पटनाः आज बाजार में जूते-चप्पलों के कई तरह के ऑप्शन मौजूद हैं, लेकिन असली चमड़े से हाथों से तैयार किए गए जूतों की अपनी अलग पहचान होती है. नालंदा के रहने वाले जगदेव रविदास इसी पारंपरिक कारीगरी को आज भी जिंदा रखे हुए हैं. उनके लिए जूता बनाना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों से चला आ रहा पुश्तैनी हुनर है. दादा से पिता और फिर पिता से जगदेव तक पहुंची यह कारीगरी आज उनके परिवार की रोजी-रोटी का जरिया बनी हुई है.
जगदेव रविदास नालंदा जिले के रहने वाले हैं. लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि उनके दादा भी चमड़े के जूते बनाया करते थे और उनके पिता ने भी इसी काम को आगे बढ़ाया. अब वह खुद तीसरी पीढ़ी के कारीगर के तौर पर इस हुनर को आगे बढ़ा रहे हैं.
1980 में पिता से सीखी कारीगरी
जगदेव ने बताया कि उन्होंने 1980 में अपने पिता से जूते बनाने की कारीगरी सीखी थी. इसके बाद उन्होंने इसी काम को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया. वह बताते हैं कि पहले उनके समाज में चमरखानी जूते बनाए जाते थे. उस समय लोग जूतों को टिकाऊ बनाने के लिए सरसों का तेल और रेडी का तेल भी इस्तेमाल करते थे. समय के साथ जूते बनाने के तरीके और बाजार में इस्तेमाल होने वाली सामग्री बदली, लेकिन जगदेव ने अपने काम की मूल पहचान नहीं बदली. वह आज भी असली चमड़े से जूते-चप्पल तैयार करते हैं.
रेक्सीन का सहारा नहीं, चमड़ा ही उनकी पहचान
जगदेव अपने बनाए जूते दिखाते हुए बताते हैं कि इनमें इस्तेमाल होने वाला चमड़ा असली है. जब से उन्होंने कारीगरी सीखी है, तब से उन्होंने रेक्सीन के फॉर्म पर काम नहीं किया. उनका जोर हमेशा चमड़े से जूते तैयार करने पर रहा है. जूते के निर्माण में केवल ऊपरी हिस्से का ही नहीं, बल्कि सोल तैयार करने का काम भी लंबे समय तक हाथ से किया जाता रहा है. इसीलिए वे अपने बैनर पर यह भी लिखते हैं कि रेक्सीन या फोम साबित करने वाले को 5000 रूपये इनाम दिया जायेगा.
जगदेव बताते हैं कि पहले वह चमड़े और रबर के सोल भी खुद तैयार करते थे. बड़े-बड़े चमड़े के टुकड़े आते थे, जिन्हें जरूरत के मुताबिक हाथ से काटकर आकार दिया जाता था. इसके बाद उसे जूते के हिसाब से तैयार और सेट किया जाता था. समय के साथ पीवीसी सोल का इस्तेमाल बढ़ा तो उन्होंने उसमें भी काम शुरू किया, लेकिन हाथ से जूते बनाने की उनकी कारीगरी अब भी बरकरार है.
सरकारी मदद और जीविका से कारोबार को मिली रफ्तार
पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाने में जगदेव के परिवार को सरकारी योजनाओं और जीविका से भी मदद मिली. वह बताते हैं कि बिहार सरकार की एससी-एसटी योजना के तहत उन्हें 12 लाख रुपये की सहायता मिली. इस मदद से उनके काम को आगे बढ़ाने में सहयोग मिला.
जगदेव की पत्नी 2012 में जीविका से जुड़ी थीं. वह बताते हैं कि नालंदा जिले से ही जीविका की शुरुआत हुई थी और उसी समय से उनकी पत्नी इससे जुड़ी हुई हैं. जीविका से जुड़ने के बाद परिवार को इस काम को आगे बढ़ाने में काफी मदद मिली.
अब खादी मॉल तक पहुंच रहा है उनका सामान
कभी स्थानीय स्तर पर पुश्तैनी कारीगरी के जरिए परिवार चलाने वाले जगदेव अब अपने बनाए जूते-चप्पल बड़े बाजार तक पहुंचा रहे हैं. वह बताते हैं कि उनके उत्पाद बिहार सरकार के खादी मॉल में भी दिए जा रहे हैं. इसके अलावा मुजफ्फरपुर स्थित बिहार सरकार के खादी मॉल में भी उनके बनाए सामान की आपूर्ति की जा रही है.
होलसेल में भी कर सकते हैं खरीद
जगदेव अब इस काम को और आगे बढ़ाना चाहते हैं. उनका कहना है कि जो लोग उनके बनाए जूते चप्पलों होलसेल में खरीदना चाहते हैं और अपने दुकान पर बेचना चाहते हैं, वे उनसे मोबाइल नंबर 7562017363 पर संपर्क कर सकते हैं. जरूरत के अनुसार उन्हें सैंपल भेजा जाएगा या फिर व्यापारी उनके कारखाने में आकर भी प्रोडक्ट देख सकते हैं. पसंद आने वाले सामान के लिए एडवांस लेकर ऑर्डर तैयार किया जाता है. उनके कंपनी का नाम एसके लेदर जूता चप्पल उद्योग है.