कभी हर रसोई की शान थे चक्की-सिलबट्टे, आज मिक्सी के दौर में दो वक्त की रोटी को जूझ रहे कारीगर

कभी हर रसोई की शान थे चक्की-सिलबट्टे, आज मिक्सी के दौर में दो वक्त की रोटी को जूझ रहे कारीगर


Traditional Stone Craft Struggle: मध्य प्रदेश के सीधी जिले में सफेद पत्थर से बनने वाले पारंपरिक उत्पादों, जैसे चक्की और सिलबट्टे, का पुश्तैनी कारोबार आधुनिक मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण संकट में है. इन उत्पादों की मांग अब कम हो गई है, जिससे शिल्पकारों की आजीविका प्रभावित हो रही है.

पारंपरिक शिल्प पर संकट
सीधी जिले का सफेद पत्थर अपनी मजबूती और गुणवत्ता के लिए जाना जाता है. इस पत्थर से चक्की, सिलबट्टा और लुड़िया जैसे पारंपरिक उत्पाद बनाए जाते हैं. इनकी मांग मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी रही है, जहां से व्यापारी इन्हें खरीदने आते हैं. हालांकि, इलेक्ट्रिक मिक्सी और आधुनिक मशीनों के बढ़ते चलन ने इस पुश्तैनी व्यवसाय के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है.

शिल्पकारों की आजीविका
सीधी कृषि विज्ञान केंद्र के सामने मैदान में कई वर्षों से शिल्पकार पारंपरिक तरीके से पत्थर तराशने का काम कर रहे हैं. सतना और आसपास के क्षेत्रों से आए ये शिल्पकार हाथों से पत्थर को आकार देकर चक्की, सिलबट्टे और लुड़िया बनाते हैं. यह काम कई परिवारों की रोजी-रोटी का मुख्य साधन है.

उत्पादों की कीमत और उपलब्धता
इन पारंपरिक उत्पादों की कीमत आम लोगों की पहुंच में है. चक्की और अन्य सामान लगभग 400 से 500 रुपये से शुरू होते हैं, जबकि सिलबट्टे और लुड़िया 300 से 400 रुपये तक में बिकते हैं. सीधी के अलावा, सिंगरौली, शहडोल, अनूपपुर और आसपास के जिलों से भी व्यापारी यहां सामान खरीदने आते हैं.

कच्चे माल और लागत
शिल्पकार मनोरमा गोंड ने लोकल 18 को बताया कि अच्छी गुणवत्ता वाली चक्की बनाने के लिए बेहतर पत्थर बाहर से मंगवाना पड़ता है. बनारस, पन्ना और ग्वालियर से आने वाले पत्थरों से तैयार चक्कियां महंगी होती हैं, जिनकी कीमत लगभग 600 से 800 रुपये तक होती है.

शिल्पकारों की मेहनत
जसोदा गोंड ने लोकल 18 को बताया कि चक्की और सिलबट्टा बनाना उनका पुश्तैनी व्यवसाय है. एक चक्की तैयार करने में पूरा दिन लग जाता है, लेकिन कई बार इतनी मजदूरी भी नहीं निकल पाती. उनके अनुसार, एक दिन में तीन-चार सिलबट्टे या लुड़िया तैयार हो पाते हैं, जिन्हें लगभग 300 से 400 रुपये में बेचा जाता है.

पारंपरिक स्वाद और स्वास्थ्य जागरूकता
विंध्य क्षेत्र में आज भी सिलबट्टे पर पिसी चटनी और मसालों का स्वाद पसंद किया जाता है. स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण कुछ शहरी परिवार भी पारंपरिक साधनों की ओर लौट रहे हैं. चक्की से दाल, मसाले और अनाज पीसने की परंपरा आज भी कई घरों में कायम है. हालांकि, कारीगरों का कहना है कि इलेक्ट्रिक मिक्सी और आधुनिक मशीनों के आने के बाद चक्की और सिलबट्टे की मांग काफी कम हो गई है.



Source link