नैनीताल: उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल का बंगाल से वर्षों पुराना रिश्ता रहा है. एक दौर ऐसा था, जब सितंबर से नवंबर के बीच शहर की गलियों, बाजारों और पर्यटन स्थलों पर बंगाली पर्यटकों की बड़ी संख्या नजर आती थी. होटल हों या माल रोड, हर तरफ बंगाली भाषा की गूंज सुनाई देती थी. यही वजह थी कि नैनीताल को कई बार ‘मिनी बंगाल’ तक कहा जाता था. हालांकि, समय के साथ पर्यटन का स्वरूप बदला है और अब यहां बंगाली पर्यटकों की संख्या पहले के मुकाबले कम दिखाई देती है.
नैनीताल निवासी प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि पहले नैनीताल में अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों का अपना एक निश्चित सीजन हुआ करता था. मार्च-अप्रैल में मुंबई और गुजरात के पर्यटक पहुंचते थे, जबकि गर्मियों के मौसम में दिल्ली और हरियाणा से बड़ी संख्या में लोग नैनीताल आते थे. वहीं सितंबर से नवंबर तक का समय बंगाली पर्यटकों के लिए खास माना जाता था. उनके मुताबिक, बंगाली पर्यटक नैनीताल से केवल घूमने के लिए नहीं जुड़े थे, बल्कि उनका यहां से एक भावनात्मक और सांस्कृतिक रिश्ता भी था. कई परिवार पीढ़ियों से नैनीताल आते रहे हैं.
बंगाली पर्यटकों का युवा पीढ़ी से था खास जुड़ाव
प्रोफेसर अजय रावत बताते हैं कि उस दौर में नैनीताल के युवाओं को बंगाली पर्यटकों के आने का खास इंतजार रहता था. इसकी एक वजह सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी थी. बंगाली पर्यटकों के जरिए युवाओं को हॉलीवुड फिल्मों, थिएटर, खान-पान और रहन-सहन जैसी चीजों के बारे में जानने का अवसर मिलता था. बंगाली पर्यटक नैनीताल के ऑटम फेस्टिवल में भी हिस्सा लेते थे. उस समय पर्यटन कारोबार को केवल कमाई के नजरिए से नहीं देखा जाता था. पर्यटकों के साथ बातचीत, उनकी संस्कृति को समझना और उनके साथ संबंध बनाना भी पर्यटन का हिस्सा माना जाता था.
नैनीताल ही नहीं, कुमाऊं के दूसरे इलाकों तक पहुंचते थे पर्यटक
प्रोफेसर रावत के अनुसार, बंगाली पर्यटक प्रकृति के बेहद करीब रहना पसंद करते थे. नैनीताल को अपना आधार बनाकर वे आसपास के कई इलाकों की यात्रा करते थे. कुमाऊं के कौसानी, रानीखेत, पिंडारी, मिलम और नारायण आश्रम जैसे स्थान भी उनके यात्रा कार्यक्रम में शामिल रहते थे. उनका कहना है कि उस समय बंगाली पर्यटक अपेक्षाकृत लंबे समय तक पहाड़ों में रुकते थे. उनका उद्देश्य केवल प्रमुख पर्यटन स्थलों को देखना नहीं, बल्कि प्रकृति और पहाड़ के वातावरण को करीब से महसूस करना भी होता था.
दुर्गा पूजा की छुट्टियों में उमड़ती थी भीड़
नैनीताल होटल एसोसिएशन के सचिव वेद साह बताते हैं कि दुर्गा पूजा से करीब 20 दिन पहले बंगाली पर्यटकों की आमद शुरू हो जाती थी. बंगाल में नवरात्र और दशहरे के दौरान करीब 10 से 20 दिनों तक छुट्टियां रहती हैं. इसी दौरान बड़ी संख्या में परिवार घूमने निकलते थे और नैनीताल उनके पसंदीदा ठिकानों में शामिल था. वेद साह के मुताबिक, उस समय सितंबर से नवंबर तक नैनीताल में बंगाली पर्यटकों की मौजूदगी इतनी अधिक रहती थी कि शहर का माहौल काफी हद तक ‘मिनी बंगाल’ जैसा दिखाई देता था.
अब क्यों घट रही है बंगाली पर्यटकों की संख्या?
पर्यटन कारोबारियों के अनुसार, समय के साथ बंगाली पर्यटकों की यात्रा पसंद में बदलाव आया है. नए पर्यटन स्थलों का विकास, बेहतर कनेक्टिविटी और देश के अलग-अलग हिस्सों में नए डेस्टिनेशन सामने आने से पर्यटकों के पास विकल्प बढ़ गए हैं. इसके अलावा यात्रा खर्च में बढ़ोतरी भी एक कारण माना जा रहा है. वेद साह बताते हैं कि पहले नैनीताल बंगाली पर्यटकों के लिए प्रमुख पसंद था, लेकिन धीरे-धीरे नई जगहें विकसित हुईं और पर्यटक उन नई जगहों की ओर भी आकर्षित होने लगे. पर्यटन स्थलों के बढ़ते विकल्पों के कारण बंगाली पर्यटक अलग-अलग जगहों में बंट गए हैं.
बदलते पर्यटन के बीच पुराने रिश्ते की याद
नैनीताल में आज भी बंगाली पर्यटकों की मौजूदगी देखने को मिलती है, लेकिन पुराने दौर जैसी व्यापक भीड़ अब नजर नहीं आती. पर्यटन कारोबारियों और स्थानीय लोगों के लिए यह बदलाव सिर्फ पर्यटकों की संख्या में कमी नहीं, बल्कि शहर के एक पुराने सांस्कृतिक रिश्ते के कमजोर पड़ने की कहानी भी है. कभी सितंबर से नवंबर तक बंगाली पर्यटकों की आवाजाही से गुलजार रहने वाला नैनीताल आज भी उनकी पुरानी यादों को अपने भीतर समेटे हुए है.