शेयर मार्केट सोमवार को क्रैश हुआ तो कारण तलाशे जाने लगे. कुछ लोगों को ईरान जंग नजर आई तो कुछ को क्रूड की कीमतें. विदेशी निवेशकों की बिकवाली, बॉन्ड यील्ड में वजह दिखी तो कुछ में बैंकों की परफार्मेंस… लेकिन एक वजह भारत से भी जुड़ी हुई थी. दरअसल, महाराष्ट्र में बारिश ने इस बार सिर्फ खेतों का हिसाब नहीं बिगाड़ा है. पूरा हिसाब किताब खराब कर दिया है. खेत में पानी कम पड़ा तो किसान की फसल पर असर होगा, फसल कम हुई तो मंडी में माल कम पहुंचेगा. मंडी में माल कम हुआ तो दाल-सोयाबीन-मक्का जैसी चीजों के भाव चढ़ने तय मानिए. और अगर खाने-पीने का सामान महंगा हुआ तो उसकी मार सीधे आपके घर की रसोई पर पड़ेगी. यहीं से शेयर बाजार डरा हुआ है.
शेयर बाजार सिर्फ आज का भाव नहीं देखता. बाजार यह भी सोचता है कि अगले तीन-छह महीने में महंगाई कितनी बढ़ सकती है. लोग कितना खर्च करेंगे. कंपनियों की लागत कितनी बढ़ेगी और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को लेकर क्या करेगा. यही वजह है कि महाराष्ट्र में सूखे की खबर से शेयर मार्केट तक हिलता नजर आया.
आखिर इतनी बड़ी बात क्यों
महाराष्ट्र की 358 तहसीलों में से 265 को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है. यानी करीब तीन-चौथाई तहसीलें इसकी चपेट में हैं. किसान ने बीज तो डाल दिया, लेकिन पौधे को जितना पानी चाहिए था, वह नहीं मिला. कहीं फसल कमजोर हुई, कहीं प्रोडक्शन घटने का डर है और कहीं नुकसान का आकलन किया जा रहा है . सरकार देख रही कि इस सूखे से फसल कितनी कम होगी? क्योंकि आगे की पूरी कहानी इसी आंकड़े पर टिकी है. खेत में फसल कम हुई तो आपकी रसोई में क्या होगा?
किचन तक कैसे पहुंची तपिश
मान लीजिए महाराष्ट्र के किसी इलाके में तुअर दाल की पैदावार कम हो गई. किसान के खेत से मंडी तक पहले जितनी तुअर आ रही थी, अब उससे कम आने लगी. लेकिन घरों में दाल खाने वाले लोगों की संख्या तो अचानक कम नहीं हो जाएगी. यानी मांग लगभग वही रहेगी और बाजार में माल कम हो सकता है. ऐसे में दाम बढ़ने का दबाव बनता है.
यही बात सोयाबीन, मक्का और दूसरी फसलों के साथ हो सकती है. कपास का मामला थोड़ा अलग है, क्योंकि उसका सीधा रिश्ता खाने की थाली से नहीं है. लेकिन वह किसानों की कमाई, टेक्सटाइल और दूसरी इंडस्ट्री की लागत से जुड़ा है.
चीनी का तो सीधा कनेक्शन है. महाराष्ट्र देश के बड़े गन्ना और चीनी उत्पादक राज्यों में है. अगर गन्ने की फसल पर मौसम का असर पड़ता है तो चीनी के उत्पादन और कीमतों पर बाजार की नजर जाती है.
हालांकि, कीमत सिर्फ महाराष्ट्र की फसल से तय नहीं होती. दूसरे राज्यों में कितना उत्पादन हुआ, सरकार के पास कितना स्टॉक है, बाजार में कितनी आवक हो रही है और जरूरत पड़ने पर आयात होता है या नहीं, इन सबका असर पड़ता है.
फिर शेयर बाजार को इतनी चिंता क्यों?
इसे ऐसे सोचिए कि अगर महीने का राशन पहले 5000 रुपये में आ जाता था और अब 5500 रुपये लगने लगे तो अतिरिक्त 500 रुपये कहां से आएंगे? हो सकता है परिवार बाहर खाना कम कर दे. नया कपड़ा अगले महीने खरीदे. मोबाइल बदलने का फैसला टाल दे. बाइक या दूसरी बड़ी खरीदारी कुछ समय के लिए रोक दे. एक परिवार ऐसा करे तो बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता. लेकिन अगर करोड़ों परिवार महंगाई की वजह से थोड़ा-थोड़ा खर्च कम करने लगें तो कंपनियों की बिक्री पर असर पड़ सकता है. यही चीज शेयर बाजार पहले से भांपने की कोशिश करता है. बाजार में बैठे निवेशक आज की कमाई से ज्यादा यह देख रहे होते हैं कि कल कंपनी कितना कमा पाएगी.
यहीं से RBI की एंट्री
अब मान लीजिए खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ने लगे. महंगाई पहले से ही चिंता का विषय है. अगस्त में खुदरा महंगाई 4.82 फीसदी रही, जबकि जुलाई में यह 4.45 फीसदी थी. खाने-पीने की चीजों की महंगाई भी जुलाई के 5.52 फीसदी से बढ़कर अगस्त में 5.95 फीसदी हो गई. अब अगर फसल खराब होने की वजह से खाने का सामान और महंगा होने लगा तो बाजार की चिंता बढ़ सकती है. क्योंकि महंगाई लंबे समय तक ऊपर रही तो RBI के सामने मुश्किल बढ़ती है. अगर ब्याज दर बढ़ती है तो कर्ज महंगा हो सकता है. घर का लोन, कार लोन या बिजनेस के लिए लिया जाने वाला कर्ज महंगा पड़ सकता है. और महंगा कर्ज मतलब लोग और कंपनियां पैसा खर्च करने से पहले दो बार सोच सकती हैं. इसी वजह से इन्वेस्टर्स डरे हुए हैं.