RBI जल्द ही एक ऐसा फैसला लेने वाला है जिससे आपको मोटा मुनाफा मिलने की उम्मीद है. असल में, आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक 5 से 7 अक्टूबर तक चल रही है. 7 अक्टूबर को रेपो रेट पर फैसला आएगा. अभी रेपो रेट 5.25 फीसदी है. कई अर्थशास्त्रियों और मार्केट एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि आरबीआई इसे 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 5.50 फीसदी कर सकता है. हालांकि, यह अभी अनुमान है. फैसला आरबीआई ही करेगा.
अगर रेपो रेट बढ़ता है तो इसका असर सिर्फ लोन लेने वालों पर नहीं पड़ेगा. एफडी कराने वाले लोगों के लिए भी यह खबर अहम हो सकती है. दरअसल, ब्याज दरें बढ़ने पर बैंकों को जमा जुटाने के लिए एफडी पर ज्यादा ब्याज देने की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में आने वाले समय में कुछ बैंकों की एफडी दरें बढ़ सकती हैं.
रेपो रेट बढ़ा तो एफडी पर क्या असर होगा?
रेपो रेट वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई से छोटी अवधि के लिए पैसा लेते हैं. जब यह दर बढ़ती है तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो सकता है. इसका असर धीरे-धीरे बैंक की कुल फंडिंग लागत पर पड़ता है. बैंकों के लिए जमा यानी डिपॉजिट बेहद जरूरी हैं. इसी पैसे के आधार पर बैंक आगे लोन देते हैं. अगर लोन की मांग मजबूत रहती है और जमा उतनी तेजी से नहीं बढ़ती, तो बैंकों को नए डिपॉजिट आकर्षित करने पड़ते हैं. इसके लिए एफडी की ब्याज दर बढ़ाना एक तरीका हो सकता है.
क्या एफडी पर 25 बेसिस पॉइंट ज्यादा ब्याज मिलेगा?
अगर आरबीआई रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाता भी है, तो बैंक अपनी एफडी दरें उसी अनुपात में बढ़ाएं, यह जरूरी नहीं. हर बैंक अपनी जरूरत के हिसाब से फैसला करता है. किसी बैंक के पास पर्याप्त जमा है तो वह दरें बढ़ाने में जल्दबाजी नहीं करेगा. वहीं, जिस बैंक को ज्यादा डिपॉजिट की जरूरत है, वह ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कुछ एफडी पर ज्यादा ब्याज दे सकता है. इसलिए संभव है कि बैंक सभी अवधि की एफडी पर रेट बढ़ाने के बजाय कुछ खास टेन्योर पर ही ब्याज बढ़ाएं.
एफडी निवेशकों को क्या करना चाहिए?
अगर ब्याज दरें बढ़ती हैं तो नई एफडी कराने या पुरानी एफडी के मैच्योर होने पर उसे रिन्यू कराने वाले निवेशकों को फायदा मिल सकता है. लेकिन सिर्फ एक संभावित रेट बढ़ोतरी के आधार पर तुरंत पूरी रकम लंबी अवधि की एफडी में लगाना सही स्ट्रैटजी नहीं हो सकती. अगर आगे भी ब्याज दरें बढ़ती हैं तो बाद में मिलने वाली एफडी दर पहले से ज्यादा हो सकती है. ऐसे में पैसा अलग-अलग अवधि की एफडी में बांटना बेहतर ऑप्शन हो सकता है. इसे एफडी लैडरिंग कहा जाता है.
उदाहरण के लिए, पूरी रकम एक ही 5 साल की एफडी में लगाने के बजाय उसे अलग-अलग अवधि में बांटा जा सकता है. इससे अलग-अलग समय पर पैसा मैच्योर होगा और जरूरत पड़ने पर उसे दोबारा बेहतर दर पर निवेश करने का मौका मिल सकता है.
पुरानी एफडी वालों को क्या फायदा मिलेगा?
अगर आपके पास पहले से फिक्स्ड रेट वाली एफडी है तो रेपो रेट बढ़ने से उसका ब्याज आमतौर पर नहीं बढ़ेगा. एफडी बुक करते समय जो ब्याज दर तय हुई थी, वही पूरी अवधि तक लागू रहती है. ज्यादा ब्याज का फायदा मुख्य रूप से नई एफडी कराने या मैच्योर होने वाली एफडी को नई दर पर रिन्यू कराने वालों को मिल सकता है.
RBI के लिए सबसे बड़ी टेंशन
आरबीआई के फैसले में महंगाई का असर सबसे ज्यादा रहेगा. अगस्त 2026 में भारत की रिटेल महंगाई 4.82 फीसदी रही, जो जुलाई के 4.45 फीसदी से ज्यादा है. खाद्य महंगाई भी बढ़कर 5.95 फीसदी रही. यही वजह है कि बाजार की नजर अब 7 अक्टूबर के फैसले पर है. अगर आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है तो बैंकों पर जमा जुटाने का दबाव बढ़ सकता है. इसका फायदा आने वाले महीनों में कुछ एफडी निवेशकों को बेहतर ब्याज के रूप में मिल सकता है. लेकिन एफडी कराने से पहले बैंक की ब्याज दर, अवधि, समय से पहले पैसा निकालने के नियम और अपनी जरूरत चेक कर लें.