रूस के साथ दशकों पुराने रिश्तों को लेकर विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक बार फिर भारत का रुख साफ किया है. उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति किसी पश्चिमी भू-राजनीतिक खेमे के हिसाब से नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक जरूरतों और ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर तय होती है. म्यूनिख लीडर्स मीटिंग में भारत-रूस संबंधों के भविष्य पर चर्चा के दौरान जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों की नींव काफी पुरानी है और भारत उस इतिहास को नहीं भूल सकता.
जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के बीच विशेष रूप से 1950 के दशक से मजबूत संबंध रहे हैं. उन्होंने उस दौर को याद करते हुए कहा कि जब भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय अखंडता के सामने चुनौतियां थीं, तब सोवियत संघ ने कई मौकों पर भारत का साथ दिया था. उनके मुताबिक, उस समय दुनिया के कई देश भारत के पड़ोसी सैन्य शासन के समर्थन में खड़े थे, लेकिन रूस के साथ भारत के रिश्ते अलग रहे.
‘इतिहास भूला नहीं भारत’
जयशंकर ने कहा कि भारत-रूस संबंधों पर चर्चा करते समय इस ऐतिहासिक विरासत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच रिश्ते समय के साथ बदले हैं और अब ये सिर्फ रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं.
विदेश मंत्री के मुताबिक, भारत और रूस के संबंधों में रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्र तो महत्वपूर्ण हैं ही, इनके साथ व्यापार, निवेश, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का सहयोग भी लगातार बढ़ा है.
उन्होंने कहा कि भारत का रूस के साथ अनुभव अब तक और लगातार सकारात्मक रहा है. यही वजह है कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत दोनों देशों के बीच अपने संबंधों को राष्ट्रीय हित के नजरिए से देखता है.
रक्षा से लेकर ऊर्जा तक फैले रिश्ते
भारत और रूस के संबंधों की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि इनका दायरा समय के साथ लगातार बढ़ा है. शीत युद्ध के दौर में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बेहद महत्वपूर्ण था, लेकिन आज यह रिश्ता ऊर्जा, व्यापार, निवेश, परमाणु क्षेत्र और अंतरिक्ष सहयोग तक पहुंच चुका है.
जयशंकर ने इसी व्यापक रिश्ते की ओर इशारा करते हुए कहा कि भारत-रूस संबंधों में सैन्य और परमाणु सहयोग के साथ-साथ दोनों देशों के बीच बड़ी मात्रा में व्यापार और निवेश भी होता है. ऊर्जा और संसाधनों के क्षेत्र में भी दोनों देश महत्वपूर्ण साझेदार हैं.
ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति रूस को लेकर अलग-अलग खेमों में बंटी हुई है, भारत का रुख यह रहा है कि वह अपने रणनीतिक हितों के आधार पर रूस के साथ संबंध बनाए रखेगा.
यूक्रेन युद्ध पर भी भारत का स्टैंड साफ
जयशंकर ने कहा कि हाल के महीनों में भारत ने इस दिशा में अपनी सक्रियता बढ़ाई है और रूस तथा यूक्रेन दोनों के साथ बातचीत की है. भारत का प्रयास है कि दोनों पक्षों के बीच संवाद का रास्ता खुला रहे.
ब्लैक सी से ऊर्जा तक, भारत की मध्यस्थ भूमिका
विदेश मंत्री ने बताया कि भारत केवल युद्ध खत्म करने की सामान्य अपील तक सीमित नहीं है, बल्कि कुछ व्यावहारिक मुद्दों पर भी दोनों पक्षों के साथ बातचीत कर रहा है. उन्होंने कहा कि भारत ने ब्लैक सी में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही जैसे मुद्दे से शुरुआत की है. इसके अलावा अनाज निर्यात, ऊर्जा निर्यात और एक-दूसरे पर हमले नहीं करने की संभावनाओं जैसे तत्काल मुद्दों पर भी दोनों पक्षों की चिंताओं को समझने की कोशिश की जा रही है.
जयशंकर के मुताबिक, भारत की कोशिश दोनों देशों के बीच ऐसे क्षेत्रों में समाधान तलाशने की है, जहां तत्काल प्रगति संभव हो सकती है.
पश्चिमी दबाव से अलग भारत का अपना रास्ता
जयशंकर का यह बयान ऐसे समय आया है जब रूस के साथ संबंधों को लेकर पश्चिमी देशों की नजर भारत पर बनी हुई है. यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोप ने रूस पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए हैं और रूस से आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों को लेकर सहयोगी देशों से भी अपने रुख पर पुनर्विचार की उम्मीद की है.
हालांकि, भारत ने लगातार कहा है कि उसकी विदेश नीति किसी दूसरे देश के दबाव में नहीं, बल्कि अपने हितों के आधार पर तय होगी. रूस के साथ पुराने रक्षा संबंध, ऊर्जा जरूरतें, व्यापारिक हित और रणनीतिक साझेदारी इस नीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.