शेयर बाजार में गुरुवार को निवेशकों की जमकर बिकवाली देखने को मिली. सेंसेक्स 1000 अंक तक टूट गया और निफ्टी 22,300 के आसपास फिसल गया. दोपहर तक बाजार की तस्वीर इतनी बिगड़ी कि बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों की कुल बाजार वैल्यू में करीब 8 लाख करोड़ रुपये की कमी आ गई. आखिर जो बाजार रेपो रेट बढ़ोत्तरी को झेल गया, वो आज इतना दबाव में कैसे आ गया कि लहूलुहान हो गया. हम आपको इसके पांच फैक्टर बता रहे हैं.
दरअसल, बाजार पर महंगा कच्चा तेल, RBI की सख्त होती नीति, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कमजोर ग्लोबल संकेत और कुछ बड़े शेयरों में तेज गिरावट का एक साथ असर पड़ा है. यानी निवेशकों के सामने इस समय एक नहीं, कई चिंताएं खड़ी हैं.
पहला वार: कच्चा तेल फिर 103 डॉलर के पार
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमत है. ब्रेंट क्रूड 3 फीसदी से ज्यादा चढ़कर करीब 103 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया. पश्चिम एशिया में तनाव और खाड़ी क्षेत्र तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंता ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है.
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल आयात करता है. तेल महंगा हुआ तो देश का आयात बिल बढ़ता है. इसका असर रुपये, महंगाई और कंपनियों की लागत पर पड़ सकता है. अगर कंपनियों की लागत बढ़ती है और वे पूरी बढ़ी लागत ग्राहक पर नहीं डाल पातीं तो मुनाफे पर दबाव आता है. यही डर शेयर बाजार को परेशान करता है.
दूसरा बड़ा झटका: RBI ने बढ़ाई ब्याज दर
बाजार के लिए दूसरा बड़ा झटका RBI की तरफ से आया. रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर दिया. यह करीब चार साल में पहली बढ़ोतरी है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह रही कि RBI ने अपनी नीति का रुख ‘न्यूट्रल’ से बदलकर ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ कर दिया.
यानी अब बाजार को यह चिंता सताने लगी है कि ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं. RBI गवर्नर ने भी संकेत दिया है कि निकट अवधि में दरों में कटौती की संभावना नहीं है और आगे का कदम महंगाई तथा आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा.
ऊंची ब्याज दर का मतलब कंपनियों के लिए महंगा कर्ज और निवेशकों के लिए शेयरों की तुलना में सुरक्षित ब्याज वाले विकल्पों का आकर्षण बढ़ना है. यही वजह है कि RBI के फैसले के बाद बाजार में बेचैनी बढ़ी.
तीसरा वार: विदेशी निवेशक लगातार पैसा निकाल रहे
बाजार की सबसे बड़ी कमजोरी FII यानी विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली बनी हुई है. 7 अक्टूबर को विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से 6,121.40 करोड़ रुपये निकाल लिए. यह अक्टूबर में अब तक की दूसरी सबसे बड़ी एक दिन की FII बिकवाली थी. इसके उलट घरेलू संस्थागत निवेशकों यानी DII ने करीब 4,597 करोड़ रुपये की खरीदारी की. विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी बिकवाली बाजार पर सीधा दबाव डालती है. खासकर तब, जब इसके पीछे महंगा तेल, ऊंची वैश्विक बॉन्ड यील्ड और भारतीय मौद्रिक नीति के सख्त होने जैसी चिंताएं भी जुड़ जाएं.
चौथा दबाव: दुनिया के बाजार भी साथ नहीं दे रहे
भारत अकेला बाजार नहीं है जहां निवेशकों में घबराहट दिख रही है. एशियाई बाजारों में भी कमजोरी रही. अमेरिकी बाजार पिछले सत्र में दबाव में रहे और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड ऊंची बनी हुई है. ऐसे माहौल में वैश्विक निवेशक जोखिम वाले एसेट्स में पैसा लगाने को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाते हैं.
विदेशी बाजारों की कमजोरी का असर भारत पर इसलिए भी पड़ता है क्योंकि ग्लोबल फंड एक देश से दूसरे देश में लगातार पैसा लगाते और निकालते रहते हैं. जब अमेरिका और दूसरे बड़े बाजारों में जोखिम बढ़ता है तो उभरते बाजारों से पैसा निकलने का दबाव बढ़ सकता है.
पांचवां वार: अडानी समेत कई बड़े शेयर टूटे
गिरावट सिर्फ इंडेक्स तक सीमित नहीं रही. अडानी एंटरप्राइजेज में तेज गिरावट देखने को मिली. अडानी पोर्ट्स भी दबाव में रहा और अडानी ग्रीन एनर्जी में भी भारी कमजोरी आई. बाजार के इस हिस्से में बिकवाली ने निफ्टी और खासकर मेटल तथा एनर्जी सेक्टर पर दबाव बढ़ाया. निफ्टी मेटल करीब 3 फीसदी तक गिरा, जबकि निफ्टी एनर्जी में भी लगभग 2 फीसदी की कमजोरी रही. यानी बाजार में बिकवाली कई सेक्टरों में फैली हुई दिखाई दी.