बनाई जाती थीं जिनमें असफल होने की संभावना भी सीमित रहती थी. लेकिन वास्तविक युद्ध में ऐसा नहीं होता.
वहां दुश्मन तय पटकथा नहीं पढ़ता. वह आपके अनुमान तोड़ता है, आपकी योजनाएं बिगाड़ता है और ऐसे फैसले लेने पर मजबूर करता है जिनके लिए पहले से कोई तैयार उत्तर मौजूद नहीं होता.
स्क्रिप्टेड युद्धाभ्यास की समस्या
युद्धाभ्यास का उद्देश्य सैनिकों को सफल दिखाना नहीं, बल्कि उनकी कमजोरियां उजागर करना होता है. यदि प्रशिक्षण के दौरान सैनिक कभी गलती ही नहीं करेंगे तो उन्हें सुधारने का अवसर भी नहीं मिलेगा.
RAND रिपोर्ट के अनुसार, चीन की वायु सेना के कुछ प्रशिक्षण कार्यक्रमों में यही समस्या दिखाई दी. नजदीकी हवाई लड़ाई यानी क्लोज एयर कॉम्बैट का प्रशिक्षण पर्याप्त रूप से वास्तविक नहीं माना गया. सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण कठिन परिस्थितियों वाले अभ्यासों से बचने की प्रवृत्ति भी सामने आई.
प्रशिक्षण का माहौल जितना “सुरक्षित” होता गया, उतना ही वह युद्ध की वास्तविकता से दूर जाता गया.
युद्ध में किसी पायलट को यह नहीं पता होता कि विरोधी विमान अगला मोड़ किस दिशा में लेगा. उसे सेकंडों में फैसला करना पड़ता है. अगर वह केवल पूर्व निर्धारित परिस्थितियों में प्रशिक्षित हुआ है, तो वास्तविक मुकाबले में उसकी प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है. यही पीस डिजीज का सबसे खतरनाक पहलू है. यह हथियारों की कमी नहीं पैदा करती, बल्कि निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर करती है.
24 घंटे की लड़ाई की चुनौती
आधुनिक युद्ध कुछ घंटों का संघर्ष नहीं होता. यह लगातार कई दिनों या हफ्तों तक चल सकता है. लड़ाकू विमानों को बार-बार उड़ान भरनी पड़ती है. कमांड सेंटर चौबीसों घंटे सक्रिय रहते हैं. सैनिकों और अधिकारियों को थकान, तनाव और सूचना के दबाव में काम करना पड़ता है.
RAND ने उल्लेख किया था कि PLA Air Force और Naval Air Force के लिए लंबे समय तक लगातार उड़ान संचालन अपेक्षाकृत नया अनुभव था. नानजिंग मिलिट्री रीजन एयर फोर्स ने मार्च 2013 में पहली बार 24 घंटे के निरंतर फ्लाइट ऑपरेशन का प्रशिक्षण आयोजित किया था.
सुनने में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन यह तथ्य दिखाता है कि आधुनिक युद्ध की कुछ बुनियादी परिचालन मांगों को भी पीएलए धीरे-धीरे अपनाने की प्रक्रिया में थी. किसी सेना के लिए असली परीक्षा केवल यह नहीं होती कि वह एक दिन लड़ सकती है या नहीं. असली परीक्षा यह होती है कि वह पांच दिन, दस दिन या बीस दिन लगातार लड़ सकती है या नहीं.
हादसे भी बताते हैं कहानी
पीस डिजीज का असर केवल युद्ध कौशल तक सीमित नहीं रहता. यह योजना, अनुशासन और नेतृत्व पर भी प्रभाव डाल सकता है. चीन की सैन्य चर्चाओं में प्रशिक्षण से जुड़े हादसों को लेकर भी चिंता जताई गई थी. गलत तरीके से अभ्यास आयोजित करना, मानकों का पालन न करना, जरूरी प्रशिक्षण से बचना और अपर्याप्त तैयारी जैसे कारणों को कई दुर्घटनाओं के पीछे जिम्मेदार माना गया.
यानी समस्या केवल यह नहीं थी कि सैनिकों ने युद्ध नहीं देखा. समस्या यह भी थी कि लंबे शांति काल में कुछ संस्थागत आदतें विकसित हो चुकी थीं, जिन्होंने सैन्य प्रशिक्षण की कठोरता को प्रभावित किया.
शी जिनपिंग की चिंता
अगर किसी को लगता है कि यह बहस केवल पुराने दस्तावेजों तक सीमित है, तो वह गलत होगा. 2018 में शी जिनपिंग ने सार्वजनिक रूप से पीस डिजीज को खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया था. चीनी सैन्य विमर्श में इसे युद्ध की तैयारी में बाधा और लड़ाकू क्षमता को कमजोर करने वाली समस्या के रूप में पेश किया गया.
दरअसल, चीन की रणनीतिक सोच में एक बड़ा बदलाव आया है. बीजिंग अब मानकर चल रहा है कि भविष्य में किसी बड़े संघर्ष की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. ताइवान, दक्षिण चीन सागर और इंडो-पैसिफिक की बदलती भू-राजनीति ने इस चिंता को और बढ़ाया है. ऐसे में सेना के लिए केवल हथियार खरीदना पर्याप्त नहीं है. उन्हें इस्तेमाल करने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है.
“फाइव इन्केपेबल्स” और पीस डिजीज
पीएलए की एक और चर्चित समस्या है जिसे “फाइव इन्केपेबल्स” कहा जाता है. इसका संबंध कमांडरों की पांच प्रमुख अक्षमताओं से है.
- स्थिति का सही आकलन करना
- वरिष्ठ नेतृत्व की मंशा समझना
- समय पर फैसला लेना
- सैनिकों की प्रभावी तैनाती करना
- अचानक पैदा हुई परिस्थितियों से निपटना
इन सभी क्षेत्रों को लेकर चीनी सैन्य चर्चा में चिंता जताई गई है. यहीं पीस डिजीज और फाइव इन्केपेबल्स एक-दूसरे से जुड़ते हैं.
- यदि प्रशिक्षण युद्ध जैसा नहीं होगा तो कमांडर कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेना कैसे सीखेंगे?
- यदि अभ्यासों में गलतियां होने ही नहीं दी जाएंगी तो उनसे सीखने का अवसर कहां मिलेगा?
- और यदि सैनिकों को हर बार पहले से पता होगा कि आगे क्या होने वाला है, तो वे वास्तविक युद्ध की अनिश्चितता का सामना कैसे करेंगे?
यही कारण है कि दोनों अवधारणाएं मूल रूप से एक ही समस्या के अलग-अलग पहलू दिखाई देती हैं.
क्या चीन ने सुधार नहीं किए?
यह कहना गलत होगा कि पीएलए ने इन समस्याओं को नजरअंदाज किया है. पिछले एक दशक में चीन ने अधिक यथार्थवादी युद्धाभ्यासों, विरोधी बलों (Opposing Force Exercises), संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण और लंबी अवधि वाले अभियानों पर जोर बढ़ाया है.
कई अभ्यासों में सैनिकों को कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भेजा गया. कुछ जगहों पर यूनिटों की वास्तविक कमजोरियां सामने आईं. कहीं सैनिक रास्ता भटक गए, कहीं टैंक गलत दिशा में चले गए और कहीं कमांडरों को अपनी ही यूनिटों की सटीक स्थिति बताने में मुश्किल हुई.
विडंबना यह है कि चीन इन घटनाओं को असफलता नहीं, बल्कि सफलता मानता है. क्योंकि प्रशिक्षण का उद्देश्य कमियों को छिपाना नहीं, बल्कि उन्हें सामने लाना होता है. यही वह सोच है जिसके जरिए पीएलए पीस डिजीज से लड़ने की कोशिश कर रही है.
इसीलिए पीस डिजीज का मुद्दा महत्वपूर्ण है. यह किसी एक टैंक, विमान या मिसाइल की कमी नहीं है. यह उस मानव तत्व की बात करता है जो किसी भी सेना की वास्तविक ताकत तय करता है.
- क्या कमांडर दबाव में सही फैसला ले पाएंगे?
- क्या सैनिक अप्रत्याशित परिस्थितियों में लड़ पाएंगे?
- क्या अलग-अलग सैन्य शाखाएं एक साथ प्रभावी ढंग से काम कर पाएंगी?
- क्या कई दिनों तक लगातार ऑपरेशन संभव होगा?
- और क्या प्रशिक्षण में दिखाई देने वाली गलतियां वास्तविक युद्ध से पहले सुधारी जा सकेंगी?
इन सवालों के जवाब ही किसी सेना की वास्तविक क्षमता तय करते हैं. “पीस डिजीज” को चीन की सबसे बड़ी कमजोरी घोषित कर देना शायद अतिशयोक्ति होगी. किसी भी सेना की ताकत और कमजोरी को एक ही अवधारणा से नहीं समझा जा सकता.
लेकिन इतना जरूर स्पष्ट है कि चीन की अपनी सैन्य बहस में इस समस्या को बेहद गंभीरता से लिया गया है. यही कारण है कि इसे बार-बार आधिकारिक लेखों, सैन्य अध्ययनों और प्रशिक्षण सुधारों में उठाया जाता रहा है. आज पीएलए के पास आधुनिक हथियारों की कमी नहीं है. वास्तविक प्रश्न उन हथियारों के पीछे खड़े लोगों से जुड़ा है.
शांति ने चीन को अपनी सेना को आधुनिक बनाने का समय दिया. लेकिन उसी लंबे शांति काल ने एक ऐसा सवाल भी खड़ा कर दिया है जिसका जवाब केवल युद्धाभ्यास नहीं दे सकते. जब तक किसी सेना का सामना वास्तविक युद्ध की अनिश्चितता से नहीं होता, तब तक उसकी वास्तविक क्षमता का अंतिम परीक्षण अधूरा रहता है.