नई दिल्ली. फिल्म इंडस्ट्री में कुछ खास तारीखें और महीने खास एक्टर्स की किस्मत से जुड़े होते हैं. अक्टूबर का महीना अजय देवगन के लिए हमेशा बहुत लकी साबित हुआ है. इतिहास गवाह है कि अक्टूबर में रिलीज हुई उनकी ज्यादातर फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड बनाए हैं और दर्शकों का बहुत प्यार पाया है. इसी सुनहरे सिलसिले को जारी रखते हुए स्टार स्टूडियो 18 और पैनोरमा स्टूडियो द्वारा निर्मित ‘दृश्यम 3’ (Drishyam: The conclusion) थिएटर में आ गई है. क्या यह थ्रिलर फ्रेंचाइजी अपने वादे पर खरी उतरी? आइए इसे डिटेल में एनालाइज करते हैं.
कहानी
‘दृश्यम 3’ की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां दूसरा पार्ट खत्म हुआ था. सालगांवकर परिवार (विजय, नंदिनी, अंजू और अनु) अतीत के काले सायों से आगे बढ़कर नॉर्मल जिंदगी जीने की कोशिश कर रहा है. वे केस को हमेशा के लिए बंद करने के लिए कोर्ट में लीगल पिटीशन फाइल करते हैं. लेकिन अतीत इतनी आसानी से नहीं जाता. इस बीच अपने बेटे की मौत के गम में मीरा देशमुख (तब्बू) और महेश देशमुख (रजत कपूर) इंसाफ की आग में जल जाते हैं. इस बार वे गोवा पुलिस के सख्त और चालाक सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस राजीव सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) को केस की नई इन्वेस्टिगेशन करने के लिए हायर करते हैं. राजीव तोमर का पक्का मानना है कि ‘कानून का एकमात्र हथियार सबूत है.’ इसके साथ ही शुरू होता है चूहे-बिल्ली का एक डरावना लीगल और साइकोलॉजिकल खेल. कोर्टरूम से लेकर सड़कों तक सलगांवकर परिवार और समीर देशमुख के लिए इंसाफ की गुहार लगा रहे तेज-तर्रार वकील (प्रकाश राज) के बीच शह-मात की जबरदस्त लड़ाई छिड़ जाती है. इस बार विजय सलगांवकर पुलिस से नहीं, बल्कि कानून की पेचीदगियों से लड़ रहा है. क्या विजय अपने परिवार को इस आखिरी और सबसे खतरनाक चक्रव्यूह से निकाल पाएगा? यही इस कहानी का मेन थ्रिल है.
एक्टिंग
यह फिल्म सच में एक्टिंग का एक शानदार उदाहरण पेश करती है.
अजय देवगन (विजय सालगांवकर): करीब 2 घंटे 50 मिनट की इस फिल्म में अजय देवगन मुश्किल से 8 से 10 मिनट ही बोलते हैं. लेकिन उनकी चुप्पी किसी भी लंबे डायलॉग से ज्यादा असरदार है. बिना किसी लंबे भाषण के, बस अपनी आंखों की गहराई, चेहरे पर चुप्पी और अपनी बॉडी लैंग्वेज से अजय देवगन यह साबित कर देते हैं कि विजय सालगांवकर का किरदार इंडियन सिनेमा के सबसे आइकॉनिक किरदारों में से एक क्यों माना जाता है. उनके शांत स्वभाव में एक बहुत ही चालाक और तेज दिमाग छिपा है.
जयदीप अहलावत (SP राजीव सिंह तोमर): जयदीप अहलावत को विजय सालगांवकर जैसे चालाक विलेन के रूप में एक मजबूत और डरावने विलेन के तौर पर पेश किया गया है. स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी ही एक अजीब सा टेंशन पैदा करती है. अजय और जयदीप के भले ही साथ में कुछ ही सीन हों, लेकिन उन सीन की एनर्जी पूरी थ्रिलर को नई ऊंचाइयों पर ले जाती है.
तब्बू और कास्ट: तब्बू ने एक बेबस और गुस्सैल मां के दर्द को बहुत ईमानदारी से दिखाया है. रजत कपूर, इशिता दत्ता और मृणाल जाधव ने अपने छोटे रोल में भी सालगांवकर परिवार की चिंता और एकता को बहुत अच्छे से दिखाया है. प्रकाश राज का वकील का शार्प रोल कोर्टरूम ड्रामा में जान डाल देता है, जबकि कमलेश सावंत (इंस्पेक्टर गायतोंडे) की नेचुरल परफॉर्मेंस फिल्म में कुछ राहत लाती है.
डायरेक्शन
‘दृश्यम’ और ‘दृश्यम 2’ की जबरदस्त सफलता के बाद, फ्रेंचाइजी का तीसरा पार्ट डायरेक्ट करना किसी भी डायरेक्टर के लिए गर्म कोयले पर चलने जैसा था. डायरेक्टर अभिषेक पाठक ने यह जिम्मेदारी बहुत अच्छे से निभाई है. अभिषेक ने अमील कियान खान और परवेज शेख के साथ मिलकर एक ऐसा स्क्रीनप्ले तैयार किया है जो ओरिजिनल आइडिया का सम्मान करता है. डायरेक्टर ने फिल्म की पेस को इतनी अच्छी तरह से कंट्रोल किया है कि दर्शक एक पल के लिए भी स्क्रीन से अपनी नजरें नहीं हटा पाते. हर सीन को बहुत बारीकी से बनाया गया है. विजय की चुप्पी और राजीव तोमर के अग्रेसिव अप्रोच के बीच बैलेंस डायरेक्टर की मैच्योरिटी दिखाता है. वह ऑडियंस के दिमाग से खेलते हैं और क्लाइमेक्स तक सस्पेंस बनाए रखने में पूरी तरह कामयाब होते हैं.
सिनेमैटोग्राफी
गोवा को आमतौर पर फिल्मों में उसके खूबसूरत बीच और नाइटलाइफ के लिए दिखाया जाता है, लेकिन ‘दृश्यम’ सीरीज गोवा का एक अलग साइड दिखाती है. इस थ्रिलर का मूड सेट करने में कैमरावर्क का बड़ा रोल है. फिल्म के सीन डार्क, इंटेंस और रियलिस्टिक हैं. कैमरामैन ने सालगांवकर परिवार के घर के तंग कोनों से लेकर पुलिस स्टेशन की दम घोंटने वाली दीवारों तक, सब कुछ इस तरह से कैप्चर किया है कि ऑडियंस खुद डर महसूस कर सकती है. क्लोज-अप शॉट्स का इस्तेमाल शानदार ढंग से किया गया है- खासकर अजय देवगन की आंखों की बारीक फ्रेमिंग और जयदीप अहलावत के चेहरे पर गुस्सा तारीफ के काबिल है.
म्यूजिक
रवि बसरूर का बैकग्राउंड स्कोर ही फिल्म की असली ताकत है. ऐसी फिल्म में जहां मेन कैरेक्टर बहुत कम बोलता है, म्यूजिक को उसके मन की बात कहनी चाहिए. रवि बसरूर ने इस चैलेंज को पूरी तरह से निभाया है. उनका म्यूजिक फिल्म के सस्पेंस को और गहरा करता है और जब भी कहानी कोई नया मोड़ लेती है, बैकग्राउंड स्कोर रोंगटे खड़े कर देता है. जहां शांति की जरूरत होती है, वहां म्यूजिक को शांत रखा जाता है और जहां ट्विस्ट आता है, वहां साउंड डिजाइन इसे दोगुना कर देता है.
कमियां
हर मास्टरपीस में कुछ छोटी-मोटी कमियां होती हैं और ‘दृश्यम 3’ भी इससे अलग नहीं है. फिल्म का रनटाइम (150 मिनट) थोड़ा ज्यादा लगता है. कहानी को जमाने में फर्स्ट हाफ थोड़ा ज्यादा समय लेता है, जिससे पेस थोड़ी धीमी लगती है. तब्बू और रजत कपूर जैसे अनुभवी एक्टर्स को इस हिस्से में कम मौका दिया गया है. कानूनी अंदाजों और सबूतों में हेरफेर वाले कुछ सीन में कुछ सिनेमैटिक लिबर्टी ली गई हैं, जिन्हें असल में करना थोड़ा मुश्किल लगता है.
अंतिम फैसला
सभी छोटी-मोटी कमियों को छोड़ दें, तो ‘दृश्यम 3’ (दृश्यम: द कन्क्लूजन) एक शानदार, थ्रिलिंग और वैल्यू-फॉर-मनी थ्रिलर है. यह फ्रैंचाइज को वह दमदार और जबरदस्त एंडिंग देता है जिसकी ऑडियंस उम्मीद कर रही थी. विजय सलगांवकर का दिमाग, अपने परिवार को बचाने का उनका पक्का इरादा और क्लाइमैक्स में रोंगटे खड़े कर देने वाला ट्विस्ट… सब कुछ बहुत अच्छे से किया गया है. अगर आप थ्रिलर, सस्पेंस और बेहतरीन एक्टिंग के फैन हैं, तो सिनेमा में यह फिल्म देखना न भूलें. मेरी ओर से इस फिल्म को 5 में से 4 स्टार.