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Registry vs Lease : अपनी जमीन से दूर शहर में रहकर नौकरी करने वाले युवाओं को प्रॉपर्टी से जुड़ी चीजों की जानकारी अमूमन कम ही होती है. ऐसे में अगर उन्हें पुश्तैनी संपत्ति मिल जाए तो यही तय नहीं कर पाएंगे कि इसका मायने क्या है. कई बार घर में रखे पेपर रजिस्ट्री के होते हैं तो कभी पट्टे वाली जमीन के. लेकिन, इन दोनों क्या अंतर होता है और इसका उपयोग कैसे होगा, इसकी जानकारी होना जरूरी है.
पट्टा और रजिस्ट्री दोनों ही संपत्तियों से जुड़े कानून हैं.
नई दिल्ली. ऐसा हजारों युवाओं के साथ होता है कि वे पढ़ाई-लिखाई या नौकरी करने बाहर चले जाते हैं और उन्हें अपनी पुश्तैनी जमीन या प्रॉपर्टी के बारे में कुछ भी पता नहीं होता है. मां-बाप भी बच्चों को इन पचड़ों से दूर रखने के चक्कर में उन्हें पूरी जानकारी नहीं देते हैं. ऐसे में किसी अनहोनी के बाद जब बच्चों के हाथ में संपत्ति के कागज आते हैं, तो वे समझ नहीं पाते कि आखिर इसका मतलब क्या है और इसका उपयोग कैसे किया जाए. कई बार तो यह भी समझ नहीं आता कि प्रॉपर्टी के कागज असल में रजिस्ट्री के हैं या फिर पट्टा के.
इसमें भी कोई दो राय नहीं कि तमाम युवाओं को पट्टा और रजिस्ट्री के बारे में पता भी नहीं होगा कि इन दोनों पेपर में आखिर अंतर क्या है. अगर कोई जमीन पट्टा है तो उसका क्या उपयोग होगा और उसका मायने क्या है, जबकि रजिस्ट्री की गई जमीन के पेपर का क्या मतलब होता है. अगर आपको भी दोनों तरह की संपत्तियों और उसके कागजात में इन अंतरों का पता नहीं है तो आज आपकी सभी कंफ्यूजन दूर हो जाएगी. हम आपको रजिस्ट्री और पट्टे की पूरी जानकारी देंगे.
क्या होती है रजिस्ट्री
रजिस्ट्री का मतलब होता है, किसी संपत्ति का पंजीकरण कराना. रजिस्ट्री के तहत संपत्ति को सब-रजिस्ट्रार के ऑफिस में पंजीकृत करना होता है. इस पंजीकरण के लिए बाकायदा एक सेल डीड बनती है, जिसमें बेचने वाले और खरीदने वाले का नाम होता है. साथ ही इसमें संपत्ति की कीमत का भी उल्लेख किया जाता है. इस प्रक्रिया में पंजीकरण शुल्क का भुगतान किया जाता है, जो लाखों रुपये होता है. रजिस्ट्री के लिए जरूरी होता है कि बेचने वाले के पास उस संपत्ति पर पूर्ण मालिकाना हक होना चाहिए, तभी उस संपत्ति का टाइटल खरीदने वाले के नाम ट्रांसफर होता है. रजिस्ट्री के बाद उसे खरीदने वाले का मालिकाना हक हो जाता है और वह उस संपत्ति को जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकता है.
पट्टा किसे कहते हैं
पट्टा यानी लीज किसी जमीन या संपत्ति के उपयोग करने की सुविधा भर है. इसका मतलब है कि आपको सिर्फ संपत्ति के इस्तेमाल की छूट दी जाती है, उस पर मालिकाना हक नहीं मिलता है. आपको कोई दूसरा व्यक्ति, सरकार या प्राधिकरण से भी पट्टे पर जमीन मिल सकती है. पट्टा या लीज अमूमन लंबी अविध के लिए होता है, जैसे अक्सर प्राधिकरण की जमीनों को 90 या 99 साल की लीज पर दिया जाता है. लीज की जमीन आपको मकान बनाने या खेती करने के लिए दी जा सकती है. पट्टे के कागज में अक्सर लिखा होता है कि इसे किस उद्देश्य से दिया जा रहा और कितने साल के लिए होगा. इसमें निर्माण की शर्त और उसे कैंसिल करने की शर्त भी पहले से लिखी होती है.
रजिस्ट्री और पट्टा में अंतर क्या है
- अगर आप किसी संपत्ति की रजिस्ट्री कराते हैं तो उसे आगे किसी को बेच सकते हैं या गिफ्ट दे सकते हैं, लेकिन पट्टे या
- लीज वाली संपत्ति को बेच या किसी अन्रू को ट्रांसफर नहीं कर सकते हैं.
- रजिस्ट्री कराने वाला व्यक्ति उस जमीन या संपत्ति का मालिक होता है, लेकिन पट्टा लेने वाला मालिक नहीं बन पाता, बल्कि वह सिर्फ संबंधित संपत्ति का इस्तेमाल कर पाता है.
- रजिस्ट्री वाली जमीन या संपत्ति पर आप बैंक से लोन भी ले सकते हैं, लेकिन लीज वाली जमीन पर आपको लोन नहीं मिलेगा. यह अलग बात है कि लीज की जमीन भी कुछ शर्तों के साथ रजिस्ट्री कराई जा सकती है.