मंगल पर कैसा होगा इंसानों का घर? वैज्ञानिकों ने बनाया लिविंग मैटेरियल जो यीस्ट और रेत से होगा तैयार

मंगल पर कैसा होगा इंसानों का घर? वैज्ञानिकों ने बनाया लिविंग मैटेरियल जो यीस्ट और रेत से होगा तैयार


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मंगल पर कैसा होगा इंसानों का घर? वैज्ञानिकों ने बनाया खास लिविंग मैटेरियल

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मंगल ग्रह के लिए वैज्ञानिकों ऐसी निर्माण सामग्री विकसित की है जो आसानी से बनाई जा सकती है. यह एक लिविंग मैटेरियल होगी जो लाल ग्रह के वातावरण के अनुसार प्रतिक्रिया कर खुद को मजबूत करेगी. खास बात ये है कि इसके लिए न तो भारी मशीनों की जरूरत पड़ेगी और न ही भारी निर्माण सामग्री ले जानी होगी.

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वैज्ञानिकों ने ऐसा लिविंग मैटेरियल बनाया है जो मंगल पर घर बनाने में सहायक होगा. (फोटो-pixabay)

मंगल ग्रह पर इंसानों के लिए बस्ती बनानी है. मगर बड़ा सवाल ये है कि ये बनेगी कैसे? क्या धरती से ईंट-पत्थर और सरिया ले जानी होंगी? वैज्ञानिकों ने इसका जवाब तलाश लिया है. हांगकांग के वैज्ञानिकों ने ऐसा लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल यानी जिंदा ईंट बनाने का दावा किया है जो यीस्ट जिलेटिन और रेत की मदद से तैयार होगा. खास बात ये है कि मंगल ग्रह के वातावरण में भी इसे 3D से प्रिंट किया जा सकेगा. लिविंग मैटेरियल वो निर्माण सामग्री होती है जो पर्यावरण के हिसाब से प्रतिक्रिया करती है.

यह रिसर्च द हॉन्ग कॉन्ग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के सिविल इंजीनियर जिशेन क्यू और उनकी टीम ने की है. हाल ही में इसे अंतरराष्ट्रीय जर्नल केम सर्कुलेरिटी में प्रकाशित किया गया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक भविष्य में जब इंसान मंगल ग्रह पर जाएगा तो वहां भारी मशीनें और सीमेंट ले जाने की जरूरत होगी. वैज्ञानिकों का दावा है कि जो लिविंग बिल्डिंग मैटेरियल बनाया गया है वह मंगल ग्रह के वातावरण में बेहतरीन साबित होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि वहां -30डिग्री सेल्सियस तापमान है. वहां हवा का दबाव बहुत कम है. इसीलिए 3D प्रिंटर से इसे किसी दीवार या ईंट की शक्ल में ढाला जा सकेगा.

मंगल पर घर बनाना मुश्किल क्यों है?

लाल ग्रह पर बस्ती बसाने की बात जितनी रोमांचक लगती है, यह उतनी ही कठिन है. वहां का वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में बेहद पतला है. तापमान अक्सर शून्य से 50 डिग्री सेल्सियस नीचे तक पहुंच जाता है. ऐसे में पृथ्वी से निर्माण सामग्री को ले जाना बेहद महंगा और जोखिम भरा है. अब तक वैज्ञानिकों के पास एक प्रमुख विकल्प यह था कि मंगल की मिट्टी यानी रेगोलिथ को करीब 1000 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म करके ईंट बनाई जाए, लेकिन इसके लिए भारी मशीनों की जरूरत थी. इसीलिए वैज्ञानिक लगातार कम लागत और कम ऊर्जा वाले विकल्प तलाश रहे हैं.

क्या है नई जिंदा ईंट?

हांगकांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और हांगकांग पॉलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर यह तकनीक विकसित की है. रिसर्च के मुताबिक रेत या अन्य दानेदार कण, जिलेटिन आधारित हाइड्रोजेल और यीस्ट से जिंदा ईंट बनाई जाएगी. इसके लिए वैज्ञानिकों ने यीस्ट की सतह पर चिपकने वाले प्रोटीन लगाए हैं. ये वो प्रोटीन है जो समुद्री जीवों को चट्टानों से चिपके रहने में मदद करते हैं. यही प्रोटीन नई सामग्री को मजबूत करता है. दरअसल यीस्ट एक जैविक गोंद की तरह काम करता है. यह जिलेटिन और रेत के कणों को मजबूती से जोड़ता है. जब मिश्रण को कम दबाव वाले वातावरण में सुखाया जाता है, तो पानी निकल जाता है और एक मजबूत संरचना बन जाती है.

कैसे होगा इसका निर्माण

मंगल पर यह निर्माण सामग्री बनाने के लिए अंतरिक्ष यात्री अपने साथ यीस्ट और जिलेटिन लेकर जाएंगे जो बेहद हल्के होते हैं. मंगल ग्रह पर लाल मिट्टी यानी वहां की रेत को यीस्ट और जिलेटिन के साथ मिलाया जाएगा. इसमें बहुत कम मात्रा में पानी डाला जाएगा ताकि यह एक पेस्ट में बदल जाए. इस पेस्ट को एक रोबोटिक 3D प्रिंटर में डाला जाएगा. यह प्रिंटर कंप्यूटर डिजाइन के हिसाब से एक के ऊपर एक परत चढ़ाते हुए दीवार, कमरों का ढांचा तैयार करेगा. वहां का वातावरण यानी कड़ाके की ठंड इसे तुरंत जमा देगी. वहां हवा का दबाव बहुत कम है. इससे पेस्ट के अंदर का पानी बहुत जल्दी निकल जाएगा. इससे निर्माण सामग्री मजबूत और सख्त बन जाएगी.

कितनी मजबूती होगी सामग्री?

वैज्ञानिकों के मुताबिक यीस्ट की मौजूदगी से यह संरचना बहुत ज्यादा मजबूत होगी. शोधकर्ताओं के अनुसार इस नई सामग्री की कम्प्रेसिव स्ट्रेंथ लगभग 12 मेगापास्कल है. यह परीक्षण में इस्तेमाल किए गए सामान्य नमूनों की तुलना में करीब 170 प्रतिशत ज्यादा मजबूत है. यह मजबूती कई पारंपरिक निर्माण सामग्रियों की श्रेणी में आती है. यानी यह सिर्फ प्रयोगशाला का प्रयोग नहीं, बल्कि भविष्य में वास्तविक निर्माण कार्य के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.

मंगल जैसी परिस्थिति में सफल परीक्षण

वैज्ञानिकों ने सिर्फ सिद्धांत नहीं दिया, बल्कि इसका व्यावहारिक परीक्षण भी किया है. उन्होंने एक विशेष पर्यावरणीय कक्ष में इस सामग्री से 3D प्रिंटिंग की. वहां का दबाव 0.01 वायुमंडल और तापमान -30 डिग्री सेल्सियस रखा गया था, जो मंगल ग्रह की परिस्थितियों की तरह है. इस परीक्षण में लगभग 45 मिलीमीटर ऊंची और 30 मिलीमीटर व्यास वाली एक छोटी संरचना सफलतापूर्वक तैयार की गई. इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत एनर्जी की कम जरूरत है. शोधकर्ताओं के मुताबिक एक घर मीटर निर्माण सामग्री के लिए सोलर पैनल को एक घंटे से भी कम समय चलाना होगा.



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