लखनऊ: उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने सियासी दांव से हलचल पैदा कर दी है. राज्य विधानसभा की मौजूदा हालात के लिसाब से आठ सीटें बीजेपी और दो सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में जानी तय मानी जा रही है. लेकिन अखिलेश यादव ने बुधवार को चाचा और सपा महासचिव रामगोपाल यादव और गुजरात के उद्योगपति धनराज परिमल नथवानी का नॉमिनेशन करवा दिया. इसके साथ ही उन्होंने यह भी घोषणा कर दी कि वह अगले कुछ दिनों में तीसरे उम्मीदवार का भी नॉमिनेशन करवाएंगे. ऐसे में 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव में 11 उम्मीदवार हो जाएंगे. ऐसी स्थिति में क्रॉस वोटिंग होना तय है. 16 अक्टूबर को राज्य की 10 राज्यसभा सीट के लिए चुनाव होना है.
जब यूपी बीजेपी विधायकों ने भी की थी क्रॉस वोटिंग
आमतौर पर देखा गया है कि आरएसएस की विचारधारा पर आधारित बीजेपी के विधायक कम ही मौकों पर क्रॉस वोटिंग करते हुए देखे गए हैं. लेकिन वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह साल 2000 की घटना को याद करते हैं. उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में राज्य सभा के चुनाव हो रहे थे, जिसमें बीजेपी के विधायकों ने भी बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग की थी.
वरिष्ठ पत्रकार उस घटना को याद करते हुए बताते हैं बीजेपी ने राज्य सभा के लिए तेज तर्रार नेता सुषमा स्वराज को प्रत्याशी बनाया था. सुषमा को राज्य सभा सांसद बनने के लिए जीतने विधायकों की जरूरत थी उससे कहीं ज्यादा नंबर बीजेपी के पास थे. यानी बीजेपी सुषमा की जीत सुनिश्चित करने में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी.
राजीव शुक्ला के चलते सुषमा स्वराज पर मंडराया था हार का खतरा
तभी हरदोई जिले के कद्दावर राजनेता नरेश अग्रवाल ने अपनी पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस से राज्य सभा चुनाव में उस दौर के चर्चित पत्रकार राजीव शुक्ला को मैदान में उतार दिया था. उत्तर प्रदेश में किसी प्रत्याशी के राज्य सभा सांसद बनने के लिए 34 से 36 विधायकों के वोट की जरूरत होती है, लेकिन लोकतांत्रिक कांग्रेस के पास केवल 20 विधायक थे. ऐसे में माना जा रहा था कि राजीव शुक्ला किसी भी कीमत पर राज्य सभा चुनाव नहीं जीतेंगे.
प्रदीप सिंह ने बताया कि जब राज्य सभा चुनाव के लिए वोटिंग का दिन आया तो बीजेपी के लोगों की सांसे उखड़ने लगी थीं, क्योंकि राजीश शुक्ला की तैयारियां देखकर उन्हें डर सताने लगा था कि कहीं सुषमा स्वराज ना चुनाव हार जाएं. दरअसल, राजीव शुक्ला के सभी राजनीतिक दलों के लोगों के काफी अच्छे संबंध थे. इसी वजह से उन्होंने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और बीजेपी सभी दलों के विधायकों को अपने पक्ष में वोट देने के लिए तैयार कर लिया था.
राजीव शुक्ला के पक्ष में क्रॉस वोटिंग होने के चलते सुषमा स्वराज जैसे तैसे राज्यसभा का चुनाव जीत पाई थीं.
सपा-बसपा विधायकों ने व्हिप के बाद भी राजीव शुक्ला को किया था सपोर्ट
वोटिंग के दिन समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने व्हिप जारी किया था, यानी इन दोनों पार्टियों के विधायकों को कानून निर्देश था कि वो पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट नहीं करेंगे. लेकिन जब वोटिंग हुई तो सारा खेल ही पलट गया, बसपा और सपा के कई विधायकों ने व्हिप के खिलाफ राजीव शुक्ला के पक्ष में वोट डाले. वहीं कांग्रेस और बीजेपी के भी कई विधायकों ने राजीव शुक्ला के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की. यहां तक की निर्दलीय विधायकों ने भी राजीव शुक्ला के पक्ष में वोट डाले.
इस तरह राजीव शुक्ला को प्रथम वरीयता के सबसे ज्यादा 51 वोट मिले और वह वह पहली बार राज्य सभा के सांसद बन गए. हालांकि 2003 में नरेश अग्रवाल ने अपनी पार्टी अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर लिया था, जिसके बाद से राजीव शुक्ला भी कांग्रेस के ही नेता हैं. बड़े पैमाने पर क्रॉस वोटिंग होने की वजह से सुषमा स्वराज जैसे तैसे चुनाव जीत पाईं थीं. वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह दो ढाई दशक की यूपी की राजनीति में सबसे चर्चित क्रॉस वोटिंग की घटना मानते हैं.