बदहाली का शिकार हुआ धौलपुर का शेरगढ़ दुर्ग: टूटती दीवारें और उखड़ी सड़कें बयां कर रही हैं 900 साल पुराने किले का दर्द

बदहाली का शिकार हुआ धौलपुर का शेरगढ़ दुर्ग: टूटती दीवारें और उखड़ी सड़कें बयां कर रही हैं 900 साल पुराने किले का दर्द


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Dholpur Shergarh Fort: धौलपुर में चंबल किनारे स्थित 900 साल पुराना ऐतिहासिक शेरगढ़ किला आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. कभी शासकों की राजधानी रहा यह दुर्ग अब खंडहर में बदल रहा है. किले की दीवारें ढह रही हैं और रास्तों पर मलबा पसरा है. किले तक पहुंचने वाली सड़क भी पूरी तरह उखड़ चुकी है, जिससे पर्यटकों को परेशानी होती है. बाबर की ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में भी इस किले का जिक्र है. इतिहासकारों ने सरकार से इसके संरक्षण और ‘चंबल व्यू’ टावर बनाने की मांग की है, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को नष्ट होने से बचाया जा सके.

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धौलपुर: धौलपुर जिले में चंबल नदी के किनारे बीहड़ों के बीच स्थित ऐतिहासिक शेरगढ़ किला आज अपनी बदहाली के आंसू बहा रहा है. करीब 900 साल पुराना यह गौरवशाली दुर्ग कभी ताकतवर शासकों की राजधानी हुआ करता था, लेकिन आज इसकी टूटती दीवारें और उखड़ी हुई सड़कें इसके दर्द की कहानी बयां कर रही हैं. समय की मार और प्रशासन की घोर अनदेखी के चलते यह ऐतिहासिक धरोहर अब धीरे-धीरे खंडहर में तब्दील हो रही है.

किले की मौजूदा स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी है. ऐतिहासिक महत्व रखने वाली इस इमारत की दीवारें अब काफी कमजोर हो गई हैं और लगातार गिर रही हैं. हाल ही में किले की सुरक्षा के लिए बनाई गई चारदीवारी का एक बड़ा हिस्सा भी अचानक ढह गया है. इसका भारी मलबा किले तक जाने वाली मुख्य सड़क पर पड़ा हुआ है. इस मलबे के कारण यहां दर्शन और भ्रमण के लिए आने वाले पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इसके अलावा, किले तक पहुंचने वाला मुख्य मार्ग भी पूरी तरह से जर्जर हो चुका है. सड़क जगह-जगह से उखड़ गई है और उसमें बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं, जिससे वाहनों और पैदल यात्रियों का आवागमन मुश्किल हो गया है.

900 साल पुराना है शेरगढ़ का गौरवशाली इतिहास
स्थानीय इतिहासकार अरविंद शर्मा के अनुसार, चंबल नदी के बीहड़ों की गोद में बसा शेरगढ़ दुर्ग धौलपुर के सुनहरे इतिहास की एक बेहद महत्वपूर्ण निशानी है. इस दुर्ग की मजबूत नींव 12वीं शताब्दी में यदुवंशी शासक धर्मपाल सिंह ने रखी थी. अपने सुदीर्घ इतिहास में इस किले ने कई भयंकर आक्रमण और भीषण युद्ध देखे हैं. इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि महाराजा राना कीरत सिंह ने वर्ष 1806 से लेकर 1811 तक इसी शेरगढ़ दुर्ग को अपनी मुख्य राजधानी बनाया था. किसी समय इस दुर्ग की मजबूत प्राचीर पर कई बहुमूल्य और विशाल तोपें तैनात हुआ करती थीं. इनमें से एक ऐतिहासिक तोप को आज भी धौलपुर के सर्किट हाउस में सुरक्षित रखा गया है.

मुगल काल और बाबर की आत्मकथा में भी है जिक्र
धौलपुर के इस ऐतिहासिक शेरगढ़ दुर्ग का महत्व इस बात से भी आंका जा सकता है कि इसका उल्लेख मुगल शासक बाबर ने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में भी किया है. बाबर ने इसे धौलपुर दुर्ग के नाम से संबोधित किया था. बाद में अफगान शासक शेरशाह सूरी के शासनकाल में इसका नामकरण ‘शेरगढ़ दुर्ग’ के रूप में हुआ और तब से इसे इसी नाम से जाना जाता है. इतिहास में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी द्वारा शेरगढ़ पर किए गए आक्रमण का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है. उस दौर में यहां के अधिपति विनायक देव थे, जो ग्वालियर के प्रसिद्ध शासक मानसिंह तोमर के घनिष्ठ मित्र थे.

संरक्षण और पर्यटन विकास की दरकार
इतिहासकार अरविंद शर्मा का स्पष्ट मानना है कि राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस अमूल्य ऐतिहासिक धरोहर के उचित संरक्षण पर तुरंत ध्यान देना चाहिए. अगर शेरगढ़ किले का पर्यटन की दृष्टि से सही तरीके से विकास किया जाए, तो यहां आने वाले पर्यटक चंबल नदी के प्राकृतिक सौंदर्य, बीहड़ों के रहस्य और धौलपुर के समृद्ध इतिहास को एक साथ बहुत करीब से महसूस कर सकेंगे. उन्होंने पूर्व जिला कलेक्टर अभय कुमार को इस स्थान पर ‘चंबल व्यू’ नाम से एक आकर्षक वॉच टावर बनाने का बेहतरीन सुझाव भी दिया था. इस टावर से चंबल नदी और बीहड़ों का विहंगम नजारा आसानी से देखा जा सकता है. शेरगढ़ दुर्ग धौलपुर की एक जीती-जागती ऐतिहासिक विरासत है. अगर समय रहते इसके संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो वह दिन दूर नहीं जब आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ऐतिहासिक किले के गौरवशाली अवशेषों को देखना भी पूरी तरह से नामुमकिन हो जाएगा.



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