नॉर्वे क्यों कर रहा स्मार्ट ग्लासेस पर बैन की तैयारी? क्या भारत को भी है ऐसे सख्त कानून की जरूरत?

नॉर्वे क्यों कर रहा स्मार्ट ग्लासेस पर बैन की तैयारी? क्या भारत को भी है ऐसे सख्त कानून की जरूरत?


टेक्नोलॉजी की दुनिया में जैसे-जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और विएरेबल डिवाइसेस (Wearable Devices) का दायरा बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमारी प्राइवेसी पर खतरा गहराता जा रहा है. Ray Ban Meta जैसे स्मार्ट ग्लासेस आज केवल फैशन स्टेटमेंट या गाने सुनने का जरिया नहीं रहे, बल्कि ये बिना किसी को खबर हुए चुपचाप वीडियो रिकॉर्ड करने और फोटो खींचने का भी काम कर रहे हैं.

इसी खतरे को देखते हुए यूरोपीय देश नॉर्वे ने पब्लिक प्लेस पर स्मार्ट ग्लासेस के इस्तेमाल पर रोक लगाने का मन बना लिया है. नॉर्वे की इस पहल ने पूरी दुनिया में प्राइवेसी को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि नॉर्वे ऐसा क्यों कर रहा है और क्या भारत में भी इस तरह के पहनने लायक जासूसी इक्विपमेंट्स के खिलाफ कानून बनाने की जरूरत है.

नॉर्वे स्मार्ट ग्लासेस को पब्लिक प्लेस से बाहर क्यों करना चाहता है?
नॉर्वे की प्राइवेसी रेगुलेटर एजेंसियों और डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी का मानना है कि स्मार्ट ग्लासेस लोगों की निजी जिंदगी में सीधा दखल देते हैं. नॉर्वे सरकार का मुख्य फोकस तीन बड़ी चिंताओं पर है.

  1. साइलेंट रिकॉर्डिंग: सिंपल स्मार्टफोन से जब कोई फोटो या वीडियो लेता है, तो आसपास के लोगों को पता चल जाता है. लेकिन स्मार्ट ग्लासेस में लगे कैमरे इतने छोटे होते हैं कि सामने वाले को भनक तक नहीं लगती कि उसकी रिकॉर्डिंग हो रही है.
  2. पब्लिक स्पेस में डेटा चोरी: जिम, स्विमिंग पूल, चेंजिंग रूम, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और अस्पतालों जैसी जगहों पर लोग बेफिक्र रहना चाहते हैं. स्मार्ट ग्लासेस की वजह से कोई भी किसी भी वक्त दूसरों का डेटा जैसे चेहरा या हरकतें कैप्चर कर सकता है.
  3. AI और फेस रिकॉग्निशन: नए स्मार्ट ग्लासेस में एआई फीचर्स आ रहे हैं. अगर कोई स्मार्ट ग्लास पहने आपको देख रहा है, तो एआई टेक्नोलॉजी सेकंडों में आपका चेहरा पहचानकर आपकी सोशल मीडिया प्रोफाइल, नाम और निजी डिटेल्स निकालकर उस व्यक्ति को दे सकती है. यह किसी भी नागरिक की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा है.

नॉर्वे का मानना है कि यूरोपीय संघ के सख्त डेटा सुरक्षा कानून (GDPR) के तहत हर इंसान को यह तय करने का अधिकार है कि उसकी तस्वीर या वीडियो कब और कहां ली जाए. बिना सहमति के रिकॉर्डिंग करना मानवाधिकारों का उल्लंघन है.

क्या हैं ये ‘स्मार्ट ग्लासेस’ और यह सामान्य चश्मों से अलग कैसे हैं?
स्मार्ट चश्मे दिखने में तो बिल्कुल सामान्य धूप के चश्मे या पावर वाले चश्मों जैसे ही होते हैं, लेकिन इनके फ्रेम में मॉडर्न एम्बेडेड टेक्नोलॉजी लगी होती है:

  • इन-बिल्ट कैमरा: चश्मे के कोने में बहुत ही छोटा HD कैमरा होता है.
  • माइक्रोफोन और स्पीकर्स: ये आवाज रिकॉर्ड करने और फोन कॉल पर बात करने की सुविधा देते हैं.
  • वॉइस कमांड और टच कंट्रोल: बटन दबाकर या सिर्फ Hey Meta बोलकर तुरंत वीडियो रिकॉर्डिंग या फोटो ली जा सकती है.
  • LED लाइट की नाकामी: टेक कंपनियां दावा करती हैं कि जब कैमरा ऑन होता है, तो चश्मे पर एक छोटी LED लाइट जलती है. लेकिन जानकारों का कहना है कि तेज धूप में या टेप लगाकर इस लाइट को आसानी से छिपाया जा सकता है.

दुनिया के अन्य देशों का रुख क्या है?
केवल नॉर्वे ही नहीं, बल्कि कई अन्य पश्चिमी देश भी Wearable Tech की वजह से पैदा हो रहे खतरों को लेकर सतर्क हो रहे हैं. यूरोपीय संघ की बात करें तो ईयू का GDPR कानून बिना सहमति के किसी की भी रिकॉर्डिंग करने पर भारी जुर्माना लगाता है. नॉर्वे का यह कदम पूरे ईयू में एक नजीर बन सकता है. दुनिया भर के कई प्रीमियम जिम, प्राइवेट क्लब, कैसीनो और सिनेमाघरों ने अपने कैम्पस में स्मार्ट ग्लासेस पहनकर आने पर पहले से ही रोक लगा रखी है.

क्या भारत को भी ‘विएरेबल स्पाईंग’ के खिलाफ कानून की जरूरत है?
भारत में स्मार्ट ग्लासेस और हिडन डिवाइसेस का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय मार्केट और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर रे-बैन मेटा जैसे प्रीमियम चश्मों से लेकर सस्ते चाइनीज स्मार्ट ग्लासेस आसानी से उपलब्ध हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या भारत में इसके खिलाफ कानून होना चाहिए?

भारत में मौजूदा कानूनी स्थिति पर गौर करें तो यहां कुछ कानून और अधिकार है.

  • निजता का अधिकार: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक पुट्टास्वामी फैसले के तहत ‘प्राइवेसी’ भारत में एक मौलिक अधिकार है.
  • DPDP Act: भारत का डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन ऐक्ट नागरिकों के पर्सनल डेटा को सुरक्षा देने की बात करता है.
  • IT ACT 2000: आईटी ऐक्ट की धारा 66E के तहत किसी व्यक्ति की सहमति के बिना उसके निजी अंगों या निजी पलों की तस्वीर खींचना या शेयर करना अपराध है.

कानून में कहां है कमी
भारत में मौजूदा कानून काफी हद तक डिजिटल डेटा, इंटरनेट और स्मार्टफोन पर केंद्रित हैं। स्मार्ट ग्लासेस या विएरेबल डिवाइसेस से सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली ‘साइलेंट स्पाईंग’ (चुपचाप जासूसी) के लिए कोई स्पष्ट और समर्पित गाइडलाइन नहीं है।

यदि कोई व्यक्ति पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पार्क या सड़क पर स्मार्ट ग्लास पहनकर आपका वीडियो बना लेता है, तो मौजूदा भारतीय कानूनों के तहत उस पर तत्काल ऐक्शन लेना बहुत मुश्किल और टेढ़ा काम है.

भारत के लिए आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
एक्सपर्ट्स का ऐसा मानना है कि भारत को भी तकनीक के इस नए दौर के साथ अपने कानूनों को अपडेट करने की सख्त जरूरत है:

  • पब्लिक स्पेस गाइडलाइंस: संवेदनशील सार्वजनिक स्थानों जैसे मेट्रो, ट्रेन, सार्वजनिक शौचालय, जिम, और स्कूलों/कॉलेजों में स्मार्ट ग्लासेस के इस्तेमाल पर स्पष्ट बैन या नियम लागू होने चाहिए.
  • हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग स्टैंडर्ड्स: सरकार को टेक कंपनियों के लिए सख्त नियम बनाने चाहिए कि चश्मे की इंडिकेटर लाइट को बंद या ढका ना जा सके, और जब भी रिकॉर्डिंग हो तो एक क्लिअर ऑडियो अलर्ट आए.
  • जागरूकता अभियान: आम जनता को यह समझाना जरूरी है कि किसी की भी बिना इजाजत विएरेबल डिवाइस से रिकॉर्डिंग करना उनकी प्राइवेसी पर हमला है.

तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाने के लिए आती है, लेकिन जब वही टेक्निक दूसरों की आजादी और निजता पर हावी होने लगे, तो नियमों का डंडा चलना जरूरी हो जाता है. नॉर्वे ने स्मार्ट ग्लासेस को सार्वजनिक जगहों से बैन करने की दिशा में कदम बढ़ाकर पूरी दुनिया को सतर्क किया है. भारत जैसे विशाल आबादी और डिजिटल रूप से तेजी से बढ़ते देश के लिए भी समय आ गया है कि वह Wearable Spying के खिलाफ समय रहते एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार करे.



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