नई दिल्ली (Gandhi Jayanti Special). आज 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती है. हर साल इस दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को याद करते हैं, उनकी समाधि पर फूल चढ़ाते हैं और उनके स्वच्छता या अहिंसा के संदेशों को दोहराकर इतिश्री कर लेते हैं. लेकिन क्या कभी सोचा है कि आज के दौर में, जब देश के बच्चे नीट और जेईई जैसी परीक्षाओं के तनाव में जान गंवा रहे हैं, तब बापू के विचार कितने जरूरी हैं? भारतीय एजुकेशन सिस्टम सिर्फ अंधी दौड़ बन गया है- कम उम्र से ही बच्चा बैग टांगकर स्कूल की रेस में दौड़ने लगता है.
शिक्षा पर महात्मा गांधी के विचार
आज स्थिति बिल्कुल उलट है. हम डिग्रियों के अंबार पर तो बैठ रहे हैं, मगर कइयों के अंदर न तो नैतिक मूल्य बचे हैं और न ही जीवन की मुश्किलों से लड़ने का हुनर. आज जब बच्चे कम नंबर कम आने पर डिप्रेशन में चले जाते हैं, तब बापू की याद आती है. गांधी जी का मानना था कि साक्षरता शिक्षा का अंत नहीं है, बल्कि वह तो सिर्फ जरिया है. असली शिक्षा मनुष्य के शरीर, मन और दिमाग का बैलेंस्ड डेवलपमेंट करती है.
महात्मा गांधी का शिक्षा दर्शन और आज का एग्जाम सिस्टम
महात्मा गांधी ने भारत की आजादी से पहले ही इनडायरेक्टली एजुकेशन मॉडल पेश कर दिया था. देखा जाए तो इतने सालों बाद भी उसकी रेलेवेंस बची हुई है. उसे अपनाकर हम मौजूदा एजुकेशन सिस्टम बेहतर कर सकते हैं. जानिए महात्मा गांधी ने शिक्षा को लेकर क्या कहा.
रट्टाफिकेशन vs कैरेक्टर बिल्डिंग: कहां भटक गई गाड़ी?
महात्मा गांधी का कहना था कि साक्षरता या किताबी ज्ञान शिक्षा नहीं है. उनका फोकस ‘कैरेक्टर बिल्डिंग’ (चरित्र निर्माण) पर रहता था. वहीं आज का एजुकेशन सिस्टम सिर्फ मार्क्स और परसेंटाइल की बुनियाद पर खड़ा है. नीट, UPSC या JEE में 1-1 नंबर के लिए बच्चे सालों कमरों में बंद होकर सिर्फ रट्टा लगाते हैं. इस अंधी रेस में नैतिकता, मानसिक शांति और मौलिक सोच पीछे छूट जाती है. बापू के विचार आईना दिखाते हैं कि अगर हम सिर्फ डिग्रियां बांटकर इंसानियत भूल रहे हैं तो यह सबसे बड़ी विफलता है.
बापू की ‘नई तालीम’ और आज की नई शिक्षा नीति
आज की मॉर्डन एजुकेशन पॉलिसी (NEP 2020) वोकेशनल ट्रेनिंग, स्किल डेवलपमेंट, बैगलेस डे आदि पर फोकस कर रही है. इसकी नींव बहुत पहले महात्मा गांधी ने ‘नई तालीम’ के जरिए रख दी थी. बापू चाहते थे कि बच्चा पढ़ाई के साथ-साथ कोई न कोई हुनर भी सीखे, जिससे वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके. आज जब देश में बेरोजगारी और किताबी ज्ञान के गैप पर बहस होती है, तब गांधी जी का मॉडल रास्ता दिखाता है. शिक्षा का जुड़ाव समाज की जमीनी हकीकत से होना चाहिए, न कि सिर्फ एसी कोचिंग क्लास से.
नंबरों की गुलामी से आजादी पाने का वक्त
गांधी जयंती के अवसर पर सिर्फ फॉर्मेलिटी पूरी करने के बजाय बच्चों के कंधों से भारी-भरकम तनाव का बोझ उतारने की जरूरत है. माता-पिता और सिस्टम, दोनों को समझना होगा कि असफलता जिंदगी का अंत नहीं है. गांधी जी के जीवन से सीख मिलती है कि इंसान अपनी गलतियों से सीखकर ही महान बनता है, न कि सिर्फ टॉपर बनने से. बापू को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिए एग्जाम सिस्टम को फ्लेक्सिबल बनाने की जरूरत है, जहां स्टूडेंट्स डरकर नहीं, बल्कि खुशी-खुशी कुछ नया सीखने के लिए स्कूल और कॉलेज जाएं.