अनंत-सूरभान की अदावत के बीच मोकामा पॉलिटिक्स में जेनरेशनल शिफ्ट के संकेत, अभिषेक-अंकित के बाद अमितोष भी एक्टिव

अनंत-सूरभान की अदावत के बीच मोकामा पॉलिटिक्स में जेनरेशनल शिफ्ट के संकेत, अभिषेक-अंकित के बाद अमितोष भी एक्टिव


पटना. बाढ़ अनुमंडल के मोकामा विधानसभा में अब राजनीति युवाओं के कंधे पर जाने के संकेत अब खुले तौर पर दिखने लगे हैं. एक तरफ विधायक अनंत सिंह ने पहले ही कह दिया है कि अब अगला चुनाव उनका पुत्र लड़ेगा, वहीं दूसरी तरफ पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के बेटेअमितोष भी मोकामा में सक्रिय हो गए हैं. पिछले दो दिनों में मोकामा में हुई दो घटनाओं के बाद दोनों बाहुबलियों के बेटे पीड़ित परिवारों से मिलने पहुंचे. पिछले दो दिनों में हुई घटनाओं के पीड़ित परिवारों से मुलाकात और आर्थिक मदद के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या मोकामा की राजनीति में अब नई पीढ़ी की भूमिका बढ़ने वाली है. इससे साफ है कि मोकामा का चुनावी अखाड़ा अब पुत्रों के हाथ में जा रहा है.

बता दें कि बाढ़ अनुमंडल के मरांची थाना अंतर्गत नौ भैया टोला से 18सितंबर से लापता रामप्रवेश सिंह का शव बरामद हुआ था. वहीं, बाढ़ अनुमंडल के पंचमहला थाना क्षेत्र अंतर्गत नौरंगा जलालपुर पंचायत में दो पक्षों के बीच हुए विवाद में हुई मारपीट में एक महिला की हत्या कर दी गई जबकि चार लोग घायल हुए थे. इन्हीं घटनाओं में पीड़ित परिजनों से मुलाकात करने दोनों ही राजनीतिक परिवार की विरासत को लिए अभिषेक और अमितोष बारी बारी से पहुंचे थे.

अनंत सिंह पहले ही कर चुके हैं बेटे के नाम का ऐलान

मोकामा में अनंत सिंह के परिवार की राजनीतिक सक्रियता अचानक शुरू नहीं हुई है. मोकामा से 5 बार विधायक रहे अनंत सिंह पहले ही कह चुके हैं कि वह आगे खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और उनके बेटे अभिषेक जनता के बीच जाकर काम करेंगे. मार्च 2026 में उन्होंने इस संबंध में सार्वजनिक बयान दिया था. जुलाई में भी अभिषेक की सार्वजनिक कार्यक्रमों में मौजूदगी और लोगों से संवाद की चर्चा हुई थी. ऐसे में हालिया मुलाकातों को उनके राजनीतिक संपर्क बढ़ाने की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है.

विधायक अनंत सिंह के दोनों बेटे अभिषेक और अंकित पीड़ित परिजनों से मिले और मदद का आश्वासन दिया.

अनंत सिंह के बेटे अभिषेक के बारे में जानिए

अनंत सिंह के जुड़वा बेटे हैं, अभिषेक सिंह और अंकित सिंह. दोनों ने एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया है और लंदन में भी पढ़ाई की है. 2025 विधानसभा चुनाव में जब अनंत सिंह दुलारचंद यादव हत्याकांड में जेल में थे, तभी दोनों बेटों ने गांव-गांव जाकर  कैंपेन चलाया था. JDU के घोसवरी ब्लॉक कार्यक्रम में अनंत सिंह ने मंच पर अभिषेक को अपना उत्तराधिकारी भी घोषित किया था.

सूरजभान सिंह के बेटे अमितोष की सक्रियता से बढ़ी चर्चा

दूसरी ओर, पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के बेटे अमितोष का मोकामा पहुंचकर पीड़ित परिवारों से मिलना स्थानीय राजनीति में चर्चा का विषय बना है. बता दें कि अमितोष चेन्नई में अपने पिता के इलाज के दौरान वहां थे और घटनाओं की जानकारी मिलने के बाद मोकामा पहुंचे. पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता देना उनके क्षेत्रीय संपर्क और सार्वजनिक सक्रियता का साफ संकेत है.

पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के बेटे अमितोष ने मोकामा पहुंच कर पीड़ित परिजनों से मुलाकात की और आर्थिक सहायता भी दी.

मोकामा की राजनीति में विरासत और जनसंपर्क का सवाल

बता दें कि मोकामा में अनंत सिंह और सूरजभान सिंह दोनों का पुराना राजनीतिक प्रभाव रहा है. सूरजभान सिंह 2000 में मोकामा से विधायक बने थे और बाद में सांसद रहे. अनंत सिंह ने भी इस क्षेत्र से लगातार चुनावी राजनीति की है. 2025 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह ने जेडीयू के टिकट पर मोकामा सीट जीती थी. ऐसे राजनीतिक इतिहास वाले क्षेत्र में परिवार के युवाओं की सक्रियता को केवल सामाजिक मुलाकातों तक सीमित करके देखना भी मुश्किल है.

मोकामा में जनरेशन शिफ्ट की शुरुआत

मोकामा की राजनीति पिछले 30 साल से दो बाहुबलियों, छोटी सरकार अनंत सिंह और दादा सूरजभान सिंह के बीच घूमती रही है. 2000 में सूरजभान ने अनंत के बड़े भाई दिलीप सिंह को हराकर एंट्री ली थी. अब दोनों परिवारों की दूसरी पीढ़ी आमने-सामने है. पिता जेल, बीमारी और उम्र के कारण बैकफुट पर हैं और बेटे फ्रंटफुट पर हैं. बाढ़ अनुमंडल में अब यही चर्चा है कि अगला विधानसभा चुनाव पिता नहीं, पुत्र लड़ेंगे.

मोकामा की राजनीति में सूरजभान सिंह और अनंत सिंह की अदावत से स्थानीय राजनीति गर्म रहती है.

क्या अगली पीढ़ी के लिए तैयार हो रहा है सियासी मैदान?

फिलहाल दोनों परिवारों के युवाओं की सक्रियता और चुनावी दावेदारी के बीच अंतर करना जरूरी है. अभिषेक के मामले में पिता का सार्वजनिक बयान मौजूद है, जबकि अमितोष के चुनाव लड़ने को लेकर उपलब्ध जानकारी में कोई औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है. आने वाले समय में उनकी क्षेत्र में मौजूदगी, स्थानीय मुद्दों पर भागीदारी और जनता से संवाद यह स्पष्ट कर सकते हैं कि उनकी भूमिका सामाजिक गतिविधियों तक रहेगी या चुनावी राजनीति तक पहुंचेगी.



Source link