स्मित मच्छार की चर्चा हर जुबान पर है. ये भारत के वही पायलट हैं, जिन्होंने बहादुरी दिखाते हुए इजरायल जा रही फ्लाइट के कॉकपिट में को-पायलट के के हमले का सामना किया और उसे काबू करते हुए बड़ी हादसे को टाल दिया. तेल अवीव जा रहे फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 को हाईजैक या क्रैश की कोशिश को नाकाम कर दिया. पीएम नरेंद्र मोदी से लेकर इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतान्याहू और अमेरिका के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप तक ने स्मित को सैल्यूट किया है. हालांकि गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं है कि किसी भारतीय ने जान पर खेलकर इजरायल की मदद की है. पहली घटना 18 साल पहले की है, जब मुंबई में 26/11 का टेरर अटैक हुआ था. यहां एक केयरटेकर महिला ने 2 साल के यहूदी बच्चे को सही सलामत बचाया था. वो क्या घटना थी?
26 नवंबर 2008 का वो काला दिन, जब लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने मुंबई को गोलियों और धमाकों से थर्रा दिया था. ताज होटल, सीएसटी रेलवे स्टेशन और कामा अस्पताल जैसी जगहों के बीच कोलाबा में स्थित नरीमन हाउस भी आतंकियों का प्रमुख ठिकाना बना. नरीमन में यहूदियों के इस कल्चरल सेंटर पर हुए हमले के बीच से इंसानियत, हिम्मत और ममता की एक ऐसी कहानी निकली, जिसने पूरी दुनिया की आंखों को नम कर दिया. यह कहानी है भारतीय नैनी सैंड्रा सैम्युअल की, जिन्होंने अपनी जान की बाजी लगाकर 2 साल के मासूम यहूदी बच्चे मोशे होल्त्जबर्ग (Moshe Holtzberg) को मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकाला था.
क्या था वो पूरा मामला?
नरीमन हाउस में इजरायली रब्बी गैब्रिएल होल्त्जबर्ग और उनकी पत्नी रिवका अपने दो साल के बेटे मोशे के साथ रहते थे. सैंड्रा सैम्युअल वहां छोटे मोशे की देखभाल के लिए नैनी यानी केयरटेकर के तौर पर काम करती थीं. 26 नवंबर की रात जब भारी हथियारों से लैस आतंकियों ने नरीमन हाउस पर हमला कर दिया, तो सैंड्रा इमारत के निचले हिस्से में लॉन्ड्री रूम यानी कपड़े धोने के कमरे में खुद को बंद करके छिप गईं. पूरे भवन में फायरिंग के साथ ही चीख-पुकार मची हुई थी. सैंड्रा पूरी रात डर के साए में वहीं दुबकी रहीं.
मासूम के रोने की आवाज और फिर…
अगली सुबह यानी 27 नवंबर को सैंड्रा को ऊपर की मंजिल से 2 साल के मोशे के रोने की आवाज आई. वह अपनी मासूम आवाज में सैंड्रा, सैंड्रा… पुकार रहा था. अपनी जान की परवाह ना करते हुए सैंड्रा तुरंत ऊपर की तरफ भागीं. जब वह ऊपर पहुंचीं, तो नजारा दिल नहला देने वाला था. रब्बी गैब्रिएल और उनकी पत्नी रिवका खून से लथपथ बेसुध हाल में पड़े थे और मासूम बच्चा मोशे अपने मां-बाप की बॉडी के पास बैठकर रो रहा था. उसकी पैंट खून से सनी हुई थी.
मोशे के साथ सैंड्रा नैनी
मौत के साए से बच्चे को निकाला
आतंकी इमारत के उसी ऊपरी हिस्से में ही मौजूद थे और खतरा लगातार बना हुआ था. सैंड्रा ने बिना एक सेकंड गंवाए मासूम मोशे को अपनी गोद में उठाया, सीने से चिपकाया और बिल्डिंग के दूसरे कर्मचारी जाकिर हुसैन के साथ मिलकर आतंकियों की गोलीबारी के बीच भागकर सुरक्षित बाहर निकल आईं.
इजरायल ने सैंड्रा को कैसे दिया सम्मान?
सैंड्रा के इस अदम्य साहस और बच्चे से लगाव ने भारत ही नहीं, बल्कि इजरायल के हर नागरिक का दिल जीत लिया. इजरायल सरकार और यहूदी समुदाय ने उन्हें ‘रियल हीरो’ माना. सैंड्रा इसके बाद मोशे की देखभाल करने के लिए उसके साथ इजरायल चली गईं. साल 2010 में इजरायल सरकार ने सैंड्रा को सम्मान देते हुए उन्हें परमानेंट रेजिडेंसी यानी स्थायी निवास और इजराइल की नागरिकता दे दिया. इतना ही नहीं इजरायल ने सैंड्रा को गैर-यहूदी नागरिकों को दिए जाने वाले अपने सर्वोच्च सम्मान ‘Righteous Among the Nations’ से सम्मानित किया.
आज कहां हैं सैंड्रा और मोशे?
सैंड्रा सैम्युअल एक विधवा महिला हैं और मोशे के साथ इजरायल जाने के लिए अपने दो बच्चों को इंडिया में छोड़ दिया. वह येरुशलम शहर में रहती हैं और दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाली एक संस्था (ALEH) में अपनी सेवाएं दे रही हैं. वहीं मोशे अब बड़ा हो चुका है और अपने दादा-दादी के साथ इजरायल में रहता है. दोनों के बीच आज भी मां और बेटे जैसा अटूट रिश्ता बना हुआ है.
इजरायल वाली फ्लाइट में क्या हुआ?
दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की फ्लाइट FZ1073 में हजारों फीट की ऊंचाई पर आसमान में हादसा हो गया. इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के मुताबिक कॉकपिट में मौजूद ओमानी को-पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. कंट्रोल पैनल खराब करने की कोशिश की. स्मित ने बहादुरी से मुकाबला किया और कॉकपिट का गेट खोल दिया, जिसके बाद कुछ इजरायली पैसेंजर्स ने मिलकर आरोपी पायलट को काबू में कर लिया. ऐसा माना जा रहा है कि आरोपी प्लेन को क्रैश कराने या हाईजैक करने की फिराक में था.