Air Pollution Reason: अक्टूबर की शुरुआत के साथ ही ऐसा मौसम आ गया है, जब मानसून की विदाई हो रही है और जाड़े की आहट भी. इसके साथ ही राजधानी दिल्ली और समूचा एनसीआर यानी कि नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद तक के इलाके एक बार फिर ‘गैस चैंबर’ बनने की राह पर अग्रसर हैं. हर साल अक्टूबर आते ही साफ और नीले दिखने वाले आसमान में जहरीली धुंध यानी स्मॉग की चादर लपेट जाती है. इस बिगड़ती हवा को देखते हुए दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पांस ऐक्शन प्लान (GRAP) लागू हो गया है. आखिर मौसम बदलने के साथ ही दिल्ली की हवा में ऐसा क्या बदलाव आता है कि सांस लेना तक दूभर हो जाता है? इसके पीछे का पूरा साइंस, भौगोलिक कारण और नए GRAP नियमों के बारे में जान लेते हैं.
मौसम बदलते ही क्यों घुटने लगता है दिल्ली-NCR का दम?
मानसून के दौरान बारिश की वजह से हवा में मौजूद धूल और हानिकारक कण धुल जाते हैं, लेकिन सितंबर के आखिरी हफ्तों से जाड़े की शुरुआत तक दिल्ली का वातावरण तेजी से बदलने लगता है. इसमें थर्मल इन्वर्जन के साथ ही हवा की स्पीड, पराली भी शामिल है. इनके बारे में एक-एक करके गौर कर लेते हैं.
- थर्मल इन्वर्जन: इसका साफ मतलब तापमान में उलट-पलट होता है. गर्मियों और मानसून में जमीन के पास की हवा गर्म होकर ऊपर उठती है. धुएं और धूल कणों को अपने साथ ऊपर वायुमंडल में ले जाकर उड़ा देती है. लेकिन ठंड की शुरुआत में जमीन के पास की हवा ठंडी होकर भारी हो जाती है. ऊपर गर्म हवा की एक परत बन जाती है जो ढक्कन की तरह काम करती है. इसे ‘थर्मल इन्वर्जन’ कहते हैं. इसकी वजह से प्रदूषण करने वाले एलिमेंट्स ऊपर जाने की बजाय जमीन के पास में ही फंस जाते हैं.
- हवा की स्पीड और रुख बदलना: अक्टूबर में मानसून की वापसी के बाद उत्तर-पश्चिमी हवाएं चलने लगती हैं. इस मौसम में हवा की रफ्तार काफी धीमी होती है यानी कि हवाएं शांत हो जाती है. तेज हवाएं नहीं चलने की वजह से प्रदूषक कण एक ही जगह जमा होने लगते हैं.
- पराली का धुआं: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के खेतों में धान की कटाई के बाद किसान अगली फसल की बुआई के लिए पराली जलाते हैं. उत्तर-पश्चिम से आने वाली हवाएं इस धुएं को सीधे दिल्ली-एनसीआर की ओर ले आती हैं.
दिल्ली में जहर के मुजरिम कौन?
दिल्ली-एनसीआर में हवा खराब करने के लिए केवल बाहरी कारक जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि स्थानीय कारण भी उतने ही बड़े मुजरिम हैं.
- गाड़ियों का पल्यूशन: दिल्ली-एनसीआर की सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियां गाड़ियों से निकलने वाली नाइट्रोजन ऑक्साइड और हानिकारक सूक्ष्म कण PM 2.5 हवा को सबसे ज्यादा जहरीला बनाते हैं.
- धूल प्रदूषण: कंस्ट्रक्शन और डिमोलिशन से जुड़े निर्माण काम और इसके साथ ही टूटी सड़कों से उड़ने वाली धूल हवा में PM 10 का लेवल तेजी से बढ़ाती है.
- इंडस्ट्रियल धुआं और डीजल जनरेटर: एनसीआर में स्थित फैक्ट्रियां और बिजली कटौती के दौरान सोसायटी से लेकर कंपनियों तक में चलने वाले हैवी डीजल जनरेटर (DG Sets) भारी मात्रा में कार्बन प्रोडक्शन करते हैं.
- कचरा जलाना और आतिशबाजी: खुले में कचरा और सूखी पत्तियां जलाना और त्योहारों के मौसम में आतिशबाजी से पैदा हुए धुएं की स्थिति को ‘गंभीर’ कैटिगरी में पहुंचा देता है.
हवा का मिजाज कैसे मापा जाता है?
दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स यानी AQI को मुख्य तौर पर आठ प्रदूषकों के आधार पर मापा जाता है, जिनमें PM 2.5 और PM 10 सबसे खतरनाक होते हैं.
- 0 – 50: अच्छा
- 51 – 100: संतोषजनक
- 101 – 200: मीडियम
- 201 – 300: खराब
- 301 – 400: बहुत खराब
- 401 – 500: गंभीर
- 500 से ऊपर: अति गंभीर
क्या हैं GRAP पाबंदियां
प्रदूषण से निपटने के लिए एयर क्वालिटी मैनेजमेंट कमिटी (CAQM) की तरफ से ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP) तैयार किया गया है. यह चार अलग-अलग फेज में लागू होता है जैसे-जैसे हवा की क्वालिटी खराब होती है.
- फेज 1- खराब हवा: इसमें AQI 201 से 300 के बीच होने पर नो PUC0नो फ्यूल लागू होता है. बिना वैध पॉल्यूशन सर्टिफिकेट (PUCC) के गाड़ियों में पेट्रोल, डीजल या CNG नहीं भरा जाएगा. वहीं कंस्ट्रक्शन साइट्स पर एंटी-स्मॉग गन का इस्तेमाल, सड़कों की मैकेनिकल स्वीपिंग और पानी का छिड़काव होता है. खुले में कचरा जलाने पर रोक लग जाती है. खुले में पत्तियां, कूड़ा या प्लास्टिक जलाने पर भारी चालान होता है.
- फेज 2- बहुत खराब हवा: इसमें AQI 301 से 400 के बीच होता है, तब होटल/रेस्टोरेंट में तंदूर और कोयले या लकड़ी के इस्तेमाल पर पूरी तरह पाबंदी लग जाती है. आपातकालीन सेवाओं को छोड़कर डीजल जनरेटर यानी डीजी सेट के इस्तेमाल पर सख्ती लगती है. पार्किंग चार्ज में बढ़ोतरी की जाती है, ताकि लोग प्राइवेट गाड़ियों की बजाय पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें.
- फेज 3- गंभीर हवा: इसमें AQI 401 से 450 के बीच होता है. इसमें गैर-जरूरी निर्माण और तोड़फोड़ के कामों पर तुरंत रोक लगा दी जाती है. दिल्ली के बाहर से आने वाली बीएस-IV और उससे नीचे की डीजल गाड़ियों की एंट्री पर पाबंदी लग जाती है. प्राथमिक स्कूलों को ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट करने की छूट हो जाती है.
- फेज 4- अति गंभीर हवा: इसमें AQI का लेवल 450 से अधिक होता है. दिल्ली में गैर-आवश्यक ट्रकों के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगती है. 50 प्रतिशत सरकारी और निजी दफ्तरों के लिए वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य हो जाता है. गाड़ियों के लिए ऑड-ईवन योजना लागू करने पर फैसला लिया जाता है.
सेहत पर असर और बचाव के उपाय
डॉक्टरों के मुताबिक PM 2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के जरिए सीधे फेफड़ों और खून की नालियों में पहुंच जाते हैं. इससे सांस की बीमारी, अस्थमा, आंखों में जलन, दिल का दौरा और बुजुर्गों और बच्चों में गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.
बचाव के लिए क्या करें?
सुबह-शाम वॉक या आउटडोर एक्सरसाइज से बचें जब स्मॉग का असर ज्यादा हो. बाहर निकलते समय N95 या N99 मास्क का इस्तेमाल करें. घरों के खिड़की-दरवाजे बंद रखें और वायु शुद्धता बनाए रखने के लिए पौधे जैसे स्नेक प्लांट, मनी प्लांट लगाएं. मेट्रो और बस के जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा करें.