कभी PM मोदी के साथ देखी थी ‘गदर’, सालों से सियासी चर्चा से दूर, अब गोपीकृष्ण पांडेय को मिला राज्यसभा का टिकट

कभी PM मोदी के साथ देखी थी ‘गदर’, सालों से सियासी चर्चा से दूर, अब गोपीकृष्ण पांडेय को मिला राज्यसभा का टिकट


कानपुर: राजनीति में कई बार ऐसे चेहरे अचानक बड़ी जिम्मेदारी तक पहुंच जाते हैं, जिनका नाम लंबे समय से चुनावी राजनीति या सार्वजनिक चर्चा में सुनाई नहीं देता. भाजपा के गोपीकृष्ण पांडेय का राज्यसभा प्रत्याशी बनाया जाना भी कुछ ऐसा ही मामला है. 05 अक्टूबर को भाजपा ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए अपने प्रत्याशियों के नाम घोषित किए, तो कानपुर से गोपीकृष्ण पांडेय का नाम सामने आया. नाम सामने आते ही शहर की राजनीति में चर्चा शुरू हो गई कि आखिर लंबे समय से लो-प्रोफाइल रहने वाले इस संगठन के पुराने कार्यकर्ता को अचानक संसद के उच्च सदन तक पहुंचाने का फैसला क्यों किया गया.

नाम घोषित होते ही सियासी चर्चा तेज
जब गोपीकृष्ण पांडे का नाम इस लिस्ट में आया, तब कुछ लोग उनको बलिया का रहने वाला बताने लगे. लेकिन जब हमने गोपीकृष्ण पांडे से बात की तो उन्होंने बताया कि वह मुख्य रूप से कानपुर देहात के रहने वाले हैं और दशकों से कानपुर महानगर में ही रह रहे हैं. गोपीकृष्ण पांडेय करीब चार दशक से संगठन की राजनीति से जुड़े रहे हैं. उन्होंने कम उम्र में ही संघ के स्वयंसेवक के रूप में काम शुरू किया. इसके बाद बजरंग दल, हिंदू जागरण मंच और भाजपा से जुड़े अलग-अलग संगठनों में जिम्मेदारियां संभालीं. 1998 में उन्हें भाजयुमो का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया था. इसके बाद किसान मोर्चा में भी प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली. उन्होंने दूसरे राज्यों में संगठन का काम भी संभाला.

भाजपा के बड़े कार्यकर्ता, लेकिन लाइमलाइट से दूर
हालांकि पिछले कुछ समय से वह सक्रिय चुनावी राजनीति में दिखाई नहीं दे रहे थे. न वह किसी बड़े चुनावी चेहरे के तौर पर सामने थे और न ही लगातार राजनीतिक चर्चाओं में बने हुए थे. यही वजह रही कि राज्यसभा के लिए उनका नाम सामने आते ही बड़ी संख्या में लोगों ने उनके बारे में जानना शुरू किया. भाजपा के भीतर भी उनकी पहचान एक ऐसे कार्यकर्ता की रही है, जिसने लंबे समय तक संगठन के लिए काम किया, लेकिन कभी खुद को राजनीति के केंद्र में रखने की कोशिश नहीं की.

25 साल पुराना ‘गदर’ का किस्सा फिर चर्चा में
गोपीकृष्ण पांडेय के राज्यसभा पहुंचने के साथ उनका करीब 25 साल पुराना एक किस्सा भी अचानक चर्चा में आ गया. वर्ष 2001 में नरेंद्र मोदी संगठन के काम से कानपुर आए थे. उस समय वह गोपीकृष्ण पांडेय के घर भी रुके थे. इसी दौरान दोनों एक साथ फिल्म देखने गए थे. उस समय ‘गदर’ फिल्म काफी चर्चित थी और दोनों ने कानपुर के एक सिनेमाघर में यह फिल्म देखी थी.

करीब ढाई दशक पुरानी यह मुलाकात अब इसलिए चर्चा में है, क्योंकि उस समय संगठन के एक सामान्य कार्यकर्ता के घर ठहरने वाले नरेंद्र मोदी आज देश के प्रधानमंत्री हैं और उसी दौर में उनके संपर्क में रहे गोपीकृष्ण पांडेय अब राज्यसभा जाने की तैयारी में हैं. हालांकि पांडेय की राजनीतिक पहचान किसी बड़े नेता के करीबी चेहरे से ज्यादा लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ता की रही है.

संगठन में काम करने वालों को बड़ा मौका
गोपीकृष्ण पांडेय को राज्यसभा भेजने के फैसले को भाजपा की संगठन आधारित राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है. पार्टी में ऐसे कई उदाहरण पहले भी सामने आए हैं, जब लंबे समय तक संगठन में काम करने वाले और सार्वजनिक तौर पर कम दिखाई देने वाले कार्यकर्ताओं को अचानक बड़ी जिम्मेदारी दी गई. इनमें राज्यसभा, विधानसभा, संगठन के बड़े पद और सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां तक शामिल रही हैं.

पांडेय के मामले में भी यही तस्वीर दिखाई दे रही है. लंबे समय तक पार्टी के लिए काम करने के बाद अब उन्हें संसद के उच्च सदन में जाने का मौका मिला है. खास बात यह है कि जब तक उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं हुई, तब तक उनका नाम राज्यसभा की दौड़ में बहुत ज्यादा चर्चा में नहीं था.



Source link