सतना. धान की देरी से बोई गई फसल अब करीब 70 से 80 दिन की हो रही है. ऐसे में किसान भाई फसल की देखभाल को लेकर जरा भी लापरवाही न करें. यह समय धान के लिए बेहद अहम माना जाता है क्योंकि इस अवस्था में फसल बालियां निकलने की शुरुआती स्थिति यानी कच्ची गभोट या रिप्रोडक्टिव स्टेज में पहुंच जाती है. खासकर विंध्य और बघेलखंड क्षेत्र में इस साल धान की बुवाई देर से होने के कारण कई खेतों में फसल अभी इसी अवस्था में है. इस समय की गई एक छोटी सी गलती आगे चलकर दानों के भराव और पैदावार पर सीधा असर डाल सकती है, इसलिए खाद, पानी, कीट और रोग प्रबंधन पर अभी से ध्यान देना जरूरी है.
सतना के किसान अंशुमान सिंह ने लोकल 18 से बातचीत में कहा कि इस साल विंध्य क्षेत्र में धान की बुवाई लेट हुई है, इसलिए खेतों में फसल करीब 70 से 80 दिन की अवस्था में पहुंची है. अगर धान की बालियां पेट में आ चुकी हैं या बाहर निकलने लगी हैं, तो इस समय यूरिया डालने से बचना चाहिए. ज्यादा नाइट्रोजन देने से फसल में कंडवा यानी फॉल्स स्मट जैसे फंगल रोगों का खतरा बढ़ सकता है. इसके अलावा जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधे की बढ़वार तो बढ़ सकती है लेकिन दानों की गुणवत्ता और फसल के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ सकता है, इसलिए इस अवस्था में बिना जरूरत यूरिया डालने के बजाय दानों के भराव और बालियों की मजबूती पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है.
दानों के अच्छे भराव के लिए पोटाश और बोरॉन का स्प्रे
इस समय फसल को दानों के विकास के लिए पोटाश और बोरॉन की जरूरत होती है. एक्सपर्ट के अनुसार, किसान प्रति एकड़ एक किलोग्राम एनपीके 0:0:50 यानी पोटाश और 100 ग्राम बोरॉन 20 प्रतिशत को 150 से 200 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर स्प्रे कर सकते हैं. इससे बालियों को मजबूती देने और दानों के भराव में मदद मिलती है. पोटाश दानों के वजन और गुणवत्ता के लिए उपयोगी माना जाता है जबकि बोरॉन पौधे में फूल और दाने बनने की प्रक्रिया को बेहतर करने में मदद करता है.
खेत में न होने दें नमी की कमी
70 दिन के आसपास धान की फसल में पानी का प्रबंधन भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. बालियां निकलने और फूल आने के समय खेत में नमी की कमी होने से दानों के विकास पर असर पड़ सकता है. इस दौरान खेत में दरारें नहीं पड़नी चाहिए. जरूरत के अनुसार करीब दो से तीन सेंटीमीटर पानी या पर्याप्त नमी बनाए रखना जरूरी है. पानी की कमी होने पर बालियां ठीक से विकसित नहीं हो पातीं और कुछ दाने अधपके या खाली रह सकते हैं, इसलिए किसान खेत को पूरी तरह सूखने देने से बचें और फसल की जरूरत के हिसाब से सिंचाई करते रहें.
उमस में इन कीटों और रोगों पर रखें नजर
सितंबर-अक्टूबर के दौरान उमस और मौसम में नमी के कारण धान में कीट और फंगल रोग तेजी से बढ़ सकते हैं. इस समय किसान नियमित रूप से खेत का निरीक्षण करें. भूरा माहू यानी बीपीएच की जांच के लिए पौधों को नीचे से देखकर जड़ और तने के आसपास ध्यान दें. अगर पौधों के निचले हिस्से में कीटों की संख्या बढ़ती दिखाई दे, तो समय रहते कृषि विशेषज्ञ की सलाह से अनुशंसित कीटनाशक का इस्तेमाल करें. इसके अलावा कंडवा यानी फॉल्स स्मट जैसे रोगों पर भी नजर रखना जरूरी है. बालियां निकलने की शुरुआती अवस्था में रोग की संभावना दिखाई दे, तो कॉपर ऑक्सीक्लोराइड या प्रोपिकोनाजोल जैसे फंगीसाइड उपयुक्त फंगीसाइड का इस्तेमाल किया जा सकता है.
दूध भरने के समय गंधी कीट से भी सावधान
जब धान के दानों में दूध भरना शुरू हो जाए, तब गंधी कीट की निगरानी भी बढ़ा दें. यह कीट दानों का रस चूसकर उनकी गुणवत्ता और भराव को नुकसान पहुंचा सकता है. किसान सुबह या शाम खेत में जाकर पौधों और बालियों की जांच करें. कीट दिखाई देने या नुकसान के लक्षण मिलने पर बिना देरी किए कीटनाशक का छिड़काव करें.
अभी की सावधानी तय करेगी दानों का वजन
धान की 70 से 80 दिन की लेट बोई फसल में फिलहाल सबसे ज्यादा ध्यान संतुलित पोषण, पर्याप्त नमी और कीट-रोगों की निगरानी पर देना चाहिए. इस अवस्था में जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने की गलती से बचना, दानों के भराव के लिए उचित पोषण देना और खेत में पानी की कमी न होने देना जरूरी है. साथ ही भूरा माहू, गंधी कीट और फंगल रोगों की समय पर पहचान करके नियंत्रण करने से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. यही समय है, जब किसान थोड़ी सी अतिरिक्त निगरानी करके आने वाली पैदावार को बेहतर बनाए रख सकते हैं.