क्या महात्मा गांधी को अब नहीं मिल सकता नोबल प्राइज? जीते-जी 5 बार हुए थे नॉमिनेट, फिर क्या अड़चन

क्या महात्मा गांधी को अब नहीं मिल सकता नोबल प्राइज? जीते-जी 5 बार हुए थे नॉमिनेट, फिर क्या अड़चन


महात्मा गांधी की आज जयंती है. आज 2 अक्टूबर के दिन उनका हैप्पी बर्थडे सेलिब्रेट किया जा रहा है. वह 20वीं सदी में अहिंसा और शांति के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते हैं. फिर भी उन्हें कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला. साल 1937 से 1948 के बीच उन्हें कुल पांच बार इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामित किया गया था. यह सवाल आज भी इतिहास प्रेमियों को हैरान करता है कि दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले शख्स को नोबेल समिति ने क्यों बार-बार नजरअंदाज किया. और क्या अब गांधीजी को नोबल का शांति पुरस्कार नहीं मिल सकता है?

गांधीजी को पहली बार 1937 में नार्वे की संसद के सदस्य ओले कोल्ब्योर्नसेन ने नॉमिनेट किया था. इसके बाद उन्हें 1938, 1939, 1947 और आखिर में 1948 में भी मनोनीत किया गया. हालांकि, नोबेल कमिटी की अपनी रिव्यू और इंटर्नल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि गांधीजी को यह पुरस्कार ना देने के पीछे पॉलिसी, पॉलिटिकल और इंस्टिट्यूशनल कारण थे.

सबसे पहले 1937 से 1939 के शुरुआती नामांकन की बात करें तो इस दौरान समिति के सलाहकारों ने गांधीजी की अहिंसा की नीति पर सवाल उठाए. उनके अनुसार गांधीजी हमेशा अहिंसावादी नहीं थे. कमिटी का ऐसा मानना था कि भारत में उनकी तरफ से चलाए गए आंदोलनों से कई जगहों पर हिंसा भड़की. अब इसमें असहयोग आंदोलन के दौरान कई जगहों पर हिंसा भड़क उठी थी और चौरीचौरा कांड की घटना हो गई.

नोबल कमिटी के कुछ एक्सपर्ट्स के साथ ही आलोचकों का कहना था कि गांधीजी खुद अहिंसा में विश्वास रखते थे लेकिन वे अपने विशाल जन-आंदोलनों को हिंसक होने से पूरी तरह रोकने में असमर्थ रहे. 1937 का नोबल चेलवुड के लॉर्ड सेसिल को मिल गया. कोल्ब्योर्नसेन ने 1938 और 1939 में भी मनोनीत किया लेकिन गांधीजी को हासिल नहीं हुआ.

दूसरी वजह पर गौर करें तो नोबेल समिति का उस समय का नजरिया भी कुछ संकीर्ण और पारंपरिक टाइप का था. उस दौर में नोबेल शांति पुरस्कार मुख्य रूप से यूरोपीय और अमेरिकी पॉलिटिशियन, अंतर्राष्ट्रीय कानून के जानकारों या संस्थागत शांति समझौतों पर साइन करने वालों को दिया जाता था. गांधीजी इस पारंपरिक ढांचे में फिट नहीं बैठते थे. वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति समझौते करने वाले नेता नहीं थे, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ देश की मुक्ति आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे.

1947 में जब भारत देश आजाद हुआ और देश का विभाजन हो गया, तब गांधीजी को फिर से नॉमिनेट किया गया. लेकिन इस बार भारत और पाकिस्तान के बीच भड़के सांप्रदायिक दंगों और तनावपूर्ण स्थिति के कारण समिति संकोच में पड़ गई. गांधीजी के कुछ बयानों का मतलब गलत समझा गया, जिसमें न्याय पाने के लिए युद्ध की संभावना का जिक्र था. हालांकि गांधीजी युद्ध करने की बात नहीं कर रहे थे. 5 सदस्यों वाली समिति में से 3 सदस्य गांधीजी को पुरस्कार देने के पक्ष में नहीं थे, इसलिए उस साल यह पुरस्कार Quakers नामक एक धार्मिक और मानवतावादी संगठन को दे दिया गया.

30 जनवरी 1948 के दिन महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई, जिसके कुछ ही दिन पहले उन्हें 1948 के पुरस्कार के लिए अंतिम बार नॉमिनेट किया गया था. उस साल के नोबल पीस प्राइज गांधीजी को देने के लिए 6 लेटर्स आए थे. नोबेल समिति ने गांधीजी को मरणोपरांत पुरस्कार देने पर विचार किया. हालांकि, उस समय के नियमों के अनुसार मौत के बाद पुरस्कार देने का कोई प्रावधान नहीं था. और ना ही गांधीजी किसी ऐसी औपचारिक संस्था से जुड़े थे जिसे उनकी जगह यह पुरस्कार सौंपा जा सके.

नियमों की इस बाधा के कारण नोबेल समिति ने 1948 में यह ऐलान किया कि इस साल कोई भी योग्य और जीवित उम्मीदवार नहीं है. इस वजह से 1948 का नोबेल शांति पुरस्कार किसी को भी नहीं दिया गया. ऐसा माना जाता है कि 1948 में गांधीजी की जगह को खाली रखकर नोबेल समिति ने उन्हें एक तरह से मौन सम्मान दिया था. अगर उस साल हत्या नहीं हुई होती तो गांधीजी को प्राइज मिलने की संभावना अधिक थी.

गौरतलब यह भी है कि नोबेल समिति ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया है कि महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार ना देना उनके इतिहास की सबसे बड़ी भूलों में से एक थी. 1989 में जब 14वें दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया, तब समिति के अध्यक्ष ने कहा कि यह पुरस्कार आंशिक रूप से महात्मा गांधी की स्मृति को भी एक श्रद्धांजलि है.

भले ही उन्हें नोबेल पुरस्कार ना मिला हो लेकिन गांधीजी की अहिंसा की विरासत दुनिया भर के महान नेताओं को हमेशा प्रेरित करती रही. इस लिस्ट में मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे कद्दावर भी शामिल रहे.

क्या अब नहीं मिल सकता है गांधीजी को नोबल?
अगर ऐसा सवाल पूछा जाए कि महात्मा गांधी को क्यों अब नोबल प्राइज नहीं मिल सकता है? तो इसका जवाब है- नहीं. नोबेल पुरस्कार सामान्यत तौर पर मौत होने के बाद नहीं दिया जा सकता है. इसलिए अब गांधीजी के हिस्से में यह शांति पुरस्कार नहीं आ सकता है. नोबेल फाउंडेशन के नियम के अनुसार पुरस्कार केवल जिंदा व्यक्ति या संगठनों को ही मिल सकता है. हां यह जरूर है कि अगर किसी की मौत नॉमिनेट होने के बाद हो जाए तो फिर प्राइज को छीना नहीं जाता है बल्कि दे दिया जाता है.



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