किसान है या जादूगर? एक ही मौसम में कर ली तीन बार कमाई, ऐसा क्या लगाया जुगाड़
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Faridabad News: फरीदाबाद में धान की कटाई शुरू होते ही पराली का मुद्दा भी चर्चा में है. डीग गांव के किसान कुंवरपाल कई सालों से खेत में पराली नहीं जलाते. हाथ से धान की कटाई के बाद बची पराली को पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं और करीब 400-500 रुपये प्रति क्विंटल तक बेच भी लेते हैं.
फरीदाबाद: फरीदाबाद में धान की कटाई शुरू हो चुकी है. कई किसानों ने खेतों में धान काटना शुरू कर दिया है और मंडी में भी धान पहुंचने लगा है. आने वाले दिनों में दिवाली के आसपास धान की कटाई का काम और तेजी पकड़ सकता है. इसी समय हर साल दिल्ली और आसपास के इलाकों में प्रदूषण को लेकर पराली का मुद्दा भी उठने लगता है.
अक्सर आरोप लगाए जाते हैं कि धान की कटाई के बाद किसान पराली जला देते हैं और इसी वजह से प्रदूषण बढ़ता है. लेकिन फरीदाबाद में कई किसान पराली जलाने के बजाय उससे फायदा उठा रहे हैं. यहां किसान पराली को बोझ नहीं मानते, बल्कि पशुओं के चारे और खेत में खाद के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.
सेहत और पर्यावरण को नुकसान
फरीदाबाद के डीग गांव के रहने वाले किसान कुंवरपाल भी कई सालों से खेतों में पराली नहीं जला रहे हैं. वह धान की कटाई ज्यादातर हाथ से करवाते हैं. उनका कहना है कि जब पराली का इस्तेमाल पशुओं के चारे के रूप में हो सकता है और इससे कमाई भी हो रही है, तो खेत में आग लगाने की जरूरत ही क्या है. पराली जलाने से सेहत और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने के साथ खेत की मिट्टी पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में किसान बिना आग लगाए इसका फायदा उठा सकते हैं.
कुंवरपाल बड़े पैमाने पर खेती करते हैं और शुगर फ्री नीले आलू की खेती के लिए भी जाने जाते हैं. जिस खेत में धान की खेती होती है, उसी खेत में हाथ से कटाई के बाद बची पराली को खेत में इस्तेमाल करने से अगली फसल के लिए फायदा मिलता है. खासकर जिस खेत में वह शुगर फ्री नीले आलू की खेती करते हैं, वहां पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी को फायदा पहुंचता है और आलू की पैदावार बेहतर करने में मदद मिलती है.
चारे से होती है अलग कमाई
Local18 से बातचीत में फरीदाबाद के डीग गांव के किसान कुंवरपाल बताते हैं कि मुझे कई साल हो गए हैं और अब खेतों में आग लगाता ही नहीं हूं. ज्यादातर धान की कटाई मैं हाथ से ही करवाता हूं. हाथ से कटाई करवाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें पराली बचती है, जिसे पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे किसान को पराली जलाने की जरूरत नहीं पड़ती और चारे से अलग कमाई भी हो जाती है.
मिट्टी को मिलते हैं पोटाश और कैल्शियम
कुंवरपाल बताते हैं कि मैं शुगर फ्री नीले आलू की खेती करता हूं और इस इलाके में कई सालों से इसकी खेती कर रहा हूं. आलू की खेती में हाथ से धान की कटाई काफी मायने रखती है. धान की कटाई के बाद खेत में बचा अवशेष मिट्टी के साथ मिलकर खाद की तरह काम करता है. इससे खेत की जुताई भी ठीक रहती है और मिट्टी को पोटाश और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व मिलते हैं.
400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक्री
कुंवरपाल बताते हैं कि हाथ से कटाई के बाद बचने वाला धान का चारा पशुओं के काम आता है. वह बताते हैं कि यह चारा करीब 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक बिक जाता है. यानी किसान जिस पराली को जलाकर नुकसान कर सकता है, उसी को संभालकर रखें तो उससे कमाई भी कर सकता है. कुंवरपाल का कहना है कि पराली जलाने से किसान को कोई खास फायदा नहीं है, जबकि उसे चारे के तौर पर बेचने या पशुओं के लिए इस्तेमाल करने से सीधा लाभ मिल सकता है.
खेत में आग लगाने के बजाय अगर पराली का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो इससे खेत, पशु और किसान तीनों को फायदा हो सकता है. यही वजह है कि वह कई सालों से पराली नहीं जला रहे हैं और हाथ से कटाई करवाकर उसका इस्तेमाल अपने खेत और पशुओं के लिए कर रहे हैं.