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Masoom Sharma Dehradun Controversy: देवभूमि उत्तराखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और संगीत जगत में इन दिनों अभूतपूर्व आक्रोश देखने को मिल रहा है. स्थानीय लोक कलाकारों के हक, मंच और मान-सम्मान की अनदेखी के बीच हरियाणवी गायक मासूम शर्मा के प्रस्तावित कार्यक्रम ने आग में घी डालने का काम किया है. ‘पंडवास’ जैसे स्थापित पहाड़ी बैंड के बकाए भुगतान की टीस और बाहरी कलाकारों की बेलगाम बयानबाजी के पुराने जख्मों ने मिलकर इस मामले को एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन में तब्दील कर दिया है.
Masoom Sharma Dehradun Controversy: देवभूमि उत्तराखंड के लोकसंगीत जगत में इन दिनों कलाकारों, कार्यक्रमों और प्राथमिकताओं को लेकर माहौल बेहद गरमाया हुआ है. एक तरफ लोकगायिका प्रियंका मेहर का बद्रीनाथ धाम में कॉन्सर्ट के बाद छिड़ा विवाद हो या उत्तराखंड के मशहूर म्यूजिक ग्रुप ‘पंडवास’ के बकाए भुगतान को लेकर चर्चा, तनातनी अब सोशल मीडिया पर बड़े संग्राम का रूप ले चुकी है. इसी बीच हरियाणवी गायक मासूम शर्मा के देहरादून स्थित महाराणा प्रताप क्रिकेट स्टेडियम में आयोजित होने वाले आगामी कार्यक्रम का चौतरफा विरोध शुरू हो गया है.
सोशल मीडिया पर ‘BoycottMasoomSharma’ ट्रेंड कर रहा है, जिसने स्थानीय संगीत प्रेमियों और युवाओं के आक्रोश को सार्वजनिक मंच प्रदान कर दिया है. यह पूरा विवाद अब महज संगीत या मनोरंजन तक सीमित न रहकर उत्तराखंडी स्वाभिमान, सांस्कृतिक पहचान और बाहरी हस्तक्षेप के विरोध की एक बड़ी बहस बन गया है.
आंदोलनकारियों की शहादत और सांस्कृतिक अस्मिता की दुहाई
देहरादून के स्थानीय निवासी राजेंद्र बिष्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि राज्य निर्माण के लिए 42 आंदोलनकारियों ने अपना बलिदान दिया था और लोग लगातार संस्कृति को बचाने का काम कर रहे हैं. इसके बावजूद ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा रहा है जो जनभावनाओं को आहत करती हैं. उन्होंने कहा कि इससे पहले डीएवी पीजी कॉलेज के कार्यक्रम में मासूम शर्मा ने मंत्रियों की मौजूदगी में अभद्र भाषा का प्रयोग किया था, जिसका युवाओं पर बुरा असर पड़ता है.
स्थानीय कलाकारों की अनदेखी और ‘पंडवास’ के बकाए पर आक्रोश
स्थानीय कलाकारों की अनदेखी और प्रशासनिक रवैये पर भी गंभीर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. डॉ. पंकज पैन्युली ने सवाल उठाया कि सरकार अन्य राज्यों के कलाकारों को तो मंच और प्राथमिकता दे रही है, जबकि उत्तराखंड के विख्यात ‘पंडवास’ बैंड का बकाया भुगतान 2024 से रुका हुआ है. उन्होंने कहा कि जब स्थानीय स्तर पर ही एक से बढ़कर एक प्रतिभाएं मौजूद हैं, तो मर्यादा लांघने वाले बाहरी गायकों को आमंत्रित करने का क्या औचित्य है. सोशल मीडिया पर पंडवास द्वारा मजबूरी में लिखे गए पत्र के बाद से ही लोगों में शासन-प्रशासन के इस रवैये को लेकर भारी असंतोष देखा जा रहा है.
कला जगत में मर्यादित समावेश और भाषा की शालीनता की मांग
कला जगत से जुड़े कुछ लोग इस मुद्दे पर मर्यादित समावेश का पक्ष भी रख रहे हैं. देहरादून की लोक कलाकार पूनम नैथानी का मानना है कि संगीत की कोई सीमा या बॉर्डर नहीं होता और अन्य राज्यों के कलाकारों का उत्तराखंड में स्वागत होना चाहिए. लेकिन उन्होंने यह शर्त भी साफ तौर पर रखी कि सार्वजनिक मंचों पर उपयोग की जाने वाली भाषा और शैली शालीन होनी चाहिए. उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की अभद्र या अमर्यादित भाषा किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में स्वीकार्य नहीं की जा सकती.
1 अक्टूबर के कार्यक्रम पर रार, दर्ज मामलों का उठा मुद्दा
गौरतलब है कि डीएवी कॉलेज में हुए विवादित प्रदर्शन के बाद मासूम शर्मा पर बीएनएस (BNS) की धारा 296 के तहत मामला दर्ज किया गया था. अब 1 अक्टूबर 2026 को ‘उत्तराखंड प्रीमियर लीग’ के समापन समारोह में उनके दोबारा आने की खबर से विवाद गहरा गया है. बजरंग दल, उत्तराखंड क्रांति दल और मूल निवास एवं भू-कानून समन्वय समिति जैसे कई प्रमुख संगठन इस कार्यक्रम को तुरंत रद्द करने की मांग कर रहे हैं. सांस्कृतिक पहचान की इस लड़ाई ने पूरे राज्य में एक नया राजनीतिक और सामाजिक उबाल पैदा कर दिया है.