दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाईदुबई’ की फ्लाइट FZ1073 में हुए कॉकपिट हमले को लेकर हर सेकेंड नए खुलासे हो रहे हैं. अब तक ये तो पता था कि भारतीय कैप्टन स्मित मछार ने घायल होने के बावजूद कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया, जिससे क्रू मेंबर्स अंदर घुसे और ओमानी को-पायलट को दबोच लिया. लेकिन अब जो सच सामने आया है उसके बाद कैप्टन स्मित मछार किसी सुपरहीरो से कम नहीं लगेंगे. कॉकपिट की टेक्निकल डिजाइन की पड़ताल करने पर सामने आया है कि प्लेन में कॉकपिट डोर का स्विच और दरवाजा खोलने का बटन, को-पायलट की तरफ होता है. यानी उस तक पहुंचने के लिए कैप्टन को चाकूओं का वार झेलते हुए डोर अनलॉक करना पड़ा होगा.
कॉकपिट का लेआउट: कैप्टन बाएं और को-पायलट दाएं
किसी भी कमर्शियल यात्री विमान जैसे बोइंग या एयरबस के कॉकपिट का ढांचा बेहद खास और तय नियमों के तहत बनाया जाता है.
- कैप्टन की सीट: कैप्टन हमेशा कॉकपिट में बाईं तरफ बैठते हैं.
- को-पायलट की सीट: फर्स्ट ऑफिसर यानी को-पायलट हमेशा दाईं तरफ बैठते हैं.
- कॉकपिट का दरवाजा: कॉकपिट का मुख्य दरवाजा दोनों सीटों के ठीक पीछे बीच में होता है, लेकिन कई मॉडल्स में दरवाजे का लॉक अनलॉक कंट्रोल या डोर रिलीज एक्सेस स्विच को-पायलट की सीट के बेहद करीब या उसकी पहुंच के दायरे में होता है.
जब 30 सितंबर को उड़ान के दौरान ओमानी को-पायलट ने अचानक चाकू निकालकर कैप्टन स्मित मछार पर हमला किया, तो उसका पहला मकसद प्लेन को नीचे गिराना और कॉकपिट को अंदर से पूरी तरह लॉक रखना था ताकि बाहर से कोई भी केबिन क्रू या पैसेंजर अंदर न आ सके.
क्यों खतरनाक साबित हुआ कॉकपिट डोर अनलॉक करना?
9/11 के आतंकी हमलों के बाद दुनिया भर के विमानों में ‘आर्मर्ड कॉकपिट डोर’ बुलेटप्रूफ और मजबूत दरवाजे लगाए गए थे. इन दरवाजों का नियम ये होता है कि इन्हें बाहर से बिना कॉकपिट के अंदर बैठे पायलटों की इजाजत के नहीं खोला जा सकता. कॉकपिट के अंदर एक ‘डोर स्विच’ होता है. इसके तीन मोड होते हैं.
- UNLOCKED: दरवाजा खुला रहता है.
- Normal: दरवाजा ऑटोमैटिक रूप से लॉक रहता है.
- DENY: अगर बाहर से कोई कोड डालकर अंदर घुसने की कोशिश करे, तो अंदर बैठा पायलट DENY दबाकर दरवाजे को बंद रख सकता है.
हमलावर ओमानी को-पायलट दाईं तरफ बैठा था. चाकू से हमला करने के बाद उसने कॉकपिट डोर के स्विच या एक्सेस कंट्रोल को ब्लॉक करने की कोशिश की थी, ताकि दरवाजा ‘DENY’ या ‘LOCKED’ पोजीशन में रहे.
कैप्टन स्मित मछार बाईं सीट पर थे और खून से लथपथ हो चुके थे. दरवाजा खोलने के लिए उन्हें केवल एक बटन नहीं दबाना था, बल्कि दाईं तरफ मौजूद हमलावर को-पायलट से फिजिकली भिड़ना था. उन्हें एक हाथ से अपने जख्मों को संभालते हुए और प्लेन का कंट्रोल बचाते हुए, दूसरे हाथ से हमलावर को पीछे धकेलना पड़ा ताकि वह कॉकपिट का दरवाजा अनलॉक कर सकें.
कैप्टन स्मित ने 30 सेकेंड तक की मौत से हाथापाई
30 सेकंड के भीतर विमान जब 14,000 फीट नीचे गिरा, तब कॉकपिट के अंदर का नजारा किसी डरावनी फिल्म से कम नहीं था.
- अचानक हमला: ओमानी को-पायलट ने बिना किसी चेतावनी के कैप्टन पर चाकू से वार कर दिया.
- हाथापाई और संघर्ष: घायल कैप्टन स्मित ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने हमलावर के हाथ को रोका, जिससे कॉकपिट में जोरदार हाथापाई शुरू हो गई.
- दरवाजा अनलॉक करना: को-पायलट लगातार प्लेन को नीचे की तरफ झुका रहा था और दरवाजे तक किसी को नहीं पहुंचने देना चाहता था. कैप्टन स्मित ने पूरी ताकत लगाकर हमलावर को झटका और डोर अनलॉक रिलीज बटन को खींच दिया.
जैसे ही कॉकपिट का दरवाजा खुला, बाहर इंतजार कर रहे केबिन क्रू और अलर्ट यात्रियों ने अंदर का खौफनाक मंजर देखा. खून से सने कॉकपिट में कैप्टन स्मित हमलावर से जूझ रहे थे.
दरवाजा खुलते ही कैसे पलटी बाजी?
कॉकपिट का दरवाजा अनलॉक होते ही बाहर खड़े क्रू मेंबर्स और दिलेर यात्रियों ने बिना एक पल गंवाए अंदर छलांग लगा दी.
- हमलावर को दबोचा: यात्रियों और क्रू ने मिलकर ओमानी को-पायलट का गला दबोच लिया, हाथ से चाकू छीना और उसे नीचे पटककर कसकर बांध दिया.
- ऑफ-ड्यूटी पायलटों की एंट्री: खुशकिस्मती से उसी फ्लाइट में फ्लाईदुबई के दो अन्य ऑफ-ड्यूटी पायलट पैसेंजर बनकर सफर कर रहे थे. दरवाजा खुलते ही वो तुरंत कॉकपिट में घुसे.
- सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग: घायल कैप्टन स्मित को प्राथमिक उपचार के लिए पीछे ले जाया गया और ऑफ-ड्यूटी पायलटों ने प्लेन का कंट्रोल संभालकर उसे सऊदी अरब में सुरक्षित लैंड कराया.
अगर कैप्टन स्मित उस हाथापाई में कॉकपिट का दरवाजा अनलॉक करने में नाकाम रहते, तो बाहर मौजूद क्रू मेंबर्स चाहे कितनी भी कोशिश कर लेते, बुलेटप्रूफ दरवाजा तोड़कर अंदर नहीं घुस पाते.
एविएशन सिक्योरिटी के सामने नया ‘इंसाइडर थ्रेट’ सवाल
इस हादसे ने दुनिया भर के एविएशन को सोचने पर मजबूर कर दिया है. 9/11 के सुरक्षा नियम इस सोच पर बनाए गए थे कि खतरा हमेशा कॉकपिट के बाहर से आएगा, इसलिए कॉकपिट के दरवाजे को इतना मजबूत बनाया गया कि कोई बाहर से अंदर न आ सके.
लेकिन फ्लाईदुबई की इस घटना ने साबित कर दिया कि जब खतरा कॉकपिट के अंदर यानी खुद पायलट या को-पायलट मौजूद हो, तो वही सुरक्षा वाला दरवाजा अंदर बैठे बेकसूर पायलट के लिए ‘मौत का पिंजरा’ बन जाता है. अब एविएशन कंपनिया 2 बड़े सवालों पर मंथन कर रही हैं.
- क्या कॉकपिट में इमरजेंसी के वक्त बाहर से केबिन क्रू के लिए कोई ऐसा मास्टर की/ओवरराइड सिस्टम होना चाहिए जिसे अंदर बैठा रेडिकल पायलट ब्लॉक न कर सके?
- क्या कॉकपिट डोर स्विच का एक्सेस केवल एक पायलट के पास सीमित रखने के बजाय दोनों पायलटों की स्थिति के हिसाब से नए सेफ्टी इंटरलॉक बनाए जाने चाहिए?