Neem Karoli Baba Ashram Shipra River: उत्तराखंड के नैनीताल में मौजूद नीम करोली बाबा के विश्व प्रसिद्ध कैंची आश्रम की आध्यात्मिक कहानी बड़ी रोचक है. यह आश्रम अपनी आध्यात्मिक शक्ति और इसके आस-पास मौजूद प्रकृति की छटाओं के लिए मशहूर है. इस आश्रम से सटकर एक नदी बह रही है, जो हर मौसम में कल-कल कर बहती ही रहती है, जिसे लोग शिप्रा नदी के नाम से जानते हैं. यह एक ऐसी नदी है जो उत्तर वाहिनी नदी है, यानी यह उत्तर की तरफ बहती है. पहाड़ों के बीच बहती यह नदी देखने में भले ही सामान्य नजर आए, लेकिन इसके साथ कई धार्मिक मान्यताएं और लोककथाएं जुड़ी हुई हैं. यही वजह है कि कैंची धाम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए शिप्रा का किनारा भी विशेष महत्व रखता है. अब तो श्रद्धालु इस नदी को बाबा नीम करौरी की नदी मानते हुए यहां स्नान तक करने लगे हैं.
शिप्रा उत्तराखंड के नैनीताल जिले के पहाड़ी क्षेत्र में बहने वाली नदी है. यह कैंची धाम के पास से गुजरती हुई आगे बढ़ती है और खैरना के आसपास कोसी नदी में मिल जाती है. कैंची क्षेत्र में नदी का स्वरूप बेहद खूबसूरत दिखाई देता है. एक तरफ पहाड़ और जंगल हैं तो दूसरी तरफ आश्रम और मंदिर परिसर.
शिप्रा को पुनर्जीवित करने के जनप्रयास
शिप्रा कल्याण समिति बनाकर शिप्रा नदी को पुनर्जीवित करने के लिए काफी सालों से काम में जुटे जगदीश नेगी बताते हैं कि पहले शिप्रा की तरफ कभी भी शासन-प्रशासन का ध्यान नहीं गया. यही वजह है कि यह सदानीरा नदी अपने मूल स्वरूप को खोती गई. इसका उद्गम स्थल घोड़ाखाल और गागर के जंगलों में है. नेगी के मुताबिक पेड़ों के अवैध कटान की वजह से नदी सूखने के कगार पर पहुंच गई थी, जिसके बाद उन्होंने इसके लिए काम करने का फैसला लिया. पिछले सालों में उनके द्वारा किए गए प्रयासों से नदी एक बार फिर पुनर्जीवित हो उठी है.
नदी के उद्गम स्थल के आस-पास सफाई होने से पुराने कटे हुए बांज और बुरांश के पेड़ एक बार फिर हरे-भरे हो उठे हैं, जिससे नदी में पानी का स्तर बढ़ा है और अब इसमें उद्गम से ही साल भर पानी बहता हुआ देखा जा रहा है. नेगी कहते हैं कि शिप्रा को जिंदा रखने के लिए बेहद गंभीर प्रयासों की जरूरत है. विशेषकर भवाली शहर की जो गंदगी इस नदी में डाली जा रही है, उस पर रोक लगाने की आवश्यकता है.
सरकारी रिकॉर्ड में ‘रौली’ दर्ज नदी और सीवर समस्या
भले ही बाहरी तौर पर शिप्रा को आप और हम नदी के रूप में देख रहे हों, लेकिन सरकार के राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में यह पवित्र नदी रौली (छोटा बरसाती नाला) के रूप में दर्ज है. इस बात की तस्दीक भवाली नगर पालिका के ईओ सुधीर कुमार खुद करते हैं. वह कहते हैं कि राजस्व विभाग से मिली जानकारी यही कहती है. हैरानी की बात यह है कि बाबा नीम करौरी की इस पवित्र नदी में भवाली शहर में रहने वाले लोगों के द्वारा घरों का सीवर खुलेआम छोड़ा जा रहा है. इसीलिए इस पर भवाली नगर पालिका अब बेहद गंभीरता से काम कर रही है.
ईओ सुधीर कुमार के मुताबिक भवाली शहर के घरों से निकलने वाले सीवर के ट्रीटमेंट के लिए 9 करोड़ 26 लाख की एक डीपीआर जल निगम के जरिए राज्य सरकार को भेजी गई है. जल्द इस पर स्वीकृति मिलने की उम्मीद है. सरकार का अप्रूवल मिलते ही सीवर का काम शुरू हो जाएगा और नदी में होने वाली गंदगी आने वाले वर्षों में दूर हो जाएगी और नदी निर्मल हो जाएगी. पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष संजय वर्मा के मुताबिक सरकार शिप्रा के मूल स्वरूप को बचाने के लिए बेहद गंभीर है.
‘जब नदी का पानी बन गया घी..’, बाबा नीम करौरी की पावन लोककथा
कैंची धाम के इतिहास की बात शिप्रा नदी के बिना अधूरी मानी जाती है. स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध विवरणों के अनुसार, बाबा नीम करौरी महाराज का इस क्षेत्र से गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव रहा. इसी इलाके में संत सोमवारी बाबा की धूनी और गुफा होने का भी उल्लेख मिलता है. बाबा नीम करौरी महाराज का इस स्थान पर आना-जाना रहा और आगे चलकर यहीं हनुमान मंदिर की स्थापना हुई.
शिप्रा नदी का नाम बाबा नीम करौरी से जुड़ी एक बेहद चर्चित लोककथा के कारण भी लिया जाता है. कहा जाता है कि कैंची धाम में एक बार विशाल भंडारे का आयोजन हो रहा था. बड़ी संख्या में श्रद्धालु भंडारे में पहुंचे थे. इसी दौरान रसोई में पूरियां बनाने के लिए घी कम पड़ गया. जब यह बात बाबा नीम करौरी महाराज तक पहुंची तो उन्होंने कथित तौर पर शिप्रा नदी का पानी लाने के लिए कहा. लोकमान्यता है कि नदी से लाया गया पानी बाबा के आशीर्वाद से घी में बदल गया और उसी से भंडारे की व्यवस्था पूरी हुई. हालांकि इसके कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.
धार्मिक मान्यताएं और नदी संरक्षण की आवश्यकता
शिप्रा नदी को लेकर एक और खास धार्मिक मान्यता है. कैंची क्षेत्र में इसके प्रवाह को उत्तरवाहिनी माना जाता है. भारतीय धार्मिक परंपरा में उत्तर दिशा की ओर बहने वाली नदियों को विशेष आध्यात्मिक महत्व दिया जाता है. इसी वजह से शिप्रा का यह स्वरूप भी श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का विषय रहा है. कुछ धार्मिक स्रोतों में शिप्रा का संबंध स्कंद पुराण के मानसखंड से भी जोड़ा जाता है. समय के साथ कैंची धाम की प्रसिद्धि बढ़ रही है और श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ी है. ऐसे में शिप्रा नदी की स्वच्छता और प्राकृतिक स्वरूप को बचाए रखना भी जरूरी है, क्योंकि श्रद्धालु इसे बाबा की अपनी नदी के रूप में देखने लगे हैं, जिसमें स्नान करने से कष्टों से मुक्ति मिलती है.