Dev Prabhakar Singh Tomar UPSC Story: चंबल के ‘बागी’ दादा का पोता, IIT से पढ़ाई, नीदरलैंड की मोटी नौकरी छोड़ बना अफसर

Dev Prabhakar Singh Tomar UPSC Story: चंबल के ‘बागी’ दादा का पोता, IIT से पढ़ाई, नीदरलैंड की मोटी नौकरी छोड़ बना अफसर


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Dev Prabhakar Singh Tomar UPSC Story: मध्य प्रदेश के चंबल के एक ऐसे शख्स ने यूपीएससी परीक्षा क्रैक की है, जिनके दादा को सरकारी रिकॉर्ड में डकैत बताया जाता था. देव प्रभाकर सिंह तोमर ने आईआईटी से पढ़ाई की, फिर नीदरलैंड में नौकरी की और उसके बाद यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पासकर आईआरटीएस अधिकारी बने.

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Dev Prabhakar Singh Tomar UPSC: देव प्रभाकर सिंह तोमर की कहानी काफी वायरल हो रही है

नई दिल्ली (Dev Prabhakar Singh Tomar). मध्य प्रदेश का चंबल इलाका बीहड़ों, गोलियों की गूंज और खूंखार डकैतों की कहानियों के लिए बदनाम रहा है. इस क्षेत्र का जिक्र होते ही हथियारों और अपराध की तस्वीरें उभर आती हैं. लेकिन वक्त बदल रहा है. चंबल के इन्हीं बीहड़ों से देश का सिर गर्व से ऊंचा करने वाली कहानी आई है. जिस परिवार की पहचान गोलियों और पुलिस रिकॉर्ड से जुड़ी थी, उसी की अगली पीढ़ी ने मेहनत के दम पर यूपीएससी परीक्षा फतह कर ली है. यह कहानी है देव प्रभाकर सिंह तोमर की.

देव प्रभाकर सिंह तोमर के दादा कभी चंबल के ‘बागी’ हुआ करते थे. लेकिन उनके पोते ने इतिहास रचते हुए सिविल सर्विसेज में परचम लहरा दिया है. देव प्रभाकर ने साबित कर दिया कि पुरखों से ज्यादा अहम यह है कि आप अपनी तकदीर खुद कैसे लिखते हैं. चंबल की धूल-मिट्टी और संघर्षों के बीच पले-बढ़े देव प्रभाकर ने पहले IIT से इंजीनियरिंग की, फिर विदेशों में लाखों की नौकरी की.. जब दिल में देश सेवा की अलख जगी तो सब छोड़कर भारत लौट आए. पढ़िए देव प्रभाकर सिंह तोमर की सक्सेस स्टोरी.

देव प्रभाकर सिंह तोमर कौन हैं?

देव प्रभाकर सिंह तोमर ने दिल्ली की तंग गलियों में टीचर की नौकरी करते हुए यूपीएससी परीक्षा की तैयारी की और आखिरकार अपनी मंजिल पा ही ली. उनकी संघर्ष गाथा हर उस युवा के लिए अचूक टॉनिक है, जो विपरीत परिस्थितियों के आगे घुटने टेक देता है. जानिए देव प्रभाकर सिंह तोमर के रोमांचक और संघर्षपूर्ण सफर की पूरी कहानी.

दादा के संघर्ष और पिता के सपनों की नींव पर खड़ी सफलता

देव प्रभाकर सिंह तोमर की कहानी पीढ़ियों के संघर्ष और बदलाव की दास्तान है. उनके दादा के सरकारी अधिकारियों के साथ अक्सर वैचारिक और तीखे विवाद हुआ करते थे. इसके चलते वह सिस्टम की नजरों में बागी या डकैत बन गए. उस दौर में परिवार को भारी तंगहाली का सामना करना पड़ा और कई बार दो वक्त की रोटी के लाले पड़ जाते थे. लेकिन देव के पिता ने इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का फैसला किया. वह पुश्तैनी गांव छोड़कर ग्वालियर आ गए. वहां दिन-रात मेहनत करके पढ़ाई की और शिक्षक बन गए.

आसान नहीं थी स्कूली पढ़ाई

पिता के शिक्षक बनने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ. देव प्रभाकर की शुरुआती पढ़ाई मध्य प्रदेश बोर्ड से हुई. बाद में उनका दाखिला सीबीएसई बोर्ड में करा दिया गया. अंग्रेजी मीडियम में अचानक आने के कारण शुरुआती दिनों में उन्हें काफी दिक्कतें आईं. लेकिन जिद और सीखने की ललक ने हर बाधा को पार कर लिया. स्कूल के दिनों में जब दोस्तों ने आईआईटी की चर्चा की तो उनके मन में भी देश के सबसे बड़े इंजीनियरिंग संस्थान में जाने का सपना पलने लगा. यहीं से उनकी बड़ी उड़ान की शुरुआत हुई.

IIT से नीदरलैंड की नौकरी और फिर UPSC का सफर

अपनी मेहनत के दम पर प्रभाकर ने पहले ही प्रयास में जेईई परीक्षा क्रैक कर ली और IIT रोपड़ से बीटेक किया. इसके बाद उन्हें नीदरलैंड की मशहूर कंपनी ‘फिलिप्स’ में नौकरी मिल गई. विदेशी सुख-सुविधाओं के बीच भी उनका मन अपने देश की मिट्टी और समाज के लिए कुछ करने को बेचैन रहता था. आखिरकार, उन्होंने विदेश की आरामदायक नौकरी को लात मारी और भारत लौट आए. दिल्ली आकर उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हुए सिविल सेवा परीक्षा (UPSC) की तैयारी शुरू कर दी.

रेलवे सर्विस में मिली सरकारी नौकरी

देव प्रभाकर सिंह तोमर यूपीएससी सीएसई के शुरुआती 2 प्रयासों में फेल हो गए थे. लेकिन एक सच्चे योद्धा की तरह उन्होंने हार नहीं मानी. अपनी कमियों को सुधारते हुए उन्होंने तीसरे प्रयास में सफलता का ताला खोल ही दिया. UPSC 2025 की परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल कर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों तो रास्ते अपने आप बन जाते हैं. उनका चयन इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस (IRTS) के लिए हुआ और आज वह रेल मंत्रालय में अपनी सेवाएं देकर देश के विकास में योगदान दे रहे हैं.



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