स्वीट कॉर्न या बेबी कॉर्न? मक्के की खेती से कमाई के लिए जानें एक्सपर्ट की सलाह
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आजमगढ़. मक्के की खेती किसानों के लिए कम समय में आमदनी देने वाली फसलों में शामिल हो सकती है. खासकर स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न की बाजार में अच्छी मांग रहती है. कृषि विशेषज्ञ के मुताबिक सही किस्म का चुनाव, समय पर बुवाई और वैज्ञानिक तरीके से फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मक्के की खेती से बेहतर उत्पादन और आमदनी हासिल कर सकते हैं.
आजमगढ़. खेती में अब किसान ऐसी फसलों की ओर भी बढ़ रहे हैं, जिनसे कम समय और लागत में अच्छी आमदनी हासिल की जा सके. आजमगढ़ में अनाज के साथ सब्जियों की व्यावसायिक खेती का चलन बढ़ रहा है. वहीं कुछ किसान गन्ने और मक्के की खेती से भी कमाई कर रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक मक्के की वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो यह किसानों के लिए बेहतर आमदनी का जरिया बन सकती है. खासकर स्वीट कॉर्न और बेबी कॉर्न की बाजार में अच्छी मांग रहती है.
आजमगढ़ के कृषि एक्सपर्ट राकेश पांडे के मुताबिक किसान मक्के की उन्नत किस्म का चुनाव करने के साथ खेती का सही प्रबंधन अपनाएं तो इससे अच्छी कमाई की जा सकती है. मक्के से तैयार होने वाले कई उत्पादों की बाजार में मांग रहती है. इनमें बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न प्रमुख हैं. शादी-ब्याह से लेकर ढाबों और रेस्टोरेंट तक में इनकी मांग रहती है. कुदरा बाजार में मक्के की कीमत करीब 80 से 90 रुपये प्रति किलो तक बताई जा रही है. ऐसे में कम समय में तैयार होने वाली मक्के की फसल किसानों के लिए कमाई का अच्छा विकल्प बन सकती है.
स्वीट कॉर्न मक्के की एक खास किस्म है. इसके दानों में प्राकृतिक रूप से शुगर की मात्रा सामान्य मक्के की तुलना में ज्यादा होती है, इसलिए इसका स्वाद मीठा और रसीला होता है. इसकी खेती खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम में की जा सकती है. स्वीट कॉर्न की शुगर-75 और माधुरी जैसी किस्में किसानों के बीच लोकप्रिय हैं. बुवाई के करीब 75 से 85 दिन बाद, जब भुट्टे के दानों में दूध भर जाता है, तब इसकी तुड़ाई की जाती है. इसका इस्तेमाल सूप, सलाद, चाट और पिज्जा की टॉपिंग में किया जाता है. इसके अलावा बाजार में हरे भुट्टों की भी अच्छी मांग रहती है.
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बेबी कॉर्न मक्के का छोटा और कच्चा भुट्टा होता है, जिसे दाने पूरी तरह विकसित होने से पहले ही तोड़ लिया जाता है. इसकी खेती के लिए एचएम-4 और प्रकाश जैसी किस्मों को अच्छा माना जाता है. भुट्टे से सिल्क यानी बाल निकलने के करीब 1 से 3 दिन के अंदर इसकी तुड़ाई करनी होती है. इस समय भुट्टा नरम रहता है और खाने के लिए उपयुक्त होता है. बेबी कॉर्न की फसल करीब 50 से 60 दिन में तैयार हो जाती है. कम समय में फसल तैयार होने के कारण किसान साल में 3 से 4 फसलें भी ले सकते हैं. बेबी कॉर्न का इस्तेमाल मिक्स वेज, सूप और चाइनीज व्यंजनों में किया जाता है. इसकी खेती का एक फायदा यह भी है कि भुट्टे की तुड़ाई के बाद बचा हरा पौधा पशुओं के लिए पौष्टिक चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे किसान को एक ही फसल से चारे का भी लाभ मिल सकता है.
कृषि विशेषज्ञ के मुताबिक मक्के की अच्छी उपज के लिए खेत की तैयारी के साथ फसल की सुरक्षा पर भी ध्यान देना जरूरी है. किसान खेत की मेड़ पर बायो फेंसिंग कर सकते हैं. इसके लिए नींबू, करौंदा और शिकाकाई जैसे पौधे लगाए जा सकते हैं. इन पौधों से खेत के चारों तरफ प्राकृतिक सुरक्षा तैयार करने में मदद मिलती है और मवेशियों समेत दूसरे जानवरों से फसल को बचाया जा सकता है. इससे फसल के नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी और किसान बेहतर उत्पादन हासिल कर सकेंगे.
राकेश पांडे के मुताबिक आजमगढ़ क्षेत्र में मक्के की बुवाई के लिए जून की शुरुआत और बारिश से पहले का समय बेहतर रहता है. इसके अलावा सितंबर और अक्टूबर में मानसून खत्म होने के बाद भी मक्के की बुवाई की जा सकती है. हालांकि बुवाई का सही समय मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तय करना जरूरी है.
मक्के की खेती के लिए दोमट और बलुई दोमट मिट्टी को बेहतर माना जाता है. मिट्टी का पीएच मान करीब 6.5 से 7.5 के बीच होना उपयुक्त माना जाता है. खेत में पानी जमा न हो, इसके लिए पहले से जल निकासी की व्यवस्था करना जरूरी है. किसान खेत के निचले हिस्से में करीब 4 से 6 फीट का गड्ढा खोदकर प्लास्टिक ड्रम की मदद से वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी बना सकते हैं. इससे अतिरिक्त पानी को व्यवस्थित करने और भूजल स्तर सुधारने में मदद मिल सकती है. बारिश के दौरान जलभराव से फसल को होने वाले नुकसान को कम करने में भी यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है.