‘आतंकी इस्‍तेमाल करते रहे हैं सैटकॉम’, एलन मस्क को राजीव चंद्रशेखर ने दिखाया आईना

‘आतंकी इस्‍तेमाल करते रहे हैं सैटकॉम’, एलन मस्क को राजीव चंद्रशेखर ने दिखाया आईना


एलन मस्क दो द‍िन से भारत पर बेतुके आरोप लगा रहे हैं. उन्‍हें लगता है क‍ि उनकी स्टारलिंक टेक्‍नोलॉजी शानदार है. दुनिया के कई देशों में चल रही है, तो भारत में भी उसका रास्ता तुरंत खुल जाना चाहिए. लेकिन अब पूर्व केंद्रीय मंत्री और टेक्‍नोक्रेट राजीव चंद्रशेखर ने उन्‍हें आईना द‍िखाया है. राजीव चंद्रशेखर ने कहा, आपकी टेक्‍नोलॉजी बेहतरीन हो सकती है, लेकिन भारत में सिर्फ टेक्‍नोलॉजी की चमक देखकर फैसला नहीं होता, देश की सुरक्षा भी देखी जाती है. चाहे बात 26/11 मुंबई हमलों की हो या फ‍िर पहलगाम अटैक की, सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) आतंक‍ियों का पसंदीदा माध्‍यम रहा है. इसल‍िए भारत इसे पहले देखेगा. आपकी कंपनी कितनी भी बड़ी हो, भारत अपने नियमों से समझौता नहीं करेगा.

स्टारलिंक एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की सैटेलाइट इंटरनेट सेवा है. इसका फायदा यह है कि जहां मोबाइल टावर या फाइबर इंटरनेट पहुंचाना मुश्किल है, वहां भी सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट पहुंचाया जा सकता है. गांवों, पहाड़ी इलाकों और दूरदराज के क्षेत्रों के लिए यह तकनीक काफी काम की हो सकती है. लेकिन बात सिर्फ इंटरनेट पहुंचाने की नहीं है. सवाल यह भी है कि इस नेटवर्क पर होने वाले संचार की सुरक्षा कैसे होगी? देश की सुरक्षा एजेंसियों की जरूरतें कैसे पूरी होंगी? और अगर इस तकनीक का गलत इस्तेमाल हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?

राजीव चंद्रशेखर ने एलन मस्क को इन्‍हीं मुद्दों पर जवाब द‍िया है. उन्‍होंने कहा, आपकी टेक्‍नोलॉजी शानदार है. मैं खुद भी स्टारलिंक का इस्तेमाल कर चुका हूं. लेकिन किसी देश को कोई नई तकनीक अपनाने से पहले अपने हितों के हिसाब से योजना बनानी पड़ती है. यानी तकनीक अच्छी होने का मतलब यह नहीं कि सरकार आंख बंद करके उसे मंजूरी दे दे.

यहां हूबहू पढ़ें उन्‍होंने क्‍या ल‍िखा…

प्र‍िय एलन
आपकी पोस्ट से काफी हलचल मची है. लेकिन इस पर मुझे जवाब देना जरूरी लगा. ठीक वैसे ही, जैसे कुछ समय पहले आपकी उस पोस्ट पर जवाब देना जरूरी था, जिसमें आपने कहा था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) को हैक किया जा सकता है.

मैं टेलीकॉम के बारे में थोड़ी जानकारी रखता हूं. एक उद्यमी और फिर नीति निर्माता के तौर पर भारत के वायरलेस सेक्टर को खड़ा करने में भी मेरी कुछ भूमिका रही है. इसलिए मैं अपने विचार आपके सामने रखना चाहता हूं.

यह सच है कि भारत का टेलीकॉम सेक्टर कई दशकों तक अपारदर्शिता और भ्रष्टाचार से जूझता रहा. इस क्षेत्र में कुछ खास कारोबारियों का दबदबा था. उन्हें आपके मौजूदा प्रशंसक का भी पूरा समर्थन मिलता था. उस प्रशंसक का नाम छिपाने की जरूरत नहीं है- राहुल गांधी.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में टेक्नोलॉजी सेक्टर, जिसमें टेलीकॉम और इंटरनेट भी शामिल हैं, तीन सिद्धांतों पर काम करता है- खुला बाजार, सुरक्षित और भरोसेमंद व्यवस्था और जवाबदेही.

ओपन (Open): किसी एक या दो कंपनियों का एकाधिकार नहीं होना चाहिए. बाजार में सभी कंपनियों को निष्पक्ष मुकाबले का मौका मिलना चाहिए.

सेफ एंड ट्रस्टेड (Safe and Trusted): बुनियादी ढांचा, नेटवर्क और डिजिटल प्लेटफॉर्म सुरक्षित और भरोसेमंद होने चाहिए.

अकाउंटेबल (Accountable): इस क्षेत्र में काम करने वाली हर कंपनी और हर पक्ष को सुरक्षा और भरोसे से जुड़े मामलों में कानून के प्रति जवाबदेह होना चाहिए.

जब यह ढांचा तैयार किया गया, तब मैं पहले सांसद था और उसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम का हिस्सा बना. मैंने राजनीतिक और नौकरशाही के स्तर पर वर्षों तक चली अपारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष किया है. इसी अनुभव ने इन सिद्धांतों को बनाने में भूमिका निभाई.

इसलिए आज का भारत वह पुराना भारत नहीं है, जहां कुछ खास कारोबारियों का दबदबा चलता था.

मैं अब सरकार में नहीं हूं और निश्चित रूप से सरकार की ओर से नहीं बोल रहा हूं. लेकिन मुझे लगता है कि सरकार ने अपनी बात साफ कर दी है. भारत में सैटेलाइट कम्युनिकेशन (सैटकॉम) के तीनों लाइसेंसधारक सुरक्षा मंजूरी की प्रक्रिया में लगभग एक ही स्तर पर हैं. पहले उनकी सुरक्षा और भरोसे से जुड़ी जांच होगी, उसके बाद स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी.

सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट सेवाओं से सुरक्षा से जुड़े कई सवाल पैदा होते हैं. भारत जैसे देश में यह चिंता और भी महत्वपूर्ण है, जिसने अपने पड़ोस में मौजूद शत्रुतापूर्ण देशों से जुड़े तत्वों के समर्थन के कारण वर्षों तक आतंकवाद और उग्रवाद का सामना किया है.

26/11 के मुंबई आतंकी हमलों से लेकर हाल में पहलगाम में हुए आतंकी हमले तक, आतंकवादियों के लिए सैटेलाइट कम्युनिकेशन संचार का पसंदीदा माध्यम रहा है.

सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट पर कॉल करने वाली सेवाएं (VoIP) और एन्क्रिप्शन यानी बातचीत या संदेशों को सुरक्षित रखने की तकनीक भी सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियां बढ़ाती हैं.

इन चुनौतियों का समाधान असंभव नहीं है. लेकिन सुरक्षा और भरोसा सुनिश्चित करने के लिए हमें नई तकनीकी क्षमताएं विकसित करनी होंगी और जरूरी संसाधन जुटाने होंगे.

मैंने स्टारलिंक का इस्तेमाल किया है और मुझे लगता है कि यह शानदार तकनीक है. इसमें कोई शक नहीं कि यह मोबाइल कनेक्टिविटी और तकनीकी नवाचार के एक नए दौर की शुरुआत है.

लेकिन किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले किसी देश को अपने हितों और जरूरतों के हिसाब से योजना बनानी चाहिए. भारत भी यही कर रहा है.

इसलिए धैर्य रखना जरूरी है. और इस मामले में धैर्य रखना सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है.



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