नई दिल्ली. हिंदी सिनेमा और टीवी की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जो पर्दे पर भले ही कुछ देर के लिए नजर आएं, लेकिन अपनी छाप हमेशा के लिए छोड़ जाते हैं. अरुण बाली भी ऐसे ही कलाकार थे. उन्होंने अपने लंबे करियर में ज्यादातर कैरेक्टर रोल निभाए और हर किरदार को अपनी खास अदाकारी से यादगार बना दिया.
अरुण बाली की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए उनके अभिनय के साथ एक बेहद भावुक संयोग का भी जिक्र होता है. उनकी आखिरी फिल्म ‘गुडबाय’ जिस दिन सिनेमाघरों में रिलीज हुई, उसी दिन उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था. एक कलाकार के लिए इससे ज्यादा भावुक संयोग शायद ही कुछ हो सकता है.
थिएटर से शुरू हुआ था अभिनय सफर
अरुण बाली का जन्म 23 दिसंबर 1942 को लाहौर में हुआ था. उन्होंने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि आगे चलकर अभिनय ही उनकी पहचान बन जाएगा. फिल्मों में आने से पहले उनका रुझान थिएटर की तरफ हुआ. रंगमंच ने उन्हें अभिनय की बारीकियां सीखने और अलग-अलग किरदारों को समझने का मौका दिया. हालांकि, थिएटर का शुरुआती सफर उनके लिए आसान नहीं था. एक मंच प्रस्तुति के दौरान वह काफी घबरा गए थे और अपने डायलॉग भूल गए. दर्शकों की प्रतिक्रिया भी अच्छी नहीं रही. इस घटना से अरुण बाली काफी निराश हुए और उन्होंने थिएटर छोड़ने तक का मन बना लिया था. लेकिन परिवार ने उनका साथ दिया. उनके बड़े भाई ने उन्हें समझाया कि किसी अनुभवी व्यक्ति की डांट को हार नहीं, बल्कि सीख के तौर पर लेना चाहिए. इस बात ने अरुण बाली को दोबारा हिम्मत दी और उन्होंने अभिनय का सफर जारी रखा.
हर रोल से जीता दर्शकों का दिल (फाइल फोटो )
फिल्मों में भी छोड़ी अपनी छाप
अरुण बाली ने साल 1989 में ‘दूसरा केवल’ से टीवी की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद 1991 के चर्चित सीरियल ‘चाणक्य’ में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसके अलावा ‘नीम का पेड़’, ‘स्वाभिमान’ और ‘कुमकुम’ जैसे लोकप्रिय सीरियल्स ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया. उनकी गंभीर आवाज, दमदार व्यक्तित्व और सहज अभिनय दर्शकों को काफी पसंद आया. धीरे-धीरे वह टीवी के ऐसे कलाकार बन गए, जिन्हें देखते ही दर्शक उनके किरदार को पहचानने लगे. टीवी के बाद अरुण बाली ने बड़े पर्दे का रुख किया. साल 1991 में आई फिल्म ‘सौगंध’ से उन्होंने फिल्मों में कदम रखा. इसके बाद ‘यलगार’, ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘फूल और अंगारे’, ‘खलनायक’, ‘सत्या’ और ‘हे राम’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग किरदार निभाए. अरुण बाली ने खुद को किसी एक तरह की भूमिका तक सीमित नहीं रखा. वह जिस भी किरदार में नजर आए, उसे अपनी सहज अदाकारी से खास बनाने की कोशिश की.
नई पीढ़ी के बीच भी बनाए रखी पहचान
समय के साथ अरुण बाली ने नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी अपनी मजबूत पहचान बना ली. ‘लगे रहो मुन्नाभाई’, ‘3 इडियट्स’, ‘बर्फी’, ‘पीके’, ‘केदारनाथ’, ‘पानीपत’ और ‘लाल सिंह चड्ढा’ जैसी फिल्मों में उनके काम को खूब पसंद किया गया. उनकी खासियत यही थी कि वह फिल्म में भले ही कुछ मिनट के लिए नजर आएं, लेकिन उनका किरदार कहानी में अपनी जगह बना लेता था. अरुण बाली ने उम्र बढ़ने के साथ अभिनय से दूरी नहीं बनाई. जीवन के आखिरी दौर में भी वह लगातार काम करते रहे. अभिनय उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं था, बल्कि उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका था. उनकी आखिरी फिल्म ‘गुडबाय’ उनके निधन के साथ ही उनके करियर की सबसे भावुक याद बन गई.
बता दें कि 7 अक्टूबर 2022 का दिन अरुण बाली के लिए और उनके चाहने वालों के लिए बेहद भावुक था. इसी दिन उनकी फिल्म ‘गुडबाय’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई और उसी दिन अरुण बाली का निधन हो गया. सोचिए, जिस दिन एक कलाकार का आखिरी काम दर्शकों के सामने पहुंच रहा हो, उसी दिन वह कलाकार इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो जाए. अरुण बाली आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार आज भी उन्हें जिंदा रखते हैं.