Harish Rawat How He Saved His Government In 2026: उत्तराखंड में अगले साल के शुरू में चुनाव होने वाले हैं. इस बीच कांग्रेस पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. प्रदेश कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत अलग राह पर चल रहे हैं. पार्टी नेतृत्व के साथ उनकी दूरी लगातार बढ़ रही है. ऐसे में सवाल यह है कि चुनाव से पहले क्या वह कांग्रेस से दूरी बना लेंगे या फिर वह पार्टी नेतृत्व पर दबाव डालने की रणनीति के तहत अलग राह पर चल रहे हैं. दरअसल, ताजा रिपोर्ट के मुताबिक हरीश रावत प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व को जानकारी दिए बिना अपने स्तर पर कार्यक्रम कर रहे हैं. इसको लेकर प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने चिट्ठी लिखी थी. उन्होंने इस चिट्ठी का भी जवाब नहीं दिया है. यह वही हरीश रावत हैं जिन्होंने 2016 में भाजपा के जबड़े से अपनी सरकार खींच लाई थी. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी और मात्र 46 दिनों के भीतर फिर से अपनी सरकार बहाल करवा ली. हालांकि उसके कुछ भी महीने बाद हुए चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. उसके बाद बीते 10 सालों से वह सत्ता से बाहर है. हरीश रावत को उत्तराखंड की राजनीति में स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी के बाद कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता माना जाता है. लेकिन, वह शख्स आज अलग राह पर चलता दिख रहा है.
2016 में क्या हुआ था, जब रावत ने बचाई सरकार?
हरीश रावत के राजनीतिक जीवन में 2016 का उत्तराखंड संकट सबसे अहम है. मार्च 2016 में कांग्रेस के नौ विधायक बगावत करके भाजपा के साथ चले गए थे. इसके बाद केंद्र ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था. रावत सरकार के पास बहुमत की स्थिति पर सवाल खड़े हो गए थे. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने विधानसभा में फ्लोर टेस्ट कराने का रास्ता साफ किया. 10 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में फ्लोर टेस्ट हुआ. नौ अयोग्य विधायकों को वोट देने की अनुमति नहीं थी. प्रभावी 61 वोटों में हरीश रावत को 33 वोट मिले. इसके बाद केंद्र ने राष्ट्रपति शासन हटाने की प्रक्रिया शुरू करने पर सहमति जताई और रावत फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर लौटे. यानी जिस सरकार को राजनीतिक संकट के बीच सत्ता से बाहर होना पड़ा था, रावत ने उसे अदालत और विधानसभा के रास्ते वापस हासिल कर लिया. यही वजह है कि 2016 की लड़ाई उनकी राजनीतिक पहचान का बड़ा हिस्सा बन गई. लेकिन यह जीत लंबे समय में कांग्रेस के लिए सत्ता नहीं बचा सकी. 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल किया और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. इसके बाद उत्तराखंड में कांग्रेस दो विधानसभा चुनावों में सत्ता में वापसी नहीं कर सकी.
अब रावत और कांग्रेस में क्या खींचतान है?
करीब एक दशक बाद कहानी बदल गई है. इस बार रावत खुद सरकार बचाने की लड़ाई में नहीं हैं, बल्कि अपनी ही पार्टी के संगठनात्मक ढांचे से तालमेल को लेकर सवालों के घेरे में हैं. रावत ने उत्तराखंड में अपनी धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा शुरू की है. पार्टी नेतृत्व को आपत्ति इस बात पर है कि यह कार्यक्रम संगठन के साथ पर्याप्त समन्वय के बिना किया जा रहा है. उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी कुमारी सैलजा ने एक अक्टूबर को रावत को पत्र लिखकर यात्रा पर आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि यात्रा को लेकर न तो उनसे चर्चा की गई और न ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से. सैलजा ने चुनाव के करीब आने का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस को एकजुट होकर जनता के सामने जाना है और ऐसे समानांतर कार्यक्रम पार्टी के हित में नहीं होंगे.
मामला यहीं नहीं रुका. कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने रावत को दिल्ली बुलाया है. पार्टी नेतृत्व की चिंता साफ है कि चुनाव से कुछ महीने पहले अलग-अलग नेताओं के अलग कार्यक्रम संगठन की एकजुटता की तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन रावत ने फिलहाल पीछे हटने का संकेत नहीं दिया है. पांच अक्टूबर को उन्होंने जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा जारी रखने का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि चुनौती बड़ी है, लेकिन उत्तराखंड के सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प भी उतना ही मजबूत है.
आखिर रावत अलग राह क्यों पकड़ रहे हैं?
यही इस पूरे विवाद की सबसे अहम बात है. पहली वजह है अपनी राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करना. हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे पुराने और अनुभवी नेताओं में हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर नेतृत्व की राजनीति बदली है. नई पीढ़ी के नेता आगे आए हैं और संगठन में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही. ऐसे में रावत का लगातार जनता के बीच जाना सिर्फ जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं माना जा सकता. यह अपनी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश भी हो सकती है.
दूसरी वजह है चुनाव से पहले अपनी भूमिका तय करना. विधानसभा चुनाव नजदीक हैं. ऐसे में रावत यह दिखाना चाहते हैं कि राज्य की राजनीति में उनकी पकड़ अभी कायम है. अगर वह लगातार जनता के बीच सक्रिय रहते हैं तो पार्टी आलाकमान के लिए उन्हें नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
तीसरी वजह है कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर मतभेद. रावत लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में अपने अलग अंदाज और मुद्दों के लिए जाने जाते हैं. वह केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर आक्रामक हमला करते रहे हैं. हाल में भी उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके विरोध के कारण ईडी और सीबीआई उनके दरवाजे तक पहुंचती हैं.
क्या हरीश रावत कांग्रेस छोड़ सकते हैं?
फिलहाल ऐसा कोई ठोस संकेत नहीं है कि रावत कांग्रेस छोड़ने जा रहे हैं. उनकी मौजूदा गतिविधियों को ज्यादा सही तरीके से पार्टी के भीतर अपनी राजनीतिक जगह बनाए रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. वह कांग्रेस के खिलाफ नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर रहते हुए अपनी राजनीतिक लाइन पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. हालांकि पार्टी नेतृत्व से टकराव अगर लगातार बढ़ता है तो स्थिति बदल सकती है. चुनाव के ठीक पहले किसी बड़े नेता और आलाकमान के बीच खुला विवाद कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है. लेकिन अभी तस्वीर यह है कि रावत पार्टी छोड़ने की बजाय पार्टी नेतृत्व की आपत्ति के बावजूद अपना राजनीतिक अभियान जारी रखे हुए हैं.
कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती
हरीश रावत को लेकर कांग्रेस की मुश्किल यह है कि उन्हें पूरी तरह रोकना भी आसान नहीं है और उन्हें पूरी तरह खुली छूट देना भी पार्टी के लिए जोखिम भरा हो सकता है. रावत के पास लंबा राजनीतिक अनुभव है और उत्तराखंड में उनका अपना समर्थक आधार है. दूसरी तरफ पार्टी संगठन चाहता है कि विधानसभा चुनाव में सभी नेता एक मंच और एक रणनीति के साथ मैदान में उतरें. यही टकराव आने वाले दिनों में और बढ़ सकता है. अगर कांग्रेस नेतृत्व रावत को ज्यादा रोकता है तो उनके समर्थकों में नाराजगी पैदा हो सकती है. अगर उन्हें पूरी आजादी देता है तो दूसरे नेताओं के बीच भी अलग-अलग कार्यक्रमों और समानांतर नेतृत्व की मांग उठ सकती है.
2016 का रावत और 2026 का रावत
यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू है. 2016 में हरीश रावत अपनी सरकार बचाने के लिए अदालत से विधानसभा तक लड़ रहे थे. तब उनकी लड़ाई भाजपा और केंद्र की सत्ता के खिलाफ थी. आज वह कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक भूमिका और स्वतंत्रता को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं. तब उन्होंने 46 दिन के राजनीतिक संकट के बाद 33 वोट जुटाकर अपनी सरकार वापस हासिल की थी. आज उनके सामने चुनौती सरकार बचाने की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता और कांग्रेस में अपनी जगह बचाए रखने की है.