Mala Papalkar Success Story: कचरे के डिब्बे में मिली थी लावारिस माला, जन्म से थी नेत्रहीन, सरकारी नौकरी से रचा इतिहास

Mala Papalkar Success Story: कचरे के डिब्बे में मिली थी लावारिस माला, जन्म से थी नेत्रहीन, सरकारी नौकरी से रचा इतिहास


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Mala Papalkar Success Story: महाराष्ट्र के जलगांव रेलवे स्टेशन के कूड़ेदान से मिली जन्म से नेत्रहीन माला पापलकर ने जिंदगी में कभी हार नहीं मानी. कठिन संघर्ष और ब्रेल शिक्षा के दम पर महाराष्ट्र लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास कर नागपुर कलेक्ट्रेट में राजस्व सहायक बनीं माला की सक्सेस स्टोरी किसी को भी प्रेरित कर सकती है.

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Mala Papalkar Success Story: जन्म के साथ ही माला पापलकर को उनके अपनों ने ठुकरा दिया था

नई दिल्ली (Mala Papalkar Success Story). जिंदगी परीक्षा लेना शुरू करे तो कुछ लोग हार मानकर बैठ जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी जांबाज होते हैं जो हर मुश्किल को अपनी जीत की सीढ़ी बना लेते हैं. ऐसी ही रोंगटे खड़े कर देने वाली और दिल को छू लेने वाली कहानी है महाराष्ट्र की माला पापलकर की. आज से करीब 25 साल पहले जलगांव रेलवे स्टेशन के एक गंदे कूड़ेदान में कोई अपनी खून के रिश्ते से जुड़ी नन्ही सी जान को तड़पने के लिए छोड़ गया था.

जन्म से ही आंखों की रोशनी न होना और ऊपर से अपनों का इस तरह ठुकरा देना- किसी की भी दुनिया उजाड़ने के लिए काफी था. उस अंधेरे और बदबूदार कूड़ेदान से निकलकर नागपुर कलेक्ट्रेट तक का सफर साबित करता है कि हौसले बुलंद हों तो किस्मत के पन्ने भी खुद-ब-खुद बदल जाते हैं. जिसका कोई नहीं होता है, उसके लिए भी ईश्वर किसी न किसी को भेज ही देते हैं. ऐसे ही माला को मिला शंकर बाबा पुंडलीकराव पापलकर का साथ. पढ़िए संघर्ष की ऐसी दास्तान, जिसने देश के सामने नई मिसाल पेश की.

शंकर बाबा ने निभाया माला पापलकर के पिता का फर्ज 

माला पापलकर के अविश्वसनीय सफर के पीछे एक फरिश्ता हमेशा रहा.. पद्मश्री शंकर बाबा पापलकर. जलगांव पुलिस ने जब उस लावारिस बच्ची को बचाया तो उसे अमरावती के वझर स्थित अनाथालय के संचालक शंकर बाबा को सौंप दिया. बाबा ने न सिर्फ उसे अपना नाम यानी ‘पापलकर’ सरनेम दिया, बल्कि अपनी बेटी की तरह पाल-पोसकर बड़ा भी किया. अनाथालय के कोने में बैठकर ब्रेल लिपि से पढ़ने वाली माला को कभी महसूस नहीं होने दिया कि उसके सिर पर माता-पिता का साया नहीं है.

कूड़ेदान के अंधेरे से निकलकर रोशनी की तलाश

जिंदगी की शुरुआत सबसे बुरे तरीके से हो तो टूट जाना लाजिमी है. लेकिन माला पापलकर ने हार मानने के बजाय हालातों से लड़ना चुना. 25 साल पहले जलगांव रेलवे स्टेशन के एक डस्टबिन में रोती हुई नवजात बच्ची मिली थी. उसे जन्म से ही दिखाई नहीं देता था. पुलिस ने उसे बचाकर अमरावती के अनाथालय के हवाले कर दिया. वहां उसकी मुलाकात सामाजिक कार्यकर्ता और हाल ही में पद्मश्री से सम्मानित शंकर बाबा पापलकर से हुई. बाबा ने उसे न सिर्फ अपनी छत्रछाया दी, बल्कि नई पहचान और जीने का मकसद भी दिया.

ब्रेल लिपि और शिक्षा बना सबसे बड़ा हथियार

अनाथालय में पलना-बढ़ना और वो भी दिव्यांग के तौर पर- मुश्किलें हर कदम पर थीं. लेकिन माला पापलकर ने अपनी कमजोरी को कभी रोड़ा नहीं बनने दिया. उन्होंने डॉ. भिवापुरकर अंध विद्यालय से अपनी शुरुआती पढ़ाई पूरी की. इसके बाद विदर्भ ज्ञान विज्ञान संस्थान से ग्रेजुएशन और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की. अनाथालय के सीमित संसाधनों और तमाम प्रशासनिक अड़चनों के बीच भी माला ने कभी पढ़ना नहीं छोड़ा. ब्रेल बुक्स और उनके मजबूत इरादों ने उन्हें एक खास पहचान दिलाई.

MPSC क्रैक कर नागपुर कलेक्ट्रेट में मारी बाजी

माला पापलकर की मेहनत आखिरकार रंग लाई. उन्होंने महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन (MPSC) की ग्रुप-सी (क्लर्क-कम-टाइपिस्ट) परीक्षा पास कर ली. कागजी और प्रक्रियात्मक देरी के बाद, आखिरकार माला को नागपुर कलेक्ट्रेट में राजस्व सहायक (Revenue Assistant) के रूप में नियुक्ति पत्र मिल गया. यह सिर्फ एक नौकरी मिलने की खबर नहीं थी, बल्कि यह उस हर लावारिस और बेसहारा बच्चे के लिए उम्मीद की किरण थी जो खुद को समाज के हाशिए पर पाते हैं.

माला की सक्सेस स्टोरी साबित करती है कि अगर इरादे पक्के हों तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती.



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