किसानों के लिए खुशखबरी: गैस के दाम छोड़िए, अब खाद की भी नहीं होगी टेंशन! यूरिया-DAP का भरपूर इंतजाम

किसानों के लिए खुशखबरी: गैस के दाम छोड़िए, अब खाद की भी नहीं होगी टेंशन! यूरिया-DAP का भरपूर इंतजाम


*पश्चिम एशिया संकट के चलते गैस की कीमत 3 गुना, फिर भी खाद का स्टॉक फुल! रबी सीजन से पहले यूरिया-DAP का रिकॉर्ड भंडार, सप्लाई की कमी नहीं होने देगी सरकार*

खाद की किल्लत से किसानों को राहत की तैयारी, यूरिया पर सब्सिडी ₹1,350 से बढ़कर ₹2,775 और DAP पर ₹2,192 से ₹3,523 प्रति बोरी हुई

पश्चिम एशिया में जियोपॉलिटिकल क्राइसिस यानी भू-राजनीतिक संकट है. इसके चक्कर में खाद उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की कीमतों में भारी उछाल है. इसके बावजूद भारत में आगामी रबी सीजन के लिए खाद की उपलब्धता बरकरार रहेगी. इसे लेकर सरकार ने भरोसा जताया है. राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन रबी अभियान 2026-27 में उर्वरक विभाग ने बताया कि देश में रबी सीजन की शुरुआत में खाद का शुरुआती स्टॉक अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर रहने की उम्मीद है.

29 सितंबर को आयोजित सम्मेलन में बताया गया कि खरीफ 2026 सीजन के दौरान राज्यों ने असाधारण भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच खाद की उपलब्धता और वितरण का प्रभावी प्रबंधन किया. इस दौरान खाद की डायवर्जन रोकने के लिए भी कई प्रभावी कदम उठाए गए. सरकार के मुताबिक, खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता पर्याप्त बनी रही और रबी 2026-27 के लिए भी प्रत्येक राज्य को उसकी जरूरत के अनुसार खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी.

खरीफ सीजन में खाद की उपलब्धता पर्याप्त, जानिए कितना रहा स्टॉक

उर्वरक विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 1 अप्रैल से 27 सितंबर 2026 के बीच देश में यूरिया की मौसमी जरूरत 190.32 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि इसकी उपलब्धता 249.69 लाख मीट्रिक टन रही. इस दौरान DBT के जरिए 182.20 लाख मीट्रिक टन यूरिया की बिक्री हुई. 27 सितंबर तक राज्यों में 67.51 लाख मीट्रिक टन यूरिया का स्टॉक था, जबकि रास्ते में मौजूद खेप, बंदरगाहों और प्लांट सहित देश का कुल स्टॉक 81.39 लाख मीट्रिक टन रहा.

DAP की मौसमी जरूरत 56.23 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 69.47 लाख मीट्रिक टन रही. इस अवधि में DBT के जरिए 46 लाख मीट्रिक टन DAP की बिक्री हुई. राज्यों में 23.48 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 29.21 लाख मीट्रिक टन DAP का स्टॉक उपलब्ध था.

MOP की मौसमी जरूरत 17.57 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 19.56 लाख मीट्रिक टन रही. इसकी DBT बिक्री 9.43 लाख मीट्रिक टन हुई. राज्यों में 10.15 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 17.96 लाख मीट्रिक टन MOP का स्टॉक था.

NPKS की मौसमी जरूरत 84.99 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले उपलब्धता 108.24 लाख मीट्रिक टन रही. इसकी DBT बिक्री 63.93 लाख मीट्रिक टन हुई. राज्यों में 44.32 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 54.90 लाख मीट्रिक टन NPKS का स्टॉक उपलब्ध था.

वहीं, SSP की मौसमी जरूरत 34.81 लाख मीट्रिक टन थी, जबकि उपलब्धता 48.84 लाख मीट्रिक टन रही. इसकी DBT बिक्री 28.07 लाख मीट्रिक टन हुई. राज्यों में 20.88 लाख मीट्रिक टन और देश में कुल 22.89 लाख मीट्रिक टन SSP का स्टॉक था.

रबी 2026-27 की शुरुआत में यूरिया-DAP का रिकॉर्ड स्टॉक

उर्वरक विभाग के अनुमान के मुताबिक, रबी 2026-27 की शुरुआत में देश में यूरिया का स्टॉक 83.35 लाख मीट्रिक टन, DAP का स्टॉक 30.30 लाख मीट्रिक टन और NPKS का स्टॉक 56.58 लाख मीट्रिक टन रहने की उम्मीद है. पिछले रबी सीजन यानी 2025-26 की शुरुआत में यूरिया का स्टॉक 54.08 लाख मीट्रिक टन, DAP का 27.80 लाख मीट्रिक टन और NPKS का 41.48 लाख मीट्रिक टन था.

वहीं, रबी 2024-25 की शुरुआत में यूरिया का स्टॉक 72 लाख मीट्रिक टन, DAP का 16.72 लाख मीट्रिक टन और NPKS का 39 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया था.

पश्चिम एशिया संकट से यूरिया उत्पादन पर असर, गैस की कीमत करीब तीन गुना

पश्चिम एशिया में संघर्ष का असर खाद उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली प्राकृतिक गैस यानी RLNG की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है. प्राकृतिक गैस यूरिया उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है और भारत यूरिया उत्पादन के लिए अपनी जरूरत की 80 प्रतिशत से अधिक गैस आयात करता है.

उर्वरक विभाग के मुताबिक, संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर गैस आपूर्ति प्रभावित हुई और प्रमुख अंतरराष्ट्रीय उत्पादकों का यूरिया उत्पादन घटा. भारत में भी युद्ध से पहले की तुलना में लंबी अवधि के गैस अनुबंधों के तहत गैस की आपूर्ति में लगभग 60 से 65 प्रतिशत की कमी आई.

युद्ध से पहले गैस की कीमत करीब 10 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट(MMBTU) थी, जो युद्ध के बाद बढ़कर लगभग 28 से 29 डॉलर प्रति MMBTU हो गई. इसके बावजूद भारत के 32 यूरिया प्लांट्स ने जारी खरीफ 2026 सीजन में 149 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया.

सल्फर की कीमत दोगुनी, फॉस्फोरिक एसिड भी महंगा

पश्चिम एशिया संकट का असर फॉस्फेट आधारित खादों के उत्पादन पर भी पड़ा है. सल्फर, फॉस्फोरिक एसिड के उत्पादन का प्रमुख कच्चा माल है और इसका इस्तेमाल DAP और NPKS जैसे फॉस्फेट उर्वरकों के निर्माण में होता है. वैश्विक बाजार में सल्फर की सीमित उपलब्धता के कारण इसकी कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई है. फरवरी 2026 में सल्फर की कीमत 532 डॉलर प्रति टन थी, जो संकट के बाद बढ़कर 1,050 डॉलर प्रति टन हो गई.

इसी तरह फॉस्फोरिक एसिड की कीमत 1,290 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,700 डॉलर प्रति टन पहुंच गई. विभाग के अनुसार, वैश्विक स्तर पर सल्फर की कमी के कारण कई प्रमुख उत्पादकों ने फॉस्फोरिक एसिड, DAP और NPKS का उत्पादन कम कर दिया. भारत में भी घरेलू NPKS उत्पादन पिछले साल की तुलना में 26 लाख मीट्रिक टन घटा है.

DAP की आयात और उत्पादन लागत में भारी बढ़ोतरी

युद्ध से पहले DAP की आयात/उत्पादन लागत करीब 681 डॉलर प्रति टन थी, जो युद्ध के बाद बढ़कर 940 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई. इसके बावजूद सरकार ने घरेलू उत्पादन और DAP के आयात को जारी रखा, ताकि देश में खाद की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके.

किसानों को राहत: यूरिया-DAP पर सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी

कच्चे माल और गैस की कीमतों में उछाल के बीच सरकार ने यूरिया और DAP पर प्रति बोरी सब्सिडी में भी उल्लेखनीय वृद्धि की है. यूरिया पर प्रति बोरी अनुमानित सब्सिडी युद्ध से पहले करीब 1,350 रुपये थी, जो युद्ध के बाद बढ़कर लगभग 2,775 रुपये हो गई. वहीं, DAP पर प्रति बोरी अनुमानित सब्सिडी 2,192 रुपये से बढ़कर 3,523 रुपये पहुंच गई. उर्वरक विभाग ने स्पष्ट किया कि वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद हर राज्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार खाद की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी.

राज्यों को सरकार की तीन अहम हिदायतें

राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन में राज्यों से खाद के संतुलित और जिम्मेदार इस्तेमाल को बढ़ावा देने की अपील की गई. इसके साथ ही तीन प्रमुख निर्देश दिए गए:

1. खाद का संतुलित इस्तेमाल बढ़ाएं: किसानों को जरूरत के मुताबिक उर्वरकों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

2. खाद की डायवर्जन पूरी तरह रोकें: खाद का गैर-निर्धारित इस्तेमाल और अवैध डायवर्जन पूरी तरह खत्म करने की दिशा में काम किया जाए.

3. जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दें: रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने के लिए जैविक एवं प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जाए.

उर्वरक विभाग ने खरीफ 2026 के दौरान राज्यों के खाद प्रबंधन की सराहना करते हुए कहा कि मौजूदा वैश्विक चुनौतियों के बावजूद रबी 2026-27 के लिए देश में खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने की तैयारी की गई है.



Source link