अकाल मृत्यु वाले पितरों का कब करें श्राद्ध, मृत सुहागिन और बच्चों के लिए पितृपक्ष में क्या नियम? जानें

अकाल मृत्यु वाले पितरों का कब करें श्राद्ध, मृत सुहागिन और बच्चों के लिए पितृपक्ष में क्या नियम? जानें


होमताजा खबरधर्म

अकाल मृत्यु वाले पितरों का श्राद्ध कब, मृत सुहागिन-बच्चों के लिए क्या नियम?

Last Updated:

Pitru Paksha Niyam: खरगोन के पंडित जगदीश ठक्कर ने अकाल मृत्यु, सुहागिन महिलाओं और बच्चों के श्राद्ध के लिए विशेष तिथियों और नियमों की जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि पितृ पक्ष में इन परिस्थितियों में श्राद्ध कब करना चाहिए और कब नहीं करना चाहिए.

Khargone News: श्राद्ध पक्ष में पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है. 16 दिनों के इस पक्ष में अलग-अलग तिथियों पर श्राद्ध करने का विधान शास्त्रों में बताया गया है. सामान्य रूप से जिस तिथि को व्यक्ति की मृत्यु हुई होती है, उसी तिथि पर उसका श्राद्ध किया जाता है. लेकिन, विद्वानों के मुताबिक, कुछ ऐसी परिस्थितियां भी होती हैं, जिनमें मृत व्यक्ति का श्राद्ध सामान्य मृत्यु तिथि के अनुसार नहीं किया जाता, स्पीति शास्त्रों में वर्णित विशेष तिथियों में करना चाहिए.

खासतौर पर अकाल मृत्यु, सौभाग्यवती महिला, बच्चे और मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होने जैसे मामलों के लिए भी अलग-अलग नियम बताए गए हैं. चूंकि, ऐसे में कई परिवारों को यह जानकारी नहीं होती कि पितरों का श्राद्ध किस तिथि को करना चाहिए. खरगोन के विद्वान पंडित जगदीश ठक्कर ने इन विशेष परिस्थितियों में श्राद्ध की तिथियों के बारे में विस्तृत जानकारी दी है.

अकाल मृत्यु वालों का किस दिन करें श्राद्ध?
पंडित जगदीश ठक्कर बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु समय से पहले किसी आकस्मिक कारण से हुई है जैसे दुर्घटना, हृदयाघात, फांसी, आत्महत्या, सर्पदंश या अन्य किसी कारण से हुई अकाल मृत्यु, तो ऐसे पितरों के लिए चौदस तिथि के दिन श्राद्ध कर्म करने विधान बताया गया है. ऐसे व्यक्ति की मृत्यु की सामान्य पुण्यतिथि भले ही अलग तिथि पर आती हो, लेकिन अकाल मृत्यु की स्थिति में श्राद्ध पक्ष के दौरान चौदस तिथि को ही पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान किया जाना चाहिए.

सुहागिन महिला और बच्चों की मृत्यु पर क्या नियम?
शास्त्रों में सौभाग्यवती (सुहागिन) महिला और बच्चों की मृत्यु के लिए भी विशेष तिथि बताई गई है. पंडित के अनुसार, यदि किसी सौभाग्यवती महिला की मृत्यु किसी भी तिथि में हुई हो, तो भी उसका श्राद्ध अविधवा नवमी तिथि को करना चाहिए, यानी महिला की मृत्यु जिस तिथि को हुई, उसके बजाय पितृ पक्ष की नवमी को श्राद्ध, तर्पण किए जाते हैं. इसी कारण श्राद्ध पक्ष में अविधवा नवमी का विशेष महत्व बताया जाता है. जबकि, किसी बच्चे की मृत्यु हो जाती है तो उसका श्राद्ध बाल पंचमी तिथि को करने का विधान है.

पूर्णिमा को मृत्यु हुई तो कब करें श्राद्ध?
पंडित जगदीश ठक्कर बताते है कि कई परिवारों में उस समय भ्रम की स्थिति बन जाती है, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि पूर्णिमा होती है. परिजन यह तय नहीं कर पाते कि भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करें या श्राद्ध पक्ष में अन्य तिथि पर करें, जबकि शास्त्र कहते है कि, श्राद्ध पक्ष अश्विन कृष्ण प्रतिपदा से माना जाता है. इसलिए पूर्णिमा तिथि पर जिनकी मृत्यु हुई है, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन करने का विधान है. भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध पक्ष की तिथि मानकर श्राद्ध नहीं करना चाहिए.

मृत्यु की तिथि याद नहीं तो क्या करें?
कई परिवारों में पूर्वज की मृत्यु की सही तिथि की याद नहीं होती. ऐसी स्थिति में भी श्राद्ध कर्म के लिए अलग व्यवस्था बताई गई है. शास्त्रों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु की तिथि पता नहीं है या तिथि पर श्राद्ध करना चूक गए तो ऐसे पितरों का श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या के दिन तर्पण और पिंडदान के साथ करने का विधान बताया गया है. इससे कोई दोष नहीं लगता है और पितर तृप्त होकर हमें आशीर्वाद देकर जाते हैं.

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी, राशि-धर्म और शास्त्रों के आधार पर ज्योतिषाचार्य और आचार्यों से बात करके लिखी गई है. किसी भी घटना-दुर्घटना या लाभ-हानि महज संयोग है. ज्योतिषाचार्यों की जानकारी सर्वहित में है. बताई गई किसी भी बात का Local-18 व्यक्तिगत समर्थन नहीं करता है.



Source link