UP CM के गजब किस्से: ‘IAS मत बनो, तुम्हारे आगे सैकड़ों कलेक्टर झुकेंगे’, कांशीराम की वो बात जिसने मायावती को बनाया पहली दलित महिला CM


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kanshi ram death anniversary mayawati: 9 अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस यानी 9 अक्टूबर के मौके पर ‘UP CM के गजब किस्से’ में कहानी उस मुलाकात की, जिसने मायावती की जिंदगी की दिशा बदल दी. साल 1977 में जब 21 साल की मायावती IAS बनने की तैयारी कर रही थीं, तब कांशीराम ने उनमें राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता देखी. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने मायावती को प्रशासनिक अधिकारी बनने के बजाय ऐसा नेता बनने के लिए प्रेरित किया, जिसके सामने IAS अधिकारी काम करें.

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जब मायावती से कांशीराम ने कहा था-तुम IAS बनकर क्या करोगी? बनीं पहली दलित CMZoom

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्यवर कांशीराम और उनके साथ उनकी राजनीतिक उत्तराधिकारी मायावती की एक ऐतिहासिक तस्वीर.

Mayawati and Kanshi Ram political journey: 9 अक्टूबर को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक मान्यवर कांशीराम का परिनिर्वाण दिवस है. इस खास मौके पर ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस भाग में हम आपको भारतीय राजनीति का सबसे सबसे दिलचस्प और क्रांतिकारी किस्सा बताने जा रहे हैं.  जब 21 साल की एक साधारण लड़की की वाकपटुता देखकर कांशीराम ने उसके भीतर सियासी आग को पहचान लिया था. यह लड़की आईएएस (IAS) बनने का सपना देख रही थी, लेकिन इस लड़की को कांशीराम ने राजनीति के उस शीर्ष पर पहुंचाया, जहां वह लड़की मात्र 39 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बन गईं.

IAS की तैयारी और वो ऐतिहासिक मुलाकात

मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, साल 1977 में दिल्ली के एक साधारण से घर में मायावती देश की सबसे कठिन परीक्षा प्रशासनिक सेवा (IAS) की तैयारी में जुटी थीं. वह दिन-रात पढ़ाई कर रही थीं. ताकि एक बड़ी अफसर बनकर समाज के शोषित वर्ग की सेवा कर सकें. इसी दौरान एक सभा में उनके भाषण ने कांशीराम का ध्यान खींचा. मायावती ने दलितों और सामाजिक भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर जिस तरह अपनी बात रखी, उससे कांशीराम प्रभावित हुए. जिसके बाद मायावती के घर बहुजन आंदोलन के प्रणेता कांशीराम पहुंचे. कांशीराम ने जब युवा मायावती को बोलते और अपने विचारों को रखते सुना था, तभी से वह मायावती के भीतर छिपी नेतृत्व की चिंगारी को पहचान गए थे. मीडिया के कई रिपोर्ट में इस मुलाकात को मायावती के राजनीतिक सफर का अहम मोड़ बताया गया है.

कांशीराम की वो दमदार भविष्यवाणी

कांशीराम ने मायावती के पिता के सामने एक ऐसी ऐतिहासिक और दमदार बात कही, जिसने मायावती की पूरी जिंदगी का रुख ही बदल दिया. कांशीराम ने कहा था, “मैं इसे आईएएस नहीं बनने दूंगा. इसे आईएएस मत बनाओ, मैं तुम्हें वो बनाऊंगा कि तुम्हारे आगे सैकड़ों कलेक्टर (आईएएस अधिकारी) फाइलें लेकर हाथ जोड़कर खड़े रहेंगे.” कांशीराम की इस क्रांतिकारी और दूरदर्शी बात ने युवा मायावती के दिल और दिमाग पर ऐसा गहरा असर किया कि उन्होंने प्रशासनिक सेवा का रास्ता छोड़ राजनीति में कदम रखने का बड़ा फैसला कर लिया. बाद में मायावती ने एक इंटरव्यू में इस मुलाकात को याद करते हुए बताया था कि कांशीराम ने उन्हें कहा था कि IAS बनने की बजाय राजनीति में आएं, एक दिन कई IAS अधिकारी उनके आसपास काम करेंगे.

पिता से बगावत और संघर्ष का रास्ता

अपनी बेटी को एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी के रूप में देखने की चाहत रखने वाले मायावती के पिता प्रभु दयाल इस फैसले के सख्त खिलाफ थे. वह नहीं चाहते थे कि उनकी बेटी पढ़ाई छोड़कर राजनीति के अनिश्चित रास्तों पर चले. लेकिन कांशीराम के बहुजन समाज को जगाने वाले विचारों से प्रेरित होकर मायावती ने अपने परिवार से सीधी बगावत कर दी. उन्होंने अपने घर की दहलीज छोड़ दी और पूरी तरह से बहुजन समाज के हक की लड़ाई और संगठन को मजबूत करने के काम में दिन-रात जुट गईं.

पढ़ाई से राजनीति तक कैसे पहुंचीं मायावती

मायावती ने कांशीराम के साथ बहुजन आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की. कांशीराम ने पहले BAMCEF के जरिए शिक्षित कर्मचारियों और वंचित तबकों को संगठित करने का काम किया. आगे चलकर 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी बनाई. मायावती इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनती गईं. मायावती का राजनीतिक सफर इसके बाद तेजी से आगे बढ़ा. 1989 में वह पहली बार लोकसभा के लिए चुनी गईं. इसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका प्रभाव बढ़ता गया और वह धीरे-धीरे बसपा की सबसे प्रमुख नेताओं में शामिल हो गईं.

39 की उम्र में रचा नया इतिहास

कांशीराम के मार्गदर्शन में राजनीति में आगे बढ़ीं मायावती ने 3 जून 1995 को पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. उस समय उनकी उम्र 39 साल थी. वह उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं.  इसके बाद मायावती 21 मार्च 1997 को दूसरी बार मुख्यमंत्री बनीं. 3 मई 2002 को उन्होंने तीसरी बार यूपी की कमान संभाली और 13 मई 2007 को चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं. उनका चौथा कार्यकाल 15 मार्च 2012 तक चला. इस तरह वह चार अलग-अलग मौकों पर उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं.

कांशीराम की विरासत और मायावती का सफर

मायावती का राजनीतिक सफर आगे बढ़ता गया और कांशीराम ने उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बनाया. 2001 में कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था. 2003 में मायावती पहली बार बसपा की अध्यक्ष बनीं. कांशीराम का निधन 9 अक्टूबर 2006 को हुआ. इसके कुछ ही महीनों बाद 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मायावती के नेतृत्व में बसपा ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया और उन्होंने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. यानी कहानी उस 21 साल की युवती से शुरू होती है, जो IAS बनने की तैयारी कर रही थी. कांशीराम ने उसके भाषण में राजनीति की संभावना देखी और उसे सामाजिक आंदोलन से जोड़ दिया. आगे चलकर वही मायावती 39 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं और चार बार इस पद पर पहुंचीं. 9 अक्टूबर को कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस पर मायावती की यह कहानी उस राजनीतिक रिश्ते को याद करने का एक अहम मौका देती है. वैसे भी बहुत सारे लोगों के जेहन में मायावती के हजारों किस्से होंगे. उसी में एक किस्सा यह भी है.



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