पाकिस्तान ने जिसे पाला, उसी ने धो डाला, अब अफगानिस्तान पर निकाल रहा भड़ास… कैसे दुश्मनी में बदली ये दोस्ती?

पाकिस्तान ने जिसे पाला, उसी ने धो डाला, अब अफगानिस्तान पर निकाल रहा भड़ास… कैसे दुश्मनी में बदली ये दोस्ती?


पाकिस्तान जब भारत से अलग हुआ और संयुक्त राष्ट्र में एंट्री चाही तो सबसे पहले अड़ंगा अफगानिस्तान ने लगाया. बेशक अगले ही साल उसने अपना रुख बदला और दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध हुए, मगर रिश्तों में मिठास-खटास का दौर चलता रहा. खासतौर से 1990 के दशक में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान को सिर आंखों पर बैठाया. तालिबान को पक्का दोस्त बताया, मगर अमेरिका में 9/11 हमले के बाद पाक ने कमजोर दोस्त की बजाय मजबूत ‘मालिक’ यानी अमेरिका को चुना. आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शामिल हुआ, मगर उसे भी धोखा दिया. जब अफगानिस्तान से अमेरिका ने तालिबान को भगाया तो पाकिस्तान ने शरण दी. पाला-पोसा. तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान TTP नाम दिया. अब वही TTP बुरी तरह धो रहा है तो पाकिस्तान बिलबिलाया घूम रहा है.

हाल में पाकिस्तान ने एक बार फिर अफगानिस्तान में कई ठिकानों पर हमला किया. इसमें महिलाओं और बच्चों समेत कम से कम 10 लोगों के मारे जाने की बात कही जा रही है. हालांकि पाकिस्तान का दावा है कि इस हमले में 22 आतंकी मारे गए हैं और हथियार और गोला बारूद नष्ट किए गए हैं. यह हमला TTP के उस अटैक के विरोध में किया गया है जो हाल ही में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों पर किया गया था. 18 lसितंबर को उत्तर पश्चिमी शहर कोहाट में हुए इस हमले में तकरीबन 31 लोग मारे गए थे. पाकिस्तान का दावा है कि अफगानिस्तान ही TTP को पनाह दे रहा है, जबकि असल में इसे पालने वाला खुद पाकिस्तान ही था.

कैसे रहे हैं पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्ते

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच विवाद की असल जड़ डूरंड लाइन रही है. अफगानिस्तार आज भी इसे अपना इंटरनेशनल बॉर्डर नहीं मानता. दरअसल यह लाइन 1893 में ब्रिटिश भारत और अफगानिस्तान के बीच खींची गई थी. 2600 किलोमीटर लंबी इस लाइन ने पश्तून आबादी को दो हिस्सों में बांट दिया था. पाकिस्तान इसे अपनी पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है, जबकि अफगानिस्तान लगातार इसे चुनौती देता है.

हालांकि 1779 में सोवियत संघ ने जब अफगानिस्तान में प्रवेश किया तो पाकिस्तान अमेरिका और सऊदी अरब के साथ अफगान लड़ाकों के समर्थन में आ गया. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसी दौरान आईएसआई और अफगान लड़ाकों के बीच संबंध मजबूत हुए. 1996 में जब तालिबान ने सत्ता संभाली तो उसे मान्यता देने वाले देशों में सबसे पहले नाम पाकिस्तान का था.

2001 के बाद बदल गया समीकरण

अमेरिका में जब 9/11 अटैक हुआ और अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ मिशन शुरू किया तो पाकिस्तान भी उसके साथ शामिल हो गया. हालांकि तालिबान से पाकिस्तान ने अपनी दोस्ती नहीं तोड़ी. अमेरिका और अन्य रिपोर्टों में बार-बार इस बात का दावा किया जाता रहा कि तालिबान के प्रमुख लड़ाकों को पाकिस्तान ही शरण दे रहा है. अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान के एबटाबाद में ही पाया गया था.

इसी दौरान बड़ी संख्या में तालिबान लड़ाके पाकिस्तान में दाखिल हुए. पाकिस्तान लगातार इनकी मदद करता रहा. 2007 में उग्रवादी कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पाकिस्तान के कबायली क्षेत्र में सक्रिय 13 गुटों को मिलाकर तहरीक-ए तालिबान पाकिस्तान का गठन किया और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ ही अभियान शुरू कर दिया.

अफगानिस्तान पर ठीकरा फोड़ रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान TTP के लगातार हो रहे हमलों का ठीकरा अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर फोड़ रहा है, जबकि असल में TTP में पाकिस्तान के ही पाले पोसे गए आतंकी हैं. बॉन इंटरनेशनल सेंटर फॉर कॉन्फ्लिक्ट स्टडीज BICC के डायरेक्टर कॉनरेड शेट्टर के हवाले से DW ने लिखा है कि अमेरिका ने जब अफगानिस्तान के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की तो TTP से जुड़े आतंकियों ने तालिबान का साथ दिया था, इस वजह से दोनों के बीच ऐतिहाासिक संबंध तो है, लेकिन कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखता.

क्या सच में अफगानिस्तान से प्रभावित है TTP

काबुल और बर्लिन के बीच काम करने वाले थिंक टैंक अफगानिस्तान एनालिस्ट्स नेटवर्क के सह-निदेशक थॉमस रुट्टिग के हवाले से DW ने लिखा है कि तालिबान इस्लामाबाद से आदेश लेने को बिल्कुल तैयार नहीं है. वो किसी बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं करेंगे. वह कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ भारत की प्रतिद्वंद्विता और अफगान की तालिबान सरकार के भारत से सुधरते रिश्ते भी पाकिस्तान को पच नहीं रहे हैं.

ब्रिटिश थिंक टैंक चैथम हाउस के एक एनालिसस के मुताबिक पाकिस्तान हमेशा तालिबान को भारत के खिलाफ अपनी मजबूती के तौर पर देखता रहा है. रणनीतिक तौर पर बदलते रिश्ते की वजह से अब उसी अफगानिस्तान और तालिबान को पाकिस्तान अपने ऊपर बोझ मानने लगा है.



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