धरती से ही बादलों में छिपी बिजली का पता लगाएंगे वैज्ञानिक… खोजी नई तरकीब
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आसमान में चमकने वाली बिजली बादलों में कितनी है इसका पता अब वैज्ञानिक धरती से ही लगा सकेंगे. ऊटी स्थित टेलीस्कोप ने इसकी तरकीब खोज निकाली है. वैज्ञानिकों के मुताबिक म्यूऑन की संख्या देकर इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.
वैज्ञानिक अब धरती से ही बादलों के बीच की बिजली का पता लगाएंगे. (फोटो-pixabay)
आसमान में काले बादल छाते हैं, अचानक बिजली चमकती है और कुछ ही सेकेंड में तेज गरज सुनाई देती है. इन बादलों के अंदर कितनी बिजली जमा है ये पता लगाना आसान नहीं होता. अब वैज्ञानिकों ने जो तरीका खोजा है उससे धरती से ही ये पता लगाया जा सकेगा कि बादलों के अंदर कितनी बिजली है. इस तकनीक में न तो रॉकेट भेजना पड़ेगा और न ही कोई विमान तूफान के बीच उड़ाना होगा. म्यूऑन नाम के कण आसानी से इसकी जानकारी दे देंगे.
तमिलनाडु के ऊटी में लगे GRAPES-3 टेलीस्कोप ने ये तरकीब खोजी है. ये टेलीस्कोप हर दिन तकरीबन चार अरब म्यूयॉन दर्ज करता है. कॉस्मोलोजी एंड एस्ट्रोपार्टिकल फिजिक्स में प्रकाशित जर्नल के मुताबिक टेलीस्कोप में पिछले एक दशक से लगातार ये एक अजीब पैटर्न देख रहा है, जिसके मुताबिक पश्चिम की तुलना में पूर्व की दिशा में छह गुना ज्यादा तूफान दिखाई दिए हैं. वैज्ञानिक पहले ये मान रहे थे कि शायद पूर्व की दिशा में ज्यादा ताकतवर तूफान बनते हैं, हालांकि जमीन पर लगे मौसम सेंसरों ने इस धारणा को गलत साबित किया है. इसके बाद वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि ये अंतर म्यूऑन की वजह से नजर आता है.
ऊटी में लगा GRAPES-3 टेलीस्कोप आसमान से धरती पर आने वाले बेहद छोटे कणों की गिनती करता है इन्हें म्यूऑन कहते हैं. यह अंतरिक्ष से आने वाली कॉस्मिक किरणों की वजह से बनने वाला एक कण है. कॉस्मिक किरणों में मुख्य रूप से प्रोटॉन जैसे तेज गति वाले कण होते हैं जब ये धरती के ऊपरी वायुमंडल से टकराते हैं तो इनसे कई कण बनते हैं, जिन्हें म्यूऑन कहते हैं. यह रोशनी की स्पीड से धरती तक पहुंचते हैं. इनकी यही खासियत वैज्ञानिकों के लिए बेहद उपयोगी है. म्यूऑन बादलों और वातावरण से गुजरते वक्त गर उन्हें किसी ऐसे क्षेत्र का सामना करना पड़े जो ज्यादा बिजली वाला है तो उनकी गति और संख्या में बदलाव आ जाता है.
ऊटी की पहाड़ियों पर GRAPES-3 टेलीस्कोप 2200 मीटर ऊंचाई पर है. इसके डिटेक्टर लगभग 560 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैले हैं, जिनके ऊपर कंक्रीट की मोटी परत भी मौजूद है. यह उपकरण 4 अरब म्यूऑन रिकॉर्ड करता है. वैज्ञानिक इसी का इस्तेमाल कर तूफानों को समझते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक यही वजह है कि गुब्बारे या रॉकेट की तुलना में इससे लंबे समय तक और बड़े इलाके के तूफानों का अध्ययन किया जा सकता है.
गरज वाले बादलों में ज्यादा बिजली होती है. जब वहां से म्यूऑन गुजरता है तो ये या तो कम हो जाते हैं या बढ़ जाते हैं. अगर बिजली ज्यादा है तो इनकी संख्या कम हो जाती है और अगर बादलों में बिजली कम है तो इनकी संख्या बढ़ सकती है. इससे वैज्ञानिक बादल के अंदर मौजूद विद्युत क्षेत्र का अनुमान लगा सकते हैं. शोधकर्ताओं ने अप्रैल 2011 से दिसंबर 2020 तक GRAPES-3 के आंकड़ों का अध्ययन किया. इस दौरान टेलीस्कोप ने 487 ऐसे तूफान दर्ज किए जिनमें म्यूऑन की संख्या में 0.3 प्रतिशत से ज्यादा का बदलाव आया था. इनमें 81.5 प्रतिशत तूफान पूर्व दिशा में नजर आए थे. वैज्ञानिकों के मन में सवाल आया कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है.
वैज्ञानिकों ने जमीन पर लगे चार इलेक्ट्रिक फील्ड सेंसर के आंकड़े देखे. जो बादलों और विद्युत क्षेत्र की निगरानी करते हैं. इन सेंसरों ने उसी 10 साल समय में पश्चिम की ओर जाने वाले 848 तूफान रिकॉर्ड किए, जबकि पूर्व की ओर बढ़ने वाले तूफानों की संख्या 712 रही. यानी जमीन पर मौजूद मौसम संबंधी आंकड़े तो उलटी तस्वीर दिखा रहे थे. वास्तव में पश्चिम की ओर जाने वाले तूफान थोड़े ज्यादा थे. इससे साफ हो गया कि GRAPES-3 के आंकड़ों में पूर्व दिशा के तूफानों की संख्या ज्यादा दिखने की वजह मौसम नहीं थी. बल्कि चुंबकीय क्षेत्र और उससे प्रभावित म्यूऑन थे.
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