ब्रिटेन अब चीन में बनी इलेक्ट्रिक कारों पर भारी टैरिफ लगाने की तैयारी कर रहा है. वजह साफ है कि ब्रिटेन के बाजार में चीनी कारों की पकड़ तेजी से बढ़ रही है. सरकार को डर है कि चीन की सब्सिडी वाली सस्ती कारें स्थानीय कंपनियों पर दबाव बढ़ा रही हैं. अगर ऐसा ही रहा तो यहां की कंपनियों के लिए आफत आ जाएगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या यह फैसला भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है, जिसने हाल ही में ब्रिटेन के साथ बड़ी डील साइन की है.
दरअसल, ब्रिटेन में फिलहाल चीन से आने वाली इलेक्ट्रिक कारों पर करीब 10% इंपोर्ट ड्यूटी है. अब सरकार इस शुल्क को बढ़ाने के विकल्प देख रही है. मामला इसलिए बड़ा है क्योंकि ब्रिटेन के बाजार में चीनी कंपनियों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है. BYD, Geely और Chery जैसी कंपनियां ब्रिटेन में अपनी मौजूदगी बढ़ा रही हैं.
सितंबर में ब्रिटेन में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में सालाना आधार पर 36.3% की बढ़ोतरी हुई. इसी दौरान चीनी ब्रांड भी बाजार में तेजी से आगे बढ़े. यानी ब्रिटेन के सामने इस बात का संकट है कि सस्ती चीनी कारों को खुला बाजार दिया जाए या अपनी कार इंडस्ट्री को बचाया जाए?
चीन की कारों से ब्रिटेन को दिक्कत क्यों?
ब्रिटेन की चिंता सिर्फ यह नहीं है कि चीनी कारें सस्ती हैं. चीन की कंपनियां बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक कारें बनाती हैं. चीन में EV की कीमतों को लेकर लंबे समय से जबरदस्त प्रतिस्पर्धा चल रही है. इससे कंपनियां कम कीमत पर कारें बेचने के लिए मजबूर होती हैं.
ब्रिटेन को आशंका है कि चीन की सरकारी मदद और बड़े पैमाने की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के कारण चीनी कंपनियों को फायदा मिल रहा है. ब्रिटिश अधिकारियों के सामने यह चिंता भी है कि अगर चीनी कंपनियां इसी रफ्तार से बाजार हिस्सेदारी बढ़ाती रहीं तो स्थानीय कार कंपनियों पर कीमत घटाने का दबाव और बढ़ेगा.
यूरोप पहले ही चीन पर लगा चुका है भारी शुल्क
यूरोपियन यूनियन पहले ही चीन में बनी इलेक्ट्रिक कारों पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है. वहां चीनी EV पर कुल शुल्क कंपनी के हिसाब से करीब 45% तक पहुंच सकता है. अमेरिका ने भी चीनी EV पर करीब 100% टैरिफ लगाया हुआ है. अब ब्रिटेन अगर सिर्फ 10% शुल्क पर बना रहता है तो उसकी कारों का बाजार चीन की कंपनियों के लिए अमेरिका और यूरोप की तुलना में ज्यादा खुला रहेगा.
ब्रिटेन को यूरोप का भी डर
ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन से बाहर निकल चुका है. लेकिन उसकी कार इंडस्ट्री का कारोबार यूरोप से गहराई से जुड़ा है. अब यूरोप अपनी मेड इन यूरोप पॉलिसी के तहत लोकल प्रोडक्शन और लोकल सप्लाई चेन को बढ़ावा देना चाहता है.
ब्रिटेन को डर है कि अगर उसने चीनी कारों पर यूरोप की तुलना में बहुत कम शुल्क रखा, तो चीन की कंपनियां ब्रिटेन को यूरोपीय बाजार तक पहुंच बनाने के रास्ते के तौर पर इस्तेमाल कर सकती हैं. इससे ब्रिटेन की अपनी कंपनियों के लिए यूरोप में कारोबार करना मुश्किल हो सकता है. इसलिए लंदन पर यूरोपीय नीति के साथ तालमेल बनाने का दबाव भी है.
लेकिन इतनी हिचक क्यों
चीन पर शुल्क लगाना इतना आसान भी नहीं है. चीन अगर ब्रिटिश कारों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई करता है तो ब्रिटेन के बड़े एक्सपोर्टर्स को नुकसान हो सकता है. यही वजह है कि ब्रिटिश सरकार टैरिफ पर फैसला लेने से पहले इंडस्ट्री से बातचीत कर रही है. सरकार चाहती है कि अगर शुल्क बढ़ाया जाए तो उसका असर ब्रिटेन के दूसरे कारोबार पर बहुत ज्यादा न पड़े.
लेकिन क्या भारत को क्या फायदा?
अगर चीन की EV के लिए अमेरिका, यूरोप और ब्रिटेन जैसे बड़े बाजारों में प्रवेश मुश्किल होता है, तो भारतीय बाजार और भारतीय मैन्युफैक्चरिंग को मौका मिल सकता है. भारत भी अपनी इलेक्ट्रिक कार इंडस्ट्री खड़ी कर रहा है. टाटा मोटर्स, महिंद्रा और दूसरी कंपनियां EV सेगमेंट में निवेश कर रही हैं. लेकिन सिर्फ चीन पर टैरिफ लगने से भारत को सीधा फायदा नहीं मिल जाएगा. इसके लिए भारत को अपनी बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोटर, सेमीकंडक्टर और EV सप्लाई चेन मजबूत करनी होगी.
चीन से हटेगा कारोबार तो भारत के पास मौका
चीन की EV कंपनियों के लिए पश्चिमी बाजार कठिन होने पर उन्हें नए बाजार और नई मैन्युफैक्चरिंग लोकेशन तलाशनी पड़ेंगी. भारत यहां एक विकल्प बन सकता है. अगर चीन की कंपनियां भारत में कार बनाती हैं, स्थानीय सप्लायर तैयार करती हैं और यहां से दूसरे देशों को एक्सपोर्ट करती हैं तो भारत को निवेश, रोजगार और एक्सपोर्ट तीनों का फायदा मिल सकता है. लेकिन इसके लिए भारत को यह भी तय करना होगा कि विदेशी कंपनियों को सिर्फ भारतीय बाजार न मिले, बल्कि भारत में उत्पादन और स्थानीय वैल्यू एडिशन भी बढ़े.