Handloom Saree Instrument: नाव जैसी शटल कैसे बुनती है साड़ी? जानिए हथकरघे के इस छोटे औजार का कमाल

Handloom Saree Instrument: नाव जैसी शटल कैसे बुनती है साड़ी? जानिए हथकरघे के इस छोटे औजार का कमाल


Last Updated:

Process of Making Saree by Hand: हथकरघे पर बनने वाली खूबसूरत साड़ी के पीछे सिर्फ बुनकर की मेहनत नहीं, बल्कि पारंपरिक औजारों की भी अहम भूमिका होती है. इनमें शटल सबसे महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक है. लकड़ी से बनी नाव जैसी आकृति वाली यह शटल बाने के धागे को ताने के बीच एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाती है. दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसे नाडे भी कहा जाता है. शटल में धागे की बॉबिन लगाई जाती है और फिर धागे को छोटे छेदों से निकालकर करघे में सेट किया जाता है. बुनकर पैडल और हाथों की मदद से करघे को चलाता है, जिससे शटल लगातार दोनों दिशाओं में गुजरती रहती है. हर बार धागा ताने में जुड़ता है और कंघी से उसे दबाकर कपड़े को मजबूती दी जाती है. हजारों बार शटल की आवाजाही के बाद कई दिनों की मेहनत से एक साड़ी तैयार होती है.

Top Deals Inside

हैदराबाद. भारतीय हथकरघा उद्योग हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक हुनर का जीता-जागता प्रतीक है. बाज़ार में सजने वाली खूबसूरत हाथ से बुनी साड़ियां हर किसी का मन मोह लेती हैं, लेकिन इस बुनाई के पीछे बुनकरों की कड़ी मेहनत, साधना और पारंपरिक औजारों का अहम योगदान होता है. हथकरघे पर कपड़ा तैयार करने की इस पूरी प्रक्रिया में एक छोटा सा औजार सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसे आम भाषा में शटल और दक्षिण भारत में इसे नाडे भी कहा जाता है.

लकड़ी से बनी नाव के आकार की यह शटल हथकरघे की धुरी मानी जाती है. इसके बिना हाथ से साड़ी या किसी भी कपड़े की बुनाई संभव नहीं है. देखने में बेहद साधारण लगने वाला यह उपकरण असल में बाने के धागे को एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचाने का काम करता है. बुनकर शमीम अंसारी बताते हैं कि शटल के बीच में एक खाली खांचा और धातु की एक पतली तीली होती है, जिसे स्पिंडल कहा जाता है.

सबसे पहले धागे से लिपटी हुई बॉबिन को किया जाता है सेट

सबसे पहले बुनकर धागे से लिपटी हुई बॉबिन या फिरकी को इस तीली में सेट करते हैं. इसके बाद धागे के सिरे को शटल के बारीक सुराखों से बाहर निकाला जाता है. धागा सेट करने के बाद शटल को करघे के खांचे में रखा जाता है. बुनाई की शुरुआत होते ही बुनकर अपने पैरों से नीचे लगे पैडल को दबाते हैं और हाथ से करघे की डोरी को खींचते हैं. पैर और हाथ के इस सटीक तालमेल से शटल ताने के धागों के बीच से सनसनाती हुई एक तरफ से दूसरी तरफ जाती है. जब पैर का पैडल बदलता है तो शटल फिर उल्टी दिशा में लौटती है.

कपड़ा निर्माण में शटल की है महत्वपूर्ण भूमिका

शटल की यह दाएं से बाएं और बाएं से दाएं की लगातार आवाजाही ही कपड़े का निर्माण करती है. हर फेरे के साथ धागा ताने में गुंथता चला जाता है और करघे की कंघी से उसे दबाकर मजबूत किया जाता है. दिनभर में हजारों बार शटल को इधर से उधर फेंकने के बाद कई दिनों की मेहनत से एक साड़ी पूरी होती है. यह कला बुनकरों के गहरे धैर्य, एकाग्रता और पीढ़ियों से चले आ रहे हुनर को दर्शाती है.



Source link