15 अगस्त को जब देश मना रहा था आजादी का जश्न, तब कहां थे गांधी जी? जानें क्यों थे वह दुखी

15 अगस्त को जब देश मना रहा था आजादी का जश्न, तब कहां थे गांधी जी? जानें क्यों थे वह दुखी


Gandhi Jayanti 2026: आज 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती है. इस मौके पर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कई बातें याद की जाती हैं. लेकिन गांधी जी से जुड़ा एक सवाल आज भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ाता है कि जब 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ और दिल्ली में जश्न मनाया जा रहा था, तब गांधी जी कहां थे और क्या कर रहे थे? दरअसल, करीब 200 साल की गुलामी के बाद देश आजाद हुआ था. दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था. देश के नेता नए भारत की शुरुआत कर रहे थे. लेकिन इस बड़े मौके पर महात्मा गांधी राजधानी दिल्ली में नहीं थे. वह कलकत्ता यानी आज के कोलकाता में थे, जहां देश के बंटवारे के बीच हिंदू-मुस्लिम हिंसा को रोकने की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने आजादी का दिन किसी समारोह में नहीं, बल्कि उपवास, प्रार्थना और लोगों से बातचीत करते हुए बिताया.

आजादी के दिन कलकत्ता में थे गांधी जी

15 अगस्त 1947 को गांधी जी कलकत्ता के बेलीघाटा इलाके में स्थित हैदरी मैनशन में ठहरे हुए थे वह 13 अगस्त को यहां पहुंचे थे. उस समय कलकत्ता में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव था. देश के बंटवारे के कारण कई जगह हिंसा हो रही थी. ऐसे समय में गांधी जी ने दिल्ली जाने के बजाय कलकत्ता में रहना चुना. उनका ध्यान वहां लोगों के बीच शांति बनाने पर था.

गांधी जी के लिए उस समय आजादी की खुशी से ज्यादा जरूरी लोगों की जान बचाना और आपसी हिंसा रोकना था. वह लगातार अलग-अलग लोगों और नेताओं से मिल रहे थे. उनका मानना था कि देश आजाद हो गया है, लेकिन अगर लोग आपस में ही लड़ते रहेंगे तो इस आजादी का असली मतलब पूरा नहीं होगा.

15 अगस्त को रखा 24 घंटे का उपवास

गांधी जी ने 14 अगस्त की शाम की प्रार्थना सभा में बताया था कि वह 15 अगस्त को 24 घंटे का उपवास रखेंगे. इसके साथ उन्होंने प्रार्थना और चरखा कातने का कार्यक्रम भी तय किया था. गांधी हेरिटेज पोर्टल के रिकॉर्ड में भी 15 अगस्त 1947 को उनके उपवास और प्रार्थना का उल्लेख है.

गांधी जी के लिए यह दिन सिर्फ खुशी मनाने का दिन नहीं था. भारत को आजादी मिल रही थी, लेकिन उसी समय देश का बंटवारा भी हो रहा था. लाखों लोग हिंसा, डर और परेशानी का सामना कर रहे थे. इसलिए उन्होंने इस दिन को प्रार्थना और उपवास के साथ बिताया.

सुबह से ही मिलने पहुंचने लगे लोग

15 अगस्त की सुबह से ही गांधी जी से मिलने के लिए लोगों की भीड़ आने लगी थी. गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, पूरे दिन उनसे मिलने वालों का लगातार आना-जाना लगा रहा. उनकी पोती मनु गांधी ने उस दिन के बारे में लिखा कि गांधी जी ठीक से काम भी नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उन्हें लगभग हर आधे घंटे में बाहर जाना पड़ रहा था. हजारों लोग उनके दर्शन के लिए पहुंच रहे थे.

इस दौरान गांधी जी लोगों से बातचीत भी कर रहे थे. वह उन्हें शांति बनाए रखने और एक-दूसरे के साथ भाईचारे से रहने का संदेश दे रहे थे. उस दिन उन्होंने छात्रों और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों से भी बातचीत की. रिकॉर्ड में साम्प्रदायिक एकता और राहत से जुड़े संवादों का भी उल्लेख मिलता है.

गांधी जी ने आजादी के जश्न से खुद को क्यों दूर रखा?

गांधी जी की सबसे बड़ी चिंता उस समय देश में हो रही हिंसा थी. भारत आजाद हो रहा था, लेकिन साथ ही देश दो हिस्सों में बंट चुका था. बंगाल और दूसरे इलाकों में हिंदू-मुस्लिम तनाव काफी बढ़ गया था. ऐसे समय में गांधी जी का मानना था कि उनका स्थान उन लोगों के बीच है, जो हिंसा और डर का सामना कर रहे हैं.

14 अगस्त की प्रार्थना सभा में उन्होंने आजादी के आने वाले दिन को खुशी और दुख दोनों से जुड़ा बताया था. उनके लिए अंग्रेजी शासन का खत्म होना खुशी की बात थी, लेकिन देश का बंटवारा और उसके कारण पैदा हुई हिंसा दुख का कारण था.

कलकत्ता में शांति की कोशिश में जुटे रहे

गांधी जी का बेलीघाटा में रुकना सिर्फ एक जगह ठहरना नहीं था. वह दंगों के बीच हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच भरोसा वापस लाने की कोशिश कर रहे थे. गांधी हेरिटेज पोर्टल के मुताबिक, हैदरी मैनशन में उनका रहना कलकत्ता की साम्प्रदायिक हिंसा के बीच शांति कायम करने की कोशिश का हिस्सा था. बाद में इस पूरे घटनाक्रम को ‘मिरेकल ऑफ कलकत्ता’ यानी ‘कलकत्ता का चमत्कार’ कहा गया.

गांधी जी के साथ बंगाल के नेता हुसैन शहीद सुहरावर्दी भी रहे और दोनों ने मिलकर शांति की कोशिश की. गांधी जी लगातार प्रार्थना सभाएं करते और लोगों से हिंसा छोड़ने की अपील करते रहे. उनका साफ मानना था कि हिंदू और मुस्लिम अगर साथ नहीं रहेंगे तो आजादी अधूरी रहेगी.

शाम को भी हुई प्रार्थना सभा

दिनभर उपवास और लोगों से मुलाकात के बाद गांधी जी ने शाम को प्रार्थना सभा में हिस्सा लिया. उस दिन भी उनका ध्यान देश में शांति और आपसी भाईचारे पर था. गांधी हेरिटेज पोर्टल के रिकॉर्ड में 15 अगस्त की शाम की प्रार्थना सभा और उनके संदेश का उल्लेख मिलता है.

इस तरह जिस दिन दिल्ली में आजादी का जश्न मनाया जा रहा था, उस दिन गांधी जी कलकत्ता में लोगों के बीच शांति की कोशिश कर रहे थे. उनके लिए आजादी का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से देश का मुक्त होना नहीं था. वह चाहते थे कि देश के लोग डर और हिंसा से भी मुक्त हों और हिंदू-मुस्लिम मिलकर रहेंय

आजादी का दिन गांधी जी के लिए कैसा था?

15 अगस्त 1947 को गांधी जी ने कोई बड़ा जश्न नहीं मनाया. उन्होंने उपवास रखा, प्रार्थना की, लोगों से मुलाकात की और शांति का संदेश दिया. गांधी हेरिटेज पोर्टल के अनुसार, उन्होंने उस दिन कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों और छात्रों से भी बातचीत की.

भारत की आजादी के दिन गांधी जी का दिल्ली में न होना इसलिए खास है, क्योंकि वह उस समय भी अपनी उस सोच पर कायम थे, जिसके तहत लोगों के बीच शांति और भाईचारा सबसे जरूरी था. आजादी का जश्न जहां राजधानी में हो रहा था, वहीं गांधी जी हिंसा से प्रभावित लोगों के बीच रहकर यह कोशिश कर रहे थे कि नए आजाद भारत की शुरुआत खून-खराबे और नफरत के बीच न हो.



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