अचानक आई दूध उत्पादन में गिरावट! तो इस खतरनाक रोग का है लक्षण, जानिए इलाज
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दुधारू पशुओं में होने वाली थनों में सूजन से डेयरी सेक्टर में करोड़ों का नुकसान होता है. ऐसे में लोकल 18 ने थनैला यानी मैस्टाइटिस की समस्या और इसके समाधान के लिए पशुपालन विभाग के उपसंचालक डॉक्टर घनश्याम परते से चर्चा की, जानिए उन्होंने पशुपालक भाइयों को क्या सलाह दी है.
भारतीय किसानों के लिए डेयरी उद्योग अपनी आय बढ़ाने का एक अहम जरिया है. किसान भाई गाय-भैंस पालकर न सिर्फ देश में दूध उत्पादन में बढ़ावा दे रहे है बल्कि अपनी खेती के लिए कई घटक भी तैयार कर रहे हैं. ऐसे में पशुधन किसान परिवार के लिए अहम है. लेकिन वहीं पशु बीमार हो जाता है, तो किसान परेशान हो जाता है. ऐसे में पशुओं के स्वास्थ्य की किसान भाई बेहद गंभीरता से ध्यान रखते हैं. लेकिन कई बार देखने में आता है कि दुधारू पशुओं को थनैला रोग हो जाता है. इससे न सिर्फ पशु परेशान रहता है बल्कि किसान की आमदनी पर भी असर पड़ता है. अक्टूबर का महीना मौसम के बदलाव का महीना होता है. ऐसे में हवा में नमी और बैक्टीरिया का खतरा बढ़ जाता है.
थनैला रोग खास तौर से गाय, भैंस और बकरी के थनों यानी स्तन ग्रंथियों में होने वाला रोग है. यह एक बैक्टीरियल डिजीज है. बैक्टीरिया के थन के छिद्रों से पशु के शरीर में प्रवेश करता है. यह रोग इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि इसमें अदृश्य थनैला यानी सब क्लिनिकल थनैला भी होता है. एक थनैला में तेज सूजन, लाली और दर्द होता है. दूध का रंग भी खून मिला हुआ पीला नजर आता है. सब क्लीनिक थनैला में कोई लक्षण ही नजर नहीं आते हैं लेकिन दूध अंदर ही अंदर कम हो जाता है और उत्पादन क्षमता में 10 से 30 प्रतिशत तक की गिरावट आ जाती है. ऐसे में सबसे ज्यादा खतरनाक यह हो जाता कि बिना लक्षण के उत्पादन में गिरावट आ जाती है.
अब समझिए क्यों हो जाता है पशुओं को थनैला
थनैला रोग एक जीवाणु जनित रोग है. ऐसे में पशुशाला में सफाई के अभाव में यह रोग फैलने का खतरा रहता है. पशुओं के बैठने वाली जगहों पर गोबर, मूत्र या फिर कीचड़ के रहने से बैक्टीरिया तेजी से फैल सकते हैं. वहीं, दूध के दुहने के समय आप अगर अंगूठे को अंदर की ओर मोड़कर थन दबाने से टिश्यू डैमेज हो जाते हैं. ऐसे में संक्रमण के लिए रास्ता तैयार हो जाता है. इसके अलावा दूध दुहने के तुरंत बाद पशु बैठ जाता है, तो पशु को यह रोग लग सकता है.
अब जानिए बचाव के उपाय
एक्सपर्ट्स की मानें तो थनैला में सावधानी ही सबसे बड़े बचाव के उपाय है. थनैला रोग से बचाव के लिए दूध दुहने के बाद थनों की आयोडीन घोल से टीट डिपिंग करें और पशुशाला का फर्श हमेशा सूखा रखें. दूध निकालने के बाद पशु को 30-40 मिनट तक बैठने न दें और हमेशा हाथ की पांचों उंगलियों (पूर्ण हस्त विधि) से ही दूध निकालें. शुरुआती लक्षण दिखने पर पशु चिकित्सक की सलाह के साथ 50 ग्राम पिसी काली मिर्च, 200 ग्राम घी और चीनी का मिश्रण देना सूजन कम करने में मददगार होता है.