Navratri celebrations South India : क्या आपने कभी सोचा है कि उत्तर भारत के गरबे, डांडिया और रावण दहन से अलग, दक्षिण भारत में नवरात्रि का त्योहार कैसे मनाया जाता होगा? अगर नहीं, तो चलिए आज हम दक्षिण भारत की उन पारंपरिक फेस्टिवल सेलेब्रेशन के तरीकों को जानने की कोशिश करते हैं जहां परंपरा, कला और भक्ति का एक अलग ही संगम देखने को मिलता है. एक तरफ जहां उत्तर भारत में नवरात्रि का मतलब नौ दिनों के उपवास, रामलीला और दशहरे पर रावण दहन होता है, वहीं दक्षिण भारत में यह पर्व देवी शक्ति के स्वागत, कला के प्रदर्शन और पारिवारिक मेल-मिलाप का सबसे बड़ा उत्सव बन जाता है.कर्नाटक से लेकर तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश तक, इन नौ दिनों में पूरा साउथ एक अलग ही सांस्कृतिक रंग में रंग जाता है. तो आइए, जानते हैं दक्षिण भारत में नवरात्रि के इस पर्व को किस अंदाज़ में मनाया जाता है.
दक्षिण भारत में नवरात्रि मनाने का तरीका –
1. मैसूर का ऐतिहासिक दशहरा (Nada Habba)
कर्नाटक के सांस्कृतिक केंद्र मैसूर में मनाया जाने वाला दशहरा यहाँ का राजकीय उत्सव है, जिसे ‘नादा हब्बा’ (Nada Habba) कहा जाता है.
- 400 साल पुरानी शाही परंपरा:
इस उत्सव का इतिहास विजयनगर साम्राज्य से जुड़ा है. नवरात्रि के इन नौ दिनों में पूरा मैसूर शहर किसी दुल्हन की तरह सजा होता है. - शाही सवारी (जम्बो सवारी):
विजय दशमी (विजयादशमी) के दिन यहाँ एक भव्य जुलूस निकलता है, जिसमें सजे-धजे हाथियों पर माता चामुंडेश्वरी की सोने की मूर्ति को विराजमान किया जाता है. मुख्य हाथी (अंबारी ले जाने वाला हाथी) पर सवार यह यात्रा ऐतिहासिक मैसूर पैलेस से शुरू होकर बन्नुमंतप तक जाती है. - रोशनी का जादू:
इस दौरान ऐतिहासिक मैसूर पैलेस को लाखों-करोड़ों लाइटों से सजाया जाता है, जिसे देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं. इसके अलावा संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक मेलों का आयोजन इस उत्सव में चार चांद लगा देता है.
2. ‘कोलु’ (Golu / Bommai Kolu) उत्सव
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तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के घरों में नवरात्रि के दौरान सबसे खास आकर्षण ‘कोलु’ (Golu) या ‘बोम्माइ कोलु’ होता है.
- सीढ़ीनुमा गुड़ियों की सजावट: इसमें घरों के लिविंग रूम में लकड़ी या स्टील के पाटे पर 3, 5, 7, 9 या इससे अधिक सीढ़ियाँ बनाई जाती हैं. इन पर मिट्टी, लकड़ी या टेराकोटा से बनी देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं (जैसे रामायण या महाभारत के प्रसंग), संतों और दैनिक जीवन की सुंदर गुड़ियों को सजाया जाता है.
- सामाजिक जुड़ाव का जरिया: इन नौ दिनों में शाम के समय महिलाएं और बच्चे एक-दूसरे के घर ‘कोलु’ देखने जाते हैं. इस दौरान भजन गाए जाते हैं, पारंपरिक गीत होते हैं और महिलाओं को उपहार (तांबूलम) और प्रसाद दिया जाता है. यह परंपरा परिवार और पड़ोसियों के बीच आत्मीयता बढ़ाने का एक खूबसूरत माध्यम है.
3. आयुध पूजा और सरस्वती पूजा: श्रम और ज्ञान का सम्मान
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दक्षिण भारत में नवरात्रि के आखिरी तीन दिन ज्ञान, कला और जीविका के साधनों को समर्पित होते हैं.
- साधनों की पूजा: महा अष्टमी और महानवमी के दिन घरों, दुकानों और कार्यालयों में ‘आयुध पूजा’ की जाती है. इसमें संगीत वाद्ययंत्रों, किताबों, कंप्यूटर, और यहाँ तक कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले वाहनों (कार, बाइक) और औजारों को साफ करके उनकी पूजा की जाती है.
- कृतज्ञता का भाव: यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि हमारे जीवन में आगे बढ़ने और आजीविका चलाने में जिन साधनों की भूमिका होती है, उनके प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए.
4. केरल में ‘विद्यारंभम’ और विद्या की देवी की आराधना
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केरल में नवरात्रि का समापन विजयादशमी के दिन एक बेहद पवित्र रस्म के साथ होता है, जिसे ‘विद्यारंभम’ (VidyarambhAM) कहा जाता है. इस दिन छोटे बच्चों (आमतौर पर 2 से 3 वर्ष की आयु के) को शिक्षा की दुनिया में प्रवेश कराया जाता है. मंदिरों में या विद्वानों की देखरेख में बच्चे तश्तरी में भरे चावल या रेत पर अपनी तर्जनी उंगली से ‘ॐ हरि श्री गणपति नमः’ लिखकर पढ़ाई की औपचारिक शुरुआत करते हैं.
दक्षिण भारत की यह नवरात्रि सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत, कला, आपसी प्रेम और कृतज्ञता का एक ऐसा गुलदस्ता है जो हर किसी का मन मोह लेता है.