पुतिन को अपने कौन से इलाके की सता रही चिंता, NATO को दे दी परमाणु धमकी, क्या है कलिनिनग्राद?

पुतिन को अपने कौन से इलाके की सता रही चिंता, NATO को दे दी परमाणु धमकी, क्या है कलिनिनग्राद?


Russia NATO News: रूस और NATO के बीच तनाव एक बार फिर परमाणु टकराव की आशंका तक पहुंच गया है. रूस ने चेतावनी दी है कि अगर NATO ने उसके बाल्टिक क्षेत्र के कलिनिनग्राद को हवाई और समुद्री रास्ते से अलग-थलग करने की कोशिश की, तो मॉस्को परमाणु हथियारों समेत अपने पूरे सैन्य जखीरे का इस्तेमाल करने को तैयार है. रूस ने यह बात NATO सदस्य देशों को भेजे गए एक डिप्लोमैटिक नोट में कही है. दूसरी तरफ NATO महासचिव मार्क रुटे ने रूस को परमाणु धमकियां बंद करने की नसीहत दी है. इस पूरे विवाद के केंद्र में है कलिनिनग्राद, रूस का ऐसा इलाका जो उसकी मुख्य जमीन से जुड़ा नहीं है, बल्कि यूरोप के बीच बाल्टिक सागर के किनारे बसा है. इसकी भौगोलिक स्थिति ही इसे रूस और NATO के बीच टकराव का बेहद संवेदनशील केंद्र बनाती है.

कलिनिनग्राद आखिर है क्या?

कलिनिनग्राद को समझने के लिए यूरोप का नक्शा देखना होगा. यह रूस का सबसे पश्चिमी इलाका है, जो रूस की मुख्य जमीन से सैकड़ों किलोमीटर दूर बाल्टिक सागर के किनारे बसा है. इसके दक्षिण में पोलैंड और उत्तर-पूर्व में लिथुआनिया है. दोनों NATO के सदस्य हैं. यानी कलिनिनग्राद चारों तरफ से NATO देशों से घिरा हुआ है, जबकि रूस की मुख्य जमीन से इसका सीधा जमीनी संपर्क नहीं है.

कलिनिनग्राद.

इसे भूगोल की भाषा में एक्सक्लेव (Exclave) कहा जाता है. आसान शब्दों में, किसी देश का ऐसा हिस्सा जो उसी देश की मुख्य जमीन से अलग हो और जिसके बीच दूसरे देशों का इलाका आता हो. कलिनिनग्राद रूस का ऐसा ही हिस्सा है. यहां रहने वाले लोगों और सेना तक सामान पहुंचाने के लिए समुद्री रास्ते के अलावा लिथुआनिया से होकर गुजरने वाले रेल और सड़क मार्ग भी अहम हैं. कलिनिनग्राद का इतिहास भी दिलचस्प है. दूसरे विश्व युद्ध से पहले यह जर्मनी का हिस्सा था और इसका नाम कोनिग्सबर्ग था. युद्ध खत्म होने के बाद 1945 में इसे सोवियत संघ को सौंप दिया गया. बाद में सोवियत संघ टूटने पर यह रूस के पास रहा. इस तरह रूस का यह इलाका बाकी रूसी जमीन से अलग हो गया.

रूस के लिए इतना खास क्यों है कलिनिनग्राद?

कलिनिनग्राद सिर्फ रूस का एक छोटा-सा भूभाग नहीं है. यह बाल्टिक सागर में रूस की सैन्य मौजूदगी का बड़ा केंद्र है. यहां रूस के बाल्टिक बेड़े का मुख्यालय है. इसके अलावा यहां इस्कंदर मिसाइल सिस्टम भी तैनात हैं, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हर इस्कंदर मिसाइल पर परमाणु हथियार लगा है, लेकिन इसकी क्षमता ही NATO के लिए चिंता का विषय है.

रूस के लिए इस इलाके की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि यहां से बाल्टिक सागर और यूरोप के कई अहम हिस्सों पर नजर रखी जा सकती है. अगर युद्ध की स्थिति बनती है तो यहां मौजूद मिसाइलें और सैन्य ठिकाने रूस को रणनीतिक बढ़त दे सकते हैं. दूसरी तरफ NATO के लिए भी यह इलाका बेहद संवेदनशील है, क्योंकि पोलैंड और लिथुआनिया के बीच इसकी मौजूदगी यूरोप की सुरक्षा योजना को प्रभावित करती है.

कलिनिग्राद और बेलारूस के बीच का सुवाल्की गैप.

क्या है सुवाल्की गैप, जिसे NATO की कमजोर कड़ी कहा जाता है?

कलिनिनग्राद के साथ एक और नाम बार-बार चर्चा में आता है- सुवाल्की गैप (Suwalki Gap). यह पोलैंड और लिथुआनिया के बीच करीब 65 से 100 किलोमीटर चौड़ा सीमावर्ती इलाका है. इसके एक तरफ रूस का कलिनिनग्राद है और दूसरी तरफ बेलारूस. इसकी अहमियत समझिए. NATO के तीन सदस्य देश- लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया यूरोप के बाकी NATO देशों से जमीन के रास्ते इसी क्षेत्र के जरिए जुड़े हैं. अगर किसी बड़े युद्ध में इस रास्ते को बंद कर दिया जाए तो इन तीनों देशों तक NATO की जमीनी सैन्य मदद पहुंचाना मुश्किल हो सकता है.

यही वजह है कि इसे NATO की सबसे संवेदनशील रणनीतिक जगहों में गिना जाता है. हालांकि, सुवाल्की गैप और कलिनिनग्राद एक ही जगह नहीं हैं. कलिनिनग्राद रूस का इलाका है, जबकि सुवाल्की गैप पोलैंड और लिथुआनिया के बीच का क्षेत्र है. दोनों की भौगोलिक स्थिति एक-दूसरे से जुड़ी होने के कारण सैन्य रणनीति में इनका जिक्र साथ-साथ होता है.

NATO ने रूस को क्या जवाब दिया?

रूस की चेतावनी पर NATO महासचिव मार्क रुटे ने कहा कि NATO एक रक्षात्मक गठबंधन है और रूस को परमाणु धमकियां बंद करनी चाहिए. उन्होंने इस तरह के दस्तावेज को गैरजरूरी और मदद न करने वाला बताया. रुटे ने यह भी कहा कि व्लादिमीर पुतिन जानते हैं कि सीधे टकराव में वह NATO को कभी नहीं हरा सकते. उनके मुताबिक NATO रूस पर हमला करने की तैयारी नहीं कर रहा है, लेकिन गठबंधन अपनी सुरक्षा के लिए तैयार है.



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