गया में पिंडदान के बाद घर पर जरूर करें ये कार्य, तभी पूर्ण माना जाएगा पितृकर्म
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गया जी में पिंडदान के बाद घर लौटकर भी धार्मिक कार्य करना जरूरी है. घर आकर पितरों के नाम से दोबारा पिंडदान और सत्यनारायण कथा कराएं. इसके अलावा ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराएं. गौदान और दान-पुण्य करने से ही पितृकर्म पूर्ण माना जाता है. इससे पितरों का आशीर्वाद मिलता है.
देवघरः पितृपक्ष का समय चल रहा है. इस दौरान अपने पितरों को याद कर तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करने की परंपरा है. इस साल पितृपक्ष 27 सितंबर से शुरू हो चुका है और 10 अक्टूबर तक चलेगा. इन दिनों बड़ी संख्या में लोग बिहार के गया जी पहुंचकर अपने पूर्वजों के नाम से तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार गया जी में पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है.
यही वजह है कि पितृपक्ष के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग गया जी पहुंचते हैं. लेकिन क्या गया जी में तर्पण और पिंडदान करने के बाद ही पितृपक्ष की सारी प्रक्रिया पूरी हो जाती है? देवघर के ज्योतिषाचार्य का कहना है कि ऐसा नहीं है. गया जी में पिंडदान करने के बाद घर लौटकर भी कुछ धार्मिक कार्य करने की परंपरा बताई गई है, जिन्हें करने से पितरों की संतुष्टि के लिए किए गए कर्म को पूर्ण माना जाता है.
क्या कहते हैं देवघर के ज्योतिषाचार्य?
देवघर के पागल बाबा आश्रम स्थित मुद्गल ज्योतिष केंद्र के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुद्गल के अनुसार गया जी में तर्पण और पिंडदान करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसके बाद घर लौटकर भी पितरों के नाम से कुछ कार्य जरूर करने चाहिए. ज्योतिषाचार्य बताते हैं कि गया जी में पिंडदान करने के बाद घर पहुंचते ही पितरों के नाम से दोबारा पिंडदान करने की परंपरा है. इसके साथ ही घर में सत्यनारायण भगवान की कथा करवाना भी शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे घर का वातावरण सकारात्मक होता है और पितरों के लिए किए गए धार्मिक कर्म को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है.इसलिए जो लोग गया जी में पिंडदान करके वापस अपने घर लौट रहे हैं, उन्हें घर पर भी धार्मिक विधि के अनुसार पितरों के नाम से कर्मकांड करना चाहिए.
गौ दान और सज्जा दान करना होता है शुभ
पंडित नंद किशोर मुदगल बताते हैं कि गया जी से लौटने के बाद पितरों के नाम से गया श्राद्ध करवाना भी महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दौरान ब्राह्मणों, जरूरतमंद लोगों और अपने गोत्र के लोगों को भोजन कराने की परंपरा है. अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-पुण्य भी किया जा सकता है. इसके अलावा गौदान और सज्जा दान ब्राह्मणों को करने की बात भी कही गई है. धार्मिक मान्यता के अनुसार पितरों के निमित्त किए गए दान और भोजन से पितरों की संतुष्टि होती है और परिवार के लोगों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.
पितृ के नाम से किये गए कार्य से पितृ होते है प्रशन्न
ज्योतिषाचार्य के मुताबिक पितृपक्ष केवल एक धार्मिक रस्म नहीं बल्कि अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर भी है. गया जी में तर्पण और पिंडदान के बाद घर लौटकर पितरों के नाम से किए जाने वाले इन कार्यों को श्रद्धा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए. सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी धार्मिक कार्य को दिखावे के लिए नहीं बल्कि श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए. पितृपक्ष के दौरान किए गए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, भोजन और दान का उद्देश्य अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और श्रद्धा प्रकट करना है. ऐसे में अगर आपने भी गया जी में पितरों का पिंडदान कराया है तो घर लौटने के बाद इन धार्मिक परंपराओं को जरूर जान लें, ताकि पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्म को विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पूरा किया जा सके.