Major Nidal Hasan Execution : अमेरिका के ‘गद्दार मेजर’ को कुर्सी से बांधकर छाती पर मारी जाएगी गोली, 81 साल में पहली बार आर्मी क्यों बनी जल्लाद?

Major Nidal Hasan Execution : अमेरिका के ‘गद्दार मेजर’ को कुर्सी से बांधकर छाती पर मारी जाएगी गोली, 81 साल में पहली बार आर्मी क्यों बनी जल्लाद?


अमेरिकी आर्मी के एक मेजर को ऐसी सजा सुनाई है, जिसकी आज से दौर में कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इस आर्मी अधिकारी पर ‘गद्दारी’ का आरोप है. अब उसे फायरिंग स्क्वाड के सामने कुर्सी से बांधकर बिठाया जाएगा, फिर सीधा उसकी छाती पर निशाना लगाते हुए ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई जाएंगी. अमेरिका की फौज ने ऐसी सजा पिछले 81 सालों में नहीं दी है. फिर ऐसा क्या हुआ जो मानवाधिकारों और न्याय प्रणाली की दुहाई देने वाली सेना इतनी जल्लाद बन गई? आखिर सेना के एक बड़े अफसर ने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था कि अदालत ने उसे सीधा उसकी सीना छलनी करने का फैसला सुना दिया?

कौन है अमेरिका का वो गद्दार मेजर?

मामला अमेरिका के एक पूर्व सेना मेजर निदाल हसन से जुड़ा है, जिसे अब ‘फायरिंग स्क्वाड’ यानी सीने पर गोलियों की बौछार करके उड़ा दिया जाएगा. अमेरिकी सेना के इतिहास में दूसरे विश्व युद्ध के अंत के बाद यानी पिछले 81 सालों में ये पहला मौका होगा जब किसी फौजी को इस तरह सरेआम गोलियां मारकर मौत की सजा दी जाएगी.

17 साल पहले टेक्सास के फोर्ट हुड सैन्य अड्डे पर हुए उस खौफनाक हत्याकांड के बाद आखिरकार ‘न्याय का दिन’ तय हो गया है. पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने खुद X पर इसकी पुष्टि की है कि रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मौत के फरमान पर अपने दस्तखत कर दिए हैं. 3 दिसंबर 2026 को उसी फोर्ट हुड बेस पर इस मेजर को गोलियों से भून दिया जाएगा.

मुसलमानों को बचाने के लिए अमेरिकी सैनिकों का नरसंहार

ये कहानी 5 नवंबर 2009 की उस काली दोपहर की है, जिसे अमेरिकी इतिहास में किसी सैन्य अड्डे पर हुआ अब तक का सबसे घातक गैर-युद्ध हमला माना जाता है.

निदाल हसन कोई मामूली फौजी नहीं था, बल्कि अमेरिकी सेना में एक मनोचिकित्सक के पद पर तैनात मेजर था. उसका काम जंग की आग से लौटे या जंग में जाने वाले जवानों के मानसिक तनाव को दूर करना था. लेकिन उस दिन उसके दिमाग पर सिरफिरेपन और कट्टरता का भूत सवार हो चुका था. वो फोर्ट हुड के एक बेहद बिजी मेडिकल भवन में घुसा, जहां दर्जनों निहत्थे फौजी इराक और अफगानिस्तान में तैनाती से ठीक पहले अपना अंतिम मेडिकल चेकअप कराने और टीके लगवाने का इंतजार कर रहे थे. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, हसन ने अपनी बंदूक निकाली और अपने ही साथी सैनिकों पर अंधाधुंध गोलियों की बौछार कर दी.

इस भयानक गोलीबारी में 13 बहादुर अमेरिकी सैनिकों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि 32 अन्य गोलियों से छिन्न-भिन्न होकर तड़पने लगे. साल 2013 में जब उसका कोर्ट-मार्शल चला, तो हसन ने बिना किसी झिझक के अपना जुर्म कबूल करते हुए बेशर्मी से कहा कि वो अफगानिस्तान में तालिबान और मुसलमानों की रक्षा करने के लिए अपने ही साथियों का खून बहा रहा था.

निदाल हसन को मौत की सजा (रॉयटर्स)

कैसे दी जाती है फायरिंग स्क्वाड वाली सजा?

अब सवाल ये उठता है कि आखिर ये ‘फायरिंग स्क्वाड’ वाली सजा होती कैसे है और इसे इतना खौफनाक क्यों माना जाता है?

फायरिंग स्क्वाड के तहत सजा-ए-मौत देने का तरीका मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दोनों ही तरह से रीढ़ की हड्डी में सिहरन पैदा कर देता है. इसमें दोषी को एक भारी-भरकम कुर्सी से लोहे के ढांचों या चमड़े की पट्टियों से कसकर बांध दिया जाता है. इसके बाद उसके चेहरे को एक काले कपड़े से ढक दिया जाता है ताकि वो बाहर कुछ न देख सके. फिर एक डॉक्टर आकर उसकी छाती की जांच करता है और ठीक उसके दिल वाले स्थान पर एक सफेद कपड़े या कागज का टारगेट चिपका देता है.

इसके बाद लगभग 20 फीट की दूरी पर पांच प्रशिक्षित हथियारबंद निशानेबाज अपनी राइफलों के साथ खड़े होते हैं. एक-दो-तीन के इशारे पर पांचों निशानेबाज एक साथ सीधे कैदी के दिल को निशाना बनाकर ट्रिगर दबा देते हैं. सीने में एक साथ कई गोलियां धंसने से सेकंडों के भीतर कैदी का दिल फट जाता है और उसकी मौत हो जाती है. देखने वालों के लिए ये खून-खराबे और गोलियों की गर्जना से भरा सबसे दर्दनाक मंजर होता है.

सेना में मौत की सजा का कानूनी ढांचा और राष्ट्रपति की पावर

अमेरिका में सेना का जस्टिस सिस्टम आम नागरिक अदालतों से बिल्कुल अलग ढर्रे पर काम करती है. अमेरिकी सैन्य कानून ‘यूनिफॉर्म कोड ऑफ मिलिट्री जस्टिस’ के तहत अगर किसी फौजी को सजा-ए-मौत दी जाती है, तो उसकी तामीली तब तक नहीं हो सकती जब तक कि देश का राष्ट्रपति उस पर लिखित मंजूरी न दे दे.

सैन्य मृत्युदंड का इतिहास भी कम ड्रामेबाज नहीं रहा है. 1983 में सशस्त्र बलों की अपील अदालत ने इसे असंवैधानिक मानकर रद्द कर दिया था. लेकिन ठीक अगले ही साल 1984 में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने एक खास एग्जीक्यूटिव ऑर्डर लाकर इसे फिर से जिंदा कर दिया.

हालांकि, सिविल लेवल पर अमेरिका के 27 राज्यों में मौत की सजा का नियम है, लेकिन ‘फायरिंग स्क्वाड’ का इस्तेमाल बहुत ही दुर्लभ है. साउथ कैरोलिना, इडाहो, ओक्लाहोमा और यूटा जैसे चुनिंदा राज्यों को छोड़कर कोई इसे नहीं अपनाता. सेना में तो 1945 के बाद से इस पर पूरी तरह धूल जम चुकी थी, जिसे अब निदाल हसन के लिए झाड़ा जा रहा है.

डोनाल्ड ट्रंप की वापसी और सख्त फैसले का संदेश

इस ऐतिहासिक सजा के पीछे वॉशिंगटन में बदली राजनीतिक माहौल का भी बड़ा हाथ है. जो बाइडन की सरकार के दौरान अमेरिकी न्याय विभाग ने संघीय स्तर पर मौत की सजाओं पर एक तरह की रोक लगा रखी थी. लेकिन जैसे ही डोनाल्ड ट्रंप दोबारा राष्ट्रपति बने, उन्होंने अपनी सरकार के पहले ही दिन नया एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी कर सजा-ए-मौत को फिर से पूरी ताकत से लागू कर दिया.

ट्रंप का मानना है कि अमरीका के खिलाफ या उसके नागरिकों के खिलाफ संगीन और जघन्य अपराध करने वालों के दिलों में खौफ पैदा करने के लिए मौत की सजा एक बेहद जरूरी हथियार है. निदाल हसन के केस में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सिफारिश पर ट्रंप ने बिना देरी किए दस्तखत कर दिए.

17 साल का लंबा इंतजार और इंसाफ का आखिरी पैगाम

फोर्ट हुड के उस खूनी मंजर के करीब 17 साल बाद, जब 3 दिसंबर 2026 को मेजर निदाल हसन को कुर्सी पर बांधकर गोलियों से उड़ाया जाएगा, तो ये सिर्फ एक कातिल की सांसें रुकने का मामला नहीं होगा. ये फैसला उन 13 शहीद फौजियों के परिवारों और 32 जख्मी जवानों के लिए उस जख्म पर मरहम की तरह होगा, जो इतने सालों से खुला पड़ा था.

पेंटागन के शब्दों में, ‘हसन के लिए उसके कर्मों के हिसाब का दिन आखिरकार आ गया है’. 81 साल बाद अमेरिकी सेना द्वारा खुद जल्लाद बनने का ये कड़ा फैसला दुनिया भर की फौजों को एक साफ संदेश देता है कि वर्दी पहनकर गद्दारी करने वालों और अपनों का खून बहाने वालों का अंजाम केवल और केवल खौफनाक मौत ही होता है.



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